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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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चंद्रभूषण झा 

downloadहाल ही भारत दौरे पर आए अमेरिका के विदेश मंत्री और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री के बीच उच्च शिक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों में सामुदायिक कॉलेज खोलने ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू करने पर विषेश ज़ोर दिया गया है। देश में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर रही है। एक ओर जहां सामुदायिक कॉलेजों खोलने को बढ़ावा दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर विश्वि के कई देशों के साथ समझौते भी किए जा रहे हैं। ताकि भारतीय छात्रों को विदेशों में उच्च शिक्षा हासिल करने के अधिक से अधिक अवसर प्राप्त हो जाएं। देखा जाए तो सरकार की यह कोशिश एक ऐसे पेड़ की देखभाल की तरह है जिसकी जड़ खोखली होती जा रही है लेकिन समूचा ध्यान तना को मजबूत बनाने में दिया जा रहा है। ठीक वैसे ही शिक्षा नीति पर अमल किया जा रहा है। जहां उच्च शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए बड़ी बड़ी योजनाएं तैयार की जा रही हैं लेकिन प्राथमिक शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए जमीनी स्तर पर कोई गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।

गैर सरकारी संगठन ‘क्राई’ द्वारा हाल ही में जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि शिक्षा के अधिकार कानून के लागू होने के तीन वर्ष की अवधि समाप्त होने के बावजूद अभी तक इस कानून के कई मानदंडों का आज तक पालन नहीं हो पाया है। रिपोर्ट के अनुसार अभी भी देश के 63 फीसदी सरकारी स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। जबकि 60 फीसदी स्कूलों में बच्चों के लिए खेलने का साधन भी नहीं है। वहीं 60 फीसदी सरकारी स्कूलों की चारदीवारी नहीं है। यदि है भी तो बुरी हालत में या टूटी फूटी अवस्था में है। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई भी बाहरी अवांछित व्यक्ति स्कूल परिसर में किसी भी समय आना जाना कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 74 फीसदी सरकारी स्कूलों में लायब्रेरी नहीं है। जबकि 20 फीसदी स्कूलों में पीने का साफ पानी नहीं है। 21 फीसदी प्राइमरी स्कूलों तथा 17 फीसदी मीडिल स्कूलों के शिक्षक मिड डे मिल के लिए खाना बनाने का काम करते हैं।

रिपोर्ट में सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि देश के 32 फीसदी सरकारी स्कूलों में या तो शौचालय नहीं है या बहुत जर्जर स्थिती हैं और वह किसी प्रकार से प्रयोग के लायक नहीं हैं। जबकि 11 फीसदी स्कूलों में षौचालय की व्यवस्था तक नहीं है। वहीं 18 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए षौचालय नहीं है जो सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है जिसमें कोर्ट ने स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से षौचालय की व्यवस्था करने का आदेश दिया था। रिपोर्ट बताती है कि 35 फीसदी प्राइमरी स्कूलों के टीचर 12वीं पास हैं या उनके पास शिक्षा का डिप्लोमा है जो हमारी लचर शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है। यह इस बात को भी साबित करता है कि हमारे शिक्षा व्यवस्था की जड़ कितनी कमज़ोर है। ऐसे में हम उच्च शिक्षा को मजबूत बनाने की बात किस आधार पर कर सकते हैं? सर्व शिक्षा अभियान और मिड डे मिल की बदौलत हम बच्चों को स्कूल तक तो खींच लाए लेकिन उन्हें वास्तव में शिक्षा की उस प्रणाली का हिस्सा नहीं बना पा रहे हैं जो उन्हें उच्च शिक्षा की ओर प्रेरित करे। यदि आंकड़ा देखा जाए तो प्रत्येक वर्ष लाखों बच्चों का एडमिशन तो होता है लेकिन लचर शिक्षा व्यवस्था के कारण उनमें से हजारों बीच में ही स्कूल छोड़ जाते हैं।

देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा प्रणाली की इस दुर्दशा के पीछे उसका व्यवासायिकरण जिम्मेदार है जो पूंजीपतियों के हाथ में जा रही है। सत्ता पर काबिज़ वर्ग अपने हित में शिक्षा और उसकी नीतियों को तय करने में लगे हैं। मैकाले की शिक्षा नीति को अंग्रेजी राज के स्वामित्व के लिए लागू की गई थी। आजादी के बाद देश के पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा के लिए उसी शिक्षा नीति का अनुसरण किया जा रहा है। कोठारी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में केंद्रीय बजट का 10 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की सिफारिश की थी। लेकिन चार दशक बाद भी केवल 3.5 प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है। रिपोर्टें बताती हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के तीन साल बाद भी पांच करोड़ बच्चे अब भी स्कूल से बाहर हैं। प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन कराने वाले बच्चों में एक तिहाई ही उच्च विद्यालय तक पहुंच पाते हैं। इनमें मात्र 7 प्रतिशत ही उच्च शिक्षा प्राप्त करने में कामयाब हो पाते हैं। सरकार लाख दावे करे परंतु सच्चाई यही है कि उच्च तकनीकी शिक्षा अब गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले छात्रों के लिए सपना मात्र बनकर रह गया है। शिक्षा के इस बाज़ारीकरण ने पूरी आबादी के मात्र 20 प्रतिशत के लिए सर्वसुलभ बनाया है। जो महंगे स्कूलों में महंगी फीस देकर स्वंय को बाजार के लायक बनाने की जबरन कोशिश करते हैं। जबकि 80 प्रतिशत आबादी को इसे प्राप्त करने के लिए बैंक भी कर्ज देने के लिए तैयार नहीं होती है। वहीं स्कॉलरशिप योजना शिक्षा विभाग के किसी बाबू की टेबल पर फाइलों के बीच धूल फांकती रहती है। मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी के नाम पर महंगी शिक्षा दी जा रही है। जिसके पीछे एक संगठित शिक्षा माफिया काम कर रहा है। जिसे खत्म करने के लिए न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पिछले कुछ वर्षों से देश की राजधानी दिल्ली में नर्सरी में एडमिशन के समय होने वाले अभिभावकों के हंगामे और उच्च न्यायालय की दखलअंदाजी इसका प्रमुख उदाहरण है। जबकि बिहार के दरभंगा जैसे छोटे शहरों में प्राइवेट कोचिंग संस्थान इसी का एक स्वरूप है। जहां छात्रों से मोटी रक़म वसूली जाती है। इसके बावजूद नौकरी की कोई गारंटी नहीं दी जाती है।

देश में शिक्षा माफिया के फैले तंत्र को जड़ से खत्म करने के लिए जरूरत इस बात की है कि सभी सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढ़ांचों को मजबूत किया जाए। विशेषकर प्राथमिक स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती पर विशेष जोर दिया जाए। उन्हें उच्च वेतनमान पर नियुक्त किया जाए। साथ ही साथ उन्हें केवल शिक्षण कार्य तक ही सीमित करना होगा। जबतक सरकारी स्कूल के शिक्षक को चुनावी डयूटी और घर-घर सर्वेक्षण के कार्य से मुक्त नहीं कर दिया जाता है तबतक हमें सफलता की उम्मीद करना बेमानी होगा। (चरखा फीचर्स)

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