लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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: डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत में लम्बे समय से यही सुनने में आ रहा है कि केंद्र सरकार भारतीय रेलवे का निजिकरण करने जा रही है। एक बारगी केंद्र में कांग्रेस की सरकार रहते हुए ऐसी बाते सुनाई देती है तो देश की जनता को उस पर बहुत ज्यादा  भरोसा नहीं होता। संभवत: यही कारण रहा होगा कि जब पिछले दस वर्षों में रेलवे के घाटे में चलने का हवाला देते हुए कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की ओर से उसको निजि हाथों में सौंपने की बाते उठ रही थीं तब रेलवे युनीयनों ने भले ही कुछ आवाज बुलंद की हो किंतु भारतीय आवाम आराम से अपने रोजमर्रा के कार्यों में लगी रहकर इस मुद्दे पर चुप थी। इसके बाद जैसे ही केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई और रेलवे को निजि हाथों में सौंपने की सुगबुगाहट आरंभ हुई तो रेलवे युनीयने क्या देश की आवाम भी इस मुद्दे को लोकर जाग्रत हो उठी।

वस्तुत: ऐसा इसीलिए हुआ क्यों कि दोनों राजनैतिक पार्टियों का चरित्र निजि‍करण के मुद्दे को लेकर एकदम उलट-पलट है। कांग्रेस जहां इस प्रकार के विषय आने पर कई वर्षों तक सोचती दिखाई देती है किंतु वहीं भाजपा अपनी शीघ्र निर्णय लेने की शैली के कारण अधि‍कांश निर्णयों में विलम्ब नहीं करती। ऐसे में देश की जनता को लगने लगा था कि अब की बार भारतीय रेलवे का निजिकरण कोई सुगबुगाहट नहीं यह तो हकीकत होने जा रहा है, तब इसे लेकर जनता भी रेलवे युनियनों के साथ निजिकरण के विरोध में जाग उठी। पिछली भाजपानीत एनडीए सरकार में जिस तेजी के साथ कई कंपनियों और होटलों का निजिकरण हुआ था वह आज सभी के जहन में है। उससे सबक लेकर वैसे तो सभी इस बार सचेत हैं लेकिन सरकार तो सरकार होती है, आखि‍र उसके निर्णय को लंबे समय तक कैसे चुनौ‍ती दी जा सकती है। किंतु जिस तरह देश के प्रधानमंत्री ने रेलवे के निजिकरण को लेकर अपनी बात जनता के बीच रखी है, उससे इस बार निजिकरण के मामले में भाजपा सरकार पर भरोसा करने का मन करता है। लगता है कि इस बार सरकार आने पर भाजपा सच में उन सभी मुद्दों को लेकर गंभीर है जो सीधे जनता की भावनाओं से जुड़े हैं।

भारतीय रेल वास्तव में आज हर भारतवासी के दिल से जुड़ी है, शायद इसीलिए कोई नहीं चाहता है कि यह निजि हाथों में सौंपी जाए, हर बार हर कोई सरकार से यही अपेक्षा करता है कि वही इसके सुधार के लिए समय-समय पर आवश्यक कदम उठाये और इसकी दशा ठीक करे। देश की इस मंशा को प्रधानमंत्री ने आज पूरी तरह समझ लिया है तभी तो उन्होंने रेलवे के निजीकरण की चर्चा को सिरे से खारिज करते हुए सीधे तौर पर यह बताने का प्रयास किया है रेलवे का निजिकरण संबंधी न कभी उनकी इच्छा रही और न कभी इसके बारे में उन्होंने सोचा। उनसे ज्यादा रेलवे से कोई प्यार नहीं कर सकता, क्योंकि गुजरात के एक रेलवे स्टेशन पर ही चाय बेचते हुए वे अपना बचपन बिता चुके हैं। रेलवे यातायात का महत्वपूर्ण साधन ही नहीं बल्कि देश के विकास में भी अहम योगदान करने वाला संस्थान है।

 

 

