लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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ह्यूमन राइट्स वॉच के द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार “भारत में बाल यौन उत्पीड़न घरों, स्कूलों तथा आवासीय देखभाल केंद्रों में आम बात है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा कानूनी और नीतिगत सुधार सुझाने के लिए गठित की गई समिति ने पाया कि बाल सुरक्षा नीतियाँ “स्पष्ट रूप से उन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं जिनका उन्होंने बीड़ा उठाया था।” भारत में बाल यौन उत्पीड़न से निपटने की प्रणाली और सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने में अपर्याप्त हैं। अनेक बच्चों को दोबारा दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है। उसका कारण है पीड़ादायक चिकित्सीय जाँच और पुलिस और अन्य अधिकारी जो या तो उनकी बात सुनना नहीं चाहते या फिर उन पर विश्वास नहीं करते। सरकारी तंत्र बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पीड़ितों के साथ व्यवहार के मामलों को रोक पाने में विफल रहा है। यूं तो स्कूलों को बच्चों का वर्तमान व भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है। लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं। बाल विकास राज्य मंत्री कृष्णा तीरथ के अनुसार पिछले तीन वर्षो में एनसीपीसीआर को विद्यालयों में बच्चों को पिटायी करने, उन्हें परेशान करने, अपमानित करने और यौन उत्पीड़न के संबंध में 178 शिकायतें प्राप्त हुई।’’सामान्य तौर से हमारे आसपास बच्चों के साथ होने वाले दुराचारों को गंभीरता से नहीं लिया जाता है। इस तरह से बच्चों पर होने वाले अत्याचारों पर चुप रहकर हम उसे जाने-अनजाने प्रोत्साहित करते हैं।

हमारे समाज में एक प्रमुख समस्या है महिलाओं का यौन उत्पीड़न। यूँ तो आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाएं, पुरुषों के समान कार्यरत है, और पुरुषों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर कार्य कर रही है। लेकिन इस आधुनिकतावादी और विकासवादी वातावरण में वे अक्सर छेड़छाड़ तथा यौन उत्पीड़न का शिकार भी हो जाती है। यौन उत्पीड़न के अन्तर्गत सीटी बजाने जैसी मौखिक छेड़छाड़ से लेकर अश्लील इशारे करना भी शामिल है। अक्सर अपनी नौकरी बचाये रखने की खातिर वे अपने कार्यालय में भी चुपचाप यौन उत्पीड़न को झेलती रहती है। भारतीय समाज में शारीरिक छेड़छाड़, शारीरिक सम्बन्ध बनाने की मॉग करना, अश्लील इशारे या फब्तियां कसना, मौखिक या गैर-मौखिक आचरण अश्लील मजाक करना, अनैतिक तस्वीरें दिखाना आम बात है। यौन उत्पीड़न के दोषी को सजा देने के लिए कोई विशेष पृथक कानून नहीं बनाया गया है। इसीलिए महिलाओं को उचित न्याय नहीं मिल पाता है। बलात्कार का दंश महिला को शारीरिक से ज्यादा मानसिक व सामाजिक रूप से आहत करता है। जिसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व, परिवार और भावनाओं पर भी पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ”बलात्कार केवल किसी महिला के विरूध्द किया गया अपराध नहीं है, बल्कि महिला के विरूध्द के प्रति किया गया अपराध है।”भारतीय दण्ड संहिता की (धारा 375) में स्पष्ट किया गया है। किसी व्यक्ति को बलात्कार का दोषी माना जायेगा यदि उसने उक्त महिला की इच्छा के विरूध्द उसकी सहमति के बिना उसे धमकाकर ली गयी सहमति सहित, नशे या बेहोशी में ली गई सहमति से यौन सम्बन्ध बनाये हों। 16 वर्ष से कम आयु की महिला की सहमति से तथा किसी व्यक्ति की 15 वर्ष से कम आयु की पत्नी से भी यौन सम्बन्ध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आता है।

