लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ. आशीष वशिष्ठ 

बच्चे देश का भविष्य हैं लेकिन देश के नौनिहाल जिन विषम परिस्थितियों में जीवन बसर कर रहे हैं वो किसी भी दृष्टिïकोण से उज्जवल कल का संकेत नहीं देता है। देश के अधिकांश बच्चे अभाव में जी रहे हैं और उनको मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। स्कूल जाने वाले नौनिहालों को पीने के पानी और शौचालय की बेहद मामूली ओर मूलभूत सुविधाएं के घोर अभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख तेवर दिखाते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को सभी स्कूलों में शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए छह माह का वक्त दिया है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश देश के कर्ता-धर्ता और उच्च पदस्थ महानुभावों की कार्यप्रणाली पर उंगली तो उठाता ही है वहीं आम आदमी को यह सोचने को विवश भी करता है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 वर्षों बाद भी सरकार देश के नागरिकों को पीने का पानी और शौचालय जैसी मामूली सुविधाएं उपलब्ध करवा पाने में अक्षम सिद्घ हुई है। शिक्षा का अधिकार, समान शिक्षा और मुफ्त शिक्षा के लंबे-चौड़े दावे करने वाली सरकार जब पानी और शौचालय जैसी सुविधाएं छात्रों को उपलब्ध नहीं करवा पा रही हैं तो स्थिति किस हद तक बिगड़ी हुई है को सहजता से समझा जा सकता है। बच्चों को देश का भविष्य बताने और उनके कंधों पर देश चलाने, विकास और सजाने-संवारने का बोझ आने के भाषण देने में कोई नेता या उच्च पदस्थ व्यक्ति कोई कसर नहीं छोड़ता है लेकिन देश का भविष्य मूलभूत सुविधाओं से वंचित है इसकी ङ्क्षचता किसी को नहीं है और सरकार के एजेण्डे और कर्तव्यों की याद सुप्रीम कोर्र्ट को दिलानी पड़ रही है। जब देश के लाखों नौनिहालों को आज अंधेरे में और सुविधाहीन होगा तो उनका मानसिक व शारीरिक विकास भी उसी अनुपात में होगा। और अभावों में पले-बढ़े और शिक्षित बच्चों से अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती है।

राइट टू इजुकेशन फोरम नामक संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि देश में 95 प्रतिशत स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। इस संस्था के अध्ययन में पाया गया कि दस में से एक स्कूल में पीने का पानी नहीं होता है और 40 फीसदी स्कूलों में शौचालय ही मौजूद नहीं होता। अन्य 40 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय का प्रबंध नहीं होता है। देश भर में सरकारी स्कूलों में पीने के पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं के अतिरिकत तमाम दूसरी सुविधाओं जिनमें बैठने के लिए टाट-पटटी, डेस्क, क्लास रूम, पंखे, कूलर और बिजली आदि का अभाव स्पष्टï दिखाई देता है। देश के बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित 1,46, 959 स्कूलों में से सिर्फ 80,683 में बिजली की सुविधा उपलब्ध है। शेष 66,276 स्कूलों के बच्चे बिजली की सुविधा से वंचित हैं। परिषदीय स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के लिए 35,918 अतिरिक्त क्लास रूम की भी कमी है। वहीं लगभग दो हजार स्कूल ऐसे हैं जिनमें शौचालय और पेयजल की सुविधा का अभाव है। ये वो आंकड़े हैं जो सरकार ने कोर्ट में पेश किये हैं, सरकारी आंकड़ों की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। कमोबेश यही हालत देश भर के सरकारी स्कूलों की है। जिन स्कूलों में पीने की सुविधा उपलब्ध भी है वो किसी दशा में है यह देखने की फुर्सत किसी को नहीं है। आज शहरी क्षेत्रों में अधिसंख्य छात्र वाटर बोतल साथ लेकर घर से लेकर निकलते हैं। गांव-देहात, कस्बों और दूर-दराज क्षेत्रों में बने स्कूलों की क्या स्थिति से कोई अनजान नहीं है। स्कूलों में शौचालय इतने गंदे, बदबूदार और बुरी स्थिति में होते हैं कि छात्र उनका उपयोग करना ही उचित नहीं समझते हैं। लडक़े तो कोई वैकल्पिक व्यवस्था ढूंढ लेते हैं असल समस्या लड़कियों के समक्ष आती है। गत वर्ष अदालत ने शैक्षणिक संस्थानों में, विशेषकर लड़कियों के लिए शौचालय का प्रबंध करने के निर्देश दिए थे। एक अध्ययन के अनुसार, स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बच्चों खासकर लड़कियों, के पढ़ाई छोडऩे की घटनाएं ज्यादा होती हैं और इसे दुरूस्त करने के लिए सभी स्कूलों में अनिवार्य रूप से शौचालय सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। कई अध्ययनों से ये पता चला है कि अगर स्कूल में शौचालय ना हो तो माता-पिता लड़कियों को पढऩे नहीं भेजते हैं। शहरों में इस स्थिति से शायद लड़कियों को दो-चार नहीं होना होता है इसलिए स्थिति और समस्या की गंभीरता शायद उतनी समझ में न आए लेकिन गांव और कस्बों में जाकर इस समस्या को आसानी से समझा जा सकता है। न्यायालय का कहना है कि किसी भी वजह से यदि कोई बच्चा पढ़ाई छोड़ता है तो वह संविधान के अनुच्छेद 21-ए में प्रदत्त मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के उसके अधिकारों का हनन है, और जब माता-पिता और अभिभावक शौचालय और पेयजल जैसी मामूली सुविधाओं के कारण बच्चों को स्कूल भेजने से कतरा रहे हों तो स्थिति को समझा जा सकता है।

कड़वी हकीकत यह है कि देश लगभग 64 प्रतिशत आबादी आज भी खुले में शौच करने को विवश है। लेकिन देश के नीति निर्माताओं और आम आदमी का भाग्य निर्धारित करने वालों को इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं है कि आम आदमी कितनी विषम और विपरित परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहा है। योजना आयोग में एक टायलेट बनाने पर जनता के हिस्से का 30 लाख का खर्च किया जाता है और वहीं सरकार का एक वरिष्ठï मंत्री बेशर्मी से यह बयान देता है कि देश की महिलाओं को शौचालय नहीं मोबाइल चाहिए। असल में भ्रष्टïाचार देश की नसों में इस कदर फैल चुका है कि अब उसकी सफाई डायलसिस से होनी भी मुश्किल दिख रही है। वहीं सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखाई देता है, हमारे नीति निर्माता और सत्तासीन व्यक्तियों का जमीनी हकीकत से दूर-दूरतक कोई वास्ता ही नहीं है। पंचतारा होटलों के वातानुकूलित कमरों और कांफ्रेस हाल में बैठकर गांव-देहात और आम आदमी की पीड़ा को कदापि महसूस नहीं किया जा सकता है। जिनके घरों में लाखों रुपये के टायलेट बने हों उन्हें इस बात का कहां अहसास होगा कि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा प्रतिदिन दीर्घ ओर लघु शंका की स्थिति से कैसे पार पाता है। स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का आभाव संविधान में दिए गए मुफ्त और जरूरी शिक्षा के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। ये शर्म की बात है कि आजादी के 65 वर्षों बाद भी हम स्कूलों में पानी और शौचालय जैसी बेहद मामूली सुविधाएं भी उपलबध नहीं करा पाएं और इसके लिए जनहित याचिकाओं और कोर्ट का सहारा लेना पड़ रहा है।

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