नरेंद्र मोदी की इस बात से यह तो स्पष्ट हो गया कि जब तक वे देश के प्रधानमंत्री हैं, कम से कम तब तक तो आश्वस्त हुआ ही जा सकता है कि भारतीय रेल निजि हाथों में नहीं जाएगी। पर क्या वर्तमान हालातों में रेल को छोड़ा जाना उचित होगा। वस्तुत: उत्तर होगा बिल्कुल नहीं। हम प्रधानमंत्री की कही इस बात पर भी भरोसा कर लेते हैं कि देश के आधारभूत ढांचे के विकास के लिए विदेशी निवेश की जरूरत है। रेलवे का विकास भी इस निवेश से किए जाने की सरकार की योजना है, जो विदेशी सहयोग से आधारभूत ढांचे का विकास दुनिया भर में हो रहा है, उसी को भारत सरकार यहां लाना चाहती है। लेकि‍न फिर जहन में एक प्रश्न आ जाता है कि क्या विदेशी निवेश के विकल्प को छोड़कर देश में विकास करना संभव नहीं है, और रेलवे में यदि विदेशी पूंजी लगती है तो क्या निवेश करने वालों के अपने हित-अहित नहीं होंगे ? कोई भी अपना धन व्यर्थ में तो रेलवे को नहीं देने वाला है। जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभि‍यान, जनधन योजना से हर घर में बैंक की पहुंच सुनिश्चित की, आदर्श गांव योजना से देश के ग्रामों को आधुनिक बनाने की योजना लांच की है। क्या इसी प्रकार के प्रयास भारतवासियों को साथ मे लेकर वे भारतीय रेलवे का कायाकल्प करने की दिशा में नहीं कर सकते हैं।

आज यह सभी को भलि-भांति विदित है कि रेलवे की खस्ता माली हालत के लिए कर्मचारियों के बजाय राजनीतिक बिरादरी ज्यादा जिम्मेदार रही है, जिसने वोटबैंक की खातिर पिछले दस सालों तक किराये नहीं बढ़ने दिए। रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन और संसाधन सृजन के लिए गठित देबराय समिति ने भी यह बात मानी है कि जिस राजनीतिक फायदे के लिए दस सालों तक किराये  में बढ़ोत्तरी नहीं की गई उसके फलस्वरूप रेलवे 1.56 लाख करोड़ रुपये की आय से वंचित रह गया। यदि यह पैसा होता तो आज साढ़े चार लाख करोड़ की लंबित परियोजनाओं का बैकलाग नहीं होता।

अभी तक रेलवे में सुधारों को लेकर बनी सभी समितियों यथा-प्रकाश टंडन समिति, राकेश मोहन समिति, मित्रा समिति, काकोदकर समिति, सैम पित्रोदा समिति आदि सभी मानती रही हैं कि भारतीय रेलवे की बुरी दशा के लिए राजनैतिक निर्णय कहीं न कहीं जिम्मेदार रहे हैं। सभी ने बड़ी-बड़ी रिपोर्टें सरकार को सौंपी। किंतु इन रपटों पर अभी तक कुछ भी अमल नहीं हो सका। ये सभी रेलवे मंत्रालय में पड़ी धूल खा रही हैं, परन्तु आज की तारीख में यही सच है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पूरा देश विकास और सुशासन को लेकर उनकी ओर ताक रहा है। रेलवे का सुधार भी उनमें से एक है।

वैसे सच तो यह है कि इस दिशा मे प्रधानमंत्री मोदी ने आन्श‍िक पहल तो तब ही कर दी थी जब उन्होंने लम्बे अरसे से अटकी तीस अधूरी रेल परियोजनाओं को अगले तीन सालों में पूरा करने का निर्णय किया। अभी उन्होंने देश के चारों कोनों में चार रेल विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा कर ही दी है। इसके अलावा मोदी ने एक बात और कही है कि जिन ग्रामीण स्टेशनों पर बिजली की व्यवस्था है, वहां दो-तीन कमरे बनाकर युवाओं के लिए स्किल डेवलपमेंट कक्षाएं चलाई जायेंगी। अपनी सांसद निधि, वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्मों पर बेंच लगाने के लिए देने वाले नरेंद्र मोदी ने जो आह्वान आज देश के सभी सांसदों से किया है कि वे अपनी निधि से अपने क्षेत्र के रेलवे स्टेशनों पर बेंच लगवाएं ताकि हजारों यात्रियों के बैठने की व्यवस्था हो सके । वस्तुत: प्रधानमंत्री की ओर से किए जा रहे रेलवे के सुधार की दिशा में इसे हम प्राथमिक कदम मान सकते हैं। किंतु भारतीय रेलवे के स्वास्थ्य को लेकर सार्थक और स्थायी समस्या समाधान तो तभी कहलाएगा जब बिना विदेशी पूंजी के भारतीयों का ठीक उसी तरह सरकार सहयोग ले, जैसे वह अन्य योजनाओं में ले रही है और देश के विनिर्माण में अपना योगदान दे रही है। फिलहाल रेलवे के निजिकरण मसले से देश को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री जी का धन्यवाद है।

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