चूंकि भारत में कोई भी महिला सामजिक अपमान नहीं झेलना चाहती, इसलिए बलात्कार के झूठे आरोप लगाने की सम्भावना लगभग नगण्य ही होती है। किन्तु तमाम सुरक्षा प्रावधानों के बाबजूद भी बलात्कार की शिकार महिलायें रिपोर्ट दर्ज नहीं कराती, क्योंकि वे डॉक्टर, पुलिस, वकील द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों का जबाब देने का साहस नहीं कर पाती। महिलाओं के लिए तीन क्षेत्र-श्रम, घरेलू कामकाज और लघु उद्योग प्रमुख रूप से असुरक्षित माने जाते हैं। भारत में 17 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार होती है। यह आंकड़ा संगठित व असंगठित दोनों क्षेत्रों में कामकाजी महिलाओं के बीच यौन उत्पीड़न की बढ़ती हुई घटनाओं को दर्शाता है। ऑक्सफैम इंडिया की ओर से भारत में कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न 2011-2012 शीर्षक से कराए एक जनमत सर्वेक्षण के तहत यह बात कही गई। यह सर्वेक्षण ऑक्सफैम इंडिया और आइएमआरपबी इंटरनेशनल की इकाई सोशल एंड रूरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की ओर से संयुक्त रूप से दिल्ली, मुंबई, बेंगलूर, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, लखनऊ और दुर्गापुर में किया गया। 400 में से 66 महिला प्रतिभागियों ने बताया कि उन्हें यौन उत्पीड़न की 121 घटनाओं का सामना करना पड़ा। इनमें 102 घटनाएं शारीरिक उत्पीड़न से जुड़ी नहीं थी जबकि शेष 19 घटनाएं शारीरिक उत्पीड़न की थी।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर आरटीआई के तहत यौन उत्पीड़न से जुड़ी जानकारियां देने से इनकार किया है। कार्मिक मंत्रालय ने कहा है कि अफसरों के खिलाफ दर्ज इन मामलों से जुड़ी जानकारियां खुलासे के दायरे में नहीं आतीं। दरअसल कार्मिक मंत्रालय से पिछले दस साल के दौरान अखिल भारतीय सेवा (आईएएस, आईपीएस और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस) के अफसरों के खिलाफ दर्ज यौन उत्पीड़न के मामलों की जानकारी मांगी गई थी। लेकिन कार्मिक मंत्रालय ने सूचना के अधिकार के किसी एक्ट के प्रावधान के बजाय सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देकर इससे इनकार कर दिया। हमारी सरकार ने भारत की आधी आबादी के सशक्तिकरण और मुक्ति की परिभाषा गढ़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। पुरूष प्रधान समाज के आँकड़ें और विसंगतियों के साथ बौद्धिक कवायदों का सिलसिला, लाचारगी से लेकर प्रतिरोध के स्वरों तक बढ़ते-घटते रहा है परंतु सरजमीन पर आज भी औरतों के हक में बने सरकारी कानूनों को, न तो सही तरीके से अमल में लाया गया है और न ही उन पर सामाजिक स्वीकृति की मुहर लगी है। नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में हर 93वें मिनट पर महिला को आग के हवाले कर दिया जाता है। वर्ष 2005 में देशभर में 492 महिलाओं की दहेज के कारण हत्या कर दी गई, जिनमें 94 मामले दिल्ली के हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में हर साल पांच हज़ार महिलाओं को कम दहेज लाने के कारण मौत की नींद सुला दिया जाता है और इन्हें हादसा करार देकर दोषी अपना दामन बचा लेते हैं। अनेक मामलों में महिला मरते समय अपना बयान तक नहीं दे पाती या ससुराल वाले उसे ऐसा न करने के लिए मजबूर कर देते हैं। ये घटनाएं सिर्फ वो हैं जो प्रकाश में आ जाती हैं। इनके अलावा कितनी ऐसी घटनाएं हैं जो होती तो हैं, लेकिन सामने नहीं आ पातीं। क्योंकि अधिकांश महिलाएं यह नहीं चाहतीं कि घर की बात बाहर जाए। मामला गंभीर होने पर ही उन्हें अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक़ दहेज हत्या के दो से पांच फ़ीसदी मामलों में ही दोषियों को सज़ा होती है, जबकि शेष मामलों में अभियुक्त साफ़ बच निकलते हैं।बाल विवाह और भ्रूण हत्यायों के पीछे मूल रूप से दहेज की कुप्रथा है। गौरतलब है कि भारत में ८.९ प्रतिशत लड़कियाँ १३ वर्ष की उम्र से पहले ब्याह दी जाती हैं जबकि अन्य २३.५ प्रतिशत लड़कियों की शादी १५ वर्ष की आयु तक हो जाती है। जाहिर है लड़की जितनी पढ़ेगी-बढ़ेगी उतना ही उपयुक्त वर तलाशना होगा और उसके रेट के मुताबिक दहेज जुटा पाना सबके बूते की बात नहीं है इसलिए कम उम्र की कम पढ़ी-लिखी लड़की ब्याह कर कन्यादान का पुण्य प्राप्त करना अधिकांश लोग बढ़िया मान लेते हैं।

दलितों के खिलाफ होने वाले आपराधिक मामलों में कमी नहीं आ रही है। दलितों को निशाना बनाए जाने के मामले में कोई भी राज्य पीछे नहीं है। इस मामले में आश्चर्यजनक बात तो यह है कि दलितों के खिलाफ आपराधिक मामले वैसे राज्य में भी बढ़ रहे हैं जहां सत्ता में दलितों की अच्छी-खासी भागीदारी है। दलितों को निशाना बनाए जाने के पीछे समाज की सदियों पुरानी मानसिकता काफी हद तक जिम्मेवार है। जो वर्ग यह देखते हुए बड़ा हुआ है कि दलितों को बराबरी का हक नहीं है, वह उन्हें बराबरी का व्यवहार करते हुए नहीं देख सकता। इसी मानसिकता का नतीजा यह है कि दलितों के खिलाफ आपराधिक मामलों को अंजाम दिया जा रहा है। इसी मानसिकता की वजह से दलितों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। इसका असर यह हो रहा है कि आरक्षण जैसी सुविधा होने के बावजूद वे समाज की मुख्यधारा से अलग ही रह जा रहे हैं। जिस आरक्षण की व्यवस्था दलितों के कल्याण के मकसद से की गई थी उसका लाभ इस तबके के मलाईदार लोग उठा ले रहे हैं और आम लोगों के सामने ठगे जाने के अलावा और कोई चारा नहीं बच रहा है। दलित महिलाओं की हालत तो और भी खराब है। उन्हें घर में भी भेदभाव का शिकार होना पड़ता है और बाहर भी। दलित महिलाओं को न सिर्फ हिंसा का शिकार होना पड़ता है बल्कि सिर्फ दलित होने के नाते जीवन की बुनियादी जरूरतों तक उन्हें पहुंच नहीं बनाने दिया जाता है। कुछ ही दिनों पहले संयुक्त राष्ट के सहयोग से तैयार की गई एक रपट आई थी। इसमें यह बताया गया था कि दलित बच्चों को स्कूलों में भी भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में दलित मंत्रियों की अच्छी खासी संख्या है। ऐसे में ध्यान देने वाली बात यह है कि ये मंत्री दलितों के प्रति होने वाले भेदभाव को मिटाने के लिए गंभीर क्यों नहीं हैं।

आजादी के 66 साल बाद भी भारत के आदिवासी उपेक्षित, शोषित और पीड़ित नजर आते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ और नेता आदिवासियों के उत्थान की बात करते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं करते।आदिवासी किसी राज्य या क्षेत्र विशेष में नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में फैले हैं। ये कहीं नक्सलवाद से जूझ रहे हैं तो कहीं अलगाववाद की आग में जल रहे हैं। जल, जंगल और जमीन को लेकर इनका शोषण निरंतर चला आ रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय मुद्दे- भ्रष्टाचार, आतंकवाद, महँगाई, स्विस बैंक से काला धन वापस लाने, स्थिर और मजबूत सरकार के नाम पर जनता से वोट बटोरने की नीति को महज राजनीतिक स्टंट ही कहा जाएगा। देश के लगभग 7 करोड़ आदिवासियों की अनदेखी कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ देने वाली बातों को हवा देना एक परंपरा बन गई है। इनका तरह तरह से शोषण और उत्पीडन किया जाता है। सस्ते श्रमिक, बंधुआ मजदूर, बच्चों एवं महिलाओं की तस्करी और उनपर किये जाने वाले जुल्म बढ़ रहे हैं। दिल्ली में छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से घरों में काम करने वाले बच्चों को लाया जाता है और उनके साथ लगातार अन्याय किया जाता है। दिल्ली की हाल ही की घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

विकलांग बच्चों में उनके जीवन के जन्म पहले दिन से बहिष्कार शुरू हो जाता है। सरकारी मान्यता के अभाव में, उन्हे अपने अस्तित्व और संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक सेवाओं और कानूनी सुरक्षा से काट दिए जाता हैं। उनकी उपेक्षा ही भेदभाव बढ़ाती है। द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन’स 2013: चिल्ड्रन विथ डिसेबिलिटी कहती है कि विकलांग बच्चों को स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने या स्कूल जाने की कम से कम संभावना होती है। वे हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा के सबसे बडी कमजोरी के बीच होते है खास कर जब अगर उन्हे छिपाया जाता है या संस्थानों में डाला जाता हैं – कई सामाजिक कलंक के कारण या उन्हें उठाने की खर्च के कारण। वे दुनिया में सबसे उपेक्षित लोगों के बीच में है। गरीबी में रहने वाले बच्चों को अपने स्थानीय स्कूल या क्लिनिक में कम से कम में भाग लेने की संभावना होती है, लेकिन जो गरीबी में रहते हैं और विकलांग भी हैं उन लोगों में ऐसा कर पाने की संभावना कम होती है।

ऐसा व्यक्ति जिसके पास निज की कोई ज़मीन-जायदाद न हो, न जिसकी कोई पूंजी हो, जिसे अपने जीवन निर्वाह के लिए दूसरों के यहां नौकरी करनी पड़े, काम का मूल्य या भाड़ा लेकर काम करना पड़े, वह चाहे किसी देश का हो, किसी जाति का हो, स्त्री हो या पुरुष, इन सबको आज की सभ्य भाषा में श्रमिक वर्ग कहते हैं। सामंती व्यवस्था के दौर से लेकर अंग्रेजों की गुलामी तक और बाद में आजाद भारत में भी मजदूरों का दमन, शोषण और उत्पीड़न जारी रहा है। श्रमिक वर्ग की हालत जैसी थी, वैसी ही रही। यहां तक कि भारत आज़ाद हुआ, तब तक कई देशी रियासतों या राज्यों में श्रमिक वर्ग से ज़बरदस्ती बेगार ली जाती थी यानी बिना कुछ पारिश्रमिक दिए डंडे के जोर से, कोड़ों की मार से, कठिन से कठिन काम लिया जाता था। भूमंडलीकरण के दौर में भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा गरीब देशों की इकाइयों में मजदूरों के साथ अत्यन्त अमानवीय कृत्य किए जाते हैं। दक्षिण अमेरिकी देश कोलोम्बिया में कोका कोला कम्पनी द्वारा अपने मजदूरों पर दमन और अत्याचार सर्वाधिक चर्चित है। हमारे देश में तो ऐसी घटनाओं की भरमार है। मारुती-सुजुकी के मजदूर लंबे समय से अपने अधिकारों की हिफाज़त के लिये अपनी पसंद की यूनियन बनाने का संघर्ष चला रहे थे। मारुती-सुजुकी के मानेसर प्लांट में 16 जुलाई, 2012 को हुई एक घटना में मानव संसाधन मैनेजर अवनीश कुमार देव की मृत्यु हो गयी थी। इस घटना की आड़ में, श्रमिकों के संघर्ष को राज्य सरकार और प्रबंधन ने मिलकर कुचलने का अभियान छेड़ दिया। राज्य की पूरी मशीनरी – पुलिस, गुप्तचर विभाग, प्रशासन, श्रम विभाग, न्यायालय आदि – बिना किसी आधार और सबूत के, अपने ही कानूनों को ताक पर रखकर श्रमिकों के खिलाफ़ राजकीय उत्पीड़न करने लगी।

इस घटना के दूसरे ही दिन से यानि 18 जुलाई, 2012 से 147 श्रमिक गुड़गांव की जेल में बंद हैं और लागातार पुलिस के उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं। एक वर्ष बीतने को है, अभी तक उस साज़िश की जांच राज्य सरकार नहीं कर सकी, जिसके चलते मानव संसाधन मैनेजर की मृत्यु हुई थी। आज तक एक भी श्रमिक को जमानत नहीं मिली है। निचली अदालत और चंडीगढ़ स्थित उच्च न्यायालय ने 22 मई, 2013 को जेल में बंद श्रमिकों को जमानत देने से इंकार कर दिया। 66 अन्य श्रमिकों पर गैर-जमानती गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है। जेल में बंद कई श्रमिक गंभीर रूप से बीमार हैं। जेल प्रशासन उन्हें समुचित इलाज से वंचित कर रहा है। ऐसी अनेकों घटनाएँ हैं जिन्हें जनजीवन से न जोड़कर प्रशासकीय मामला और क़ानून व्यवस्था का मामला भर मान लिया जाता है। उत्पादक शक्तियों को जानबूझ कर व्यापक जनाधार से साजिशन विच्छिन्न कर दिया जाता है ताकि उन पर बेरोकटोक अत्याचार किये जा सकें। क्या शासक वर्ग द्वारा भारतीय समाज के हर तबके पर निरंतर हो रहे उत्पीड़न को सहज क्रिया कलाप मानने की यह मानसिकता परपीड़क और जनद्रोही मानसिकता नहीं है?

 

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