लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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सलमान अब्‍दुस समद

बिहार का मधुबनी जिला किसी परिचय का मोहताज नहीं है। ब्लॉक कवि कोकिल विद्यापति की जन्मभूमि रही है। भारतीय साहित्य की भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभ में एक विद्यापति को मैथिली के सर्वोपरि कवि का स्थान दिया जाता है। उन्हें न सिर्फ मैथिली बल्कि संस्कृत के महान कवि के रूप में भी याद किया जाता है। विद्यापति संस्कृत के दो शब्द ”विद्या” और ”पति” से मिलकर बना है। इसका संपूर्ण अर्थ ”ज्ञान का असीमित भंडार वाला व्यक्ति” होता है। इस महान कवि से संबंध रखने वाले विस्फी ब्लॉक में तकरीबन 28 पंचायतें हैं जो अन्य पंचायतों से सबसे ज्यादा है। अमूमन बिहार में एक ब्लॉक में अधिकतम 15 पंचायतें होती हैं। विस्फी ब्लॉक ऐतिहासिक शहर दरभंगा से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है। इसकी कुल आबादी तकरीबन एक लाख 70 हजार के आसपास है।

दिल्ली स्थित एक गैर सरकारी संगठन ‘चरखा’ की टीम के साथ विस्फी ब्लॉक के विस्फी पंचायत अंतर्गत वार्ड नं. एक और दो में बने प्राइमरी स्कूल में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। जहां कई मुद्दे उभर कर सामने आए। स्कूल की वर्तमान प्रिंसिपल रीना कुमारी से जब शैक्षणिक व्यवस्था पर बात हुई तो उन्होंने कठिनाईयों की एक लंबी सूची गिना दी। पूछने पर पता चला कि इस स्कूल में कुल 187 विद्यार्थी हैं। जिन्हें पढ़ाने के लिए केवल एक शिक्षक हैं जो वह स्वयं हैं, अर्थात् उन्हें टीचर से लेकर प्रिंसिपल तक की जिम्मेदारी वहन करनी पड़ती है। इस बात का कोई भी आसानी से अंदाजा लगा सकता है कि एक टीचर जो प्रिंसिपल का दायित्व भी निभाए वह इतने सारे बच्चों को कब और क्या-क्या पढ़ा सकता है। यह पुछने पर कि क्या उन्होंने इस संबंध में उच्च अधिकारियों को कभी अवगत कराया तो उनका जवाब था कि प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को कई बार आवेदन दिया जा चुका है लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकल सका है। चौंकाने वाली बात तो यह थी कि इस स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल शीतल प्रसाद साहू गुप्ता जनवरी में रिटायर्ड होने के बाद भी अगस्त में रीना कुमारी की नियुक्ति तक स्कूल का कामकाज संभालते रहे। इस दौरान स्कूल में उपस्थित बच्चों से बातचीत करने पर पता चला कि स्कूल में पांच कमरे हैं परंतु उनकी उपस्थिति ही इतनी कम है कि एक ही कमरा बच्चों से भर पाता है। मिड डे मील के संबंध में पुछने पर प्रिंसिपल का जवाब था कि अगस्त से अब तक केवल 150 किलो चावल उपलब्ध कराया गया है जो समाप्त हो चुका है। उच्च अधिकारयों को इस संबंध में सूचना देने के बाद भी कोई हल नहीं निकला है।

प्रिंसिपल से जब लेखक ने स्कूल ड्रेस के संबंध पूछा तो उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से 60 विद्यार्थियों को ड्रेस के लिए प्रति बच्चे 500 रूपए दिए जाने हैं जो करीब तीस हजार रूपए होते हैं, परंतु स्कूल को केवल 24 हजार रूपए ही आवंटित किए गए जिससे 12 बच्चों को ड्रेस के पैसे नहीं दिए जा सके हैं। इस कारण पैसे से वंचित बच्चों के अभिभावकों का उन्हें काफी विरोध भी झेलना पड़ा है। अधिकारियों का तर्क है कि कुछ स्कूलों में आवंटन से अधिक पैसे चले गए हैं जिनके वापस होने के बाद ही उन्हें दिया जाएगा। बातचीत में अभिभावकों ने भी शिक्षकों की कमी के कारण शिक्षा के गिरते स्तर पर चिंता जताई।

इसी ब्लॉक के बलहा पंचायत के अंतर्गत एक गांव रमनिया के वार्ड एक में बने प्राइमरी स्कूल के बारे में भी जानने का अवसर प्राप्त हुआ। जहां स्थानीय निवासियों की शिकायत थी कि पिछले दो महीनों से स्कूल में उनके बच्चों को मिड डे मील नहीं परोसा जा रहा है। जबकि स्कूल के शिक्षकों का तर्क था कि पैसा पाबंदी से कभी जारी नहीं किया गया जिससे छात्रों को दोपहर का खाना परोसने में काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। जैसा कि पाठक जानते हैं कि मिड डे मील केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी परियोजना है जो बच्चों को स्कूल तक लाने और उनमें शिक्षा का अलख जगाने में काफी सफल रही है। इसके तहत प्रत्येक स्कूल में अलग अलग दिन छात्रों को दोपहर का भोजन परोसा जाता है। ताकि शैक्षणिक विकास के साथ साथ छात्रों के शारीरिक में भी सहायक हो। मिड डे मील की सूची प्रत्येक स्कूल के बाहर चार्ट में लगाना अनिवार्य होता है। यहां तक कि स्कूल में शौचालय की व्यवस्था भी नहीं है। जबकि अध्यापकों को पिछले 13 माह से वेतन तक नसीब हुआ है। इस संबंध में जब ब्लॉक के शिक्षा पदाधिकारी से बात की गई तो उन्होंने सभी समस्याओं को स्वीकार करते हुए नवंबर माह के अंत तक शौचालय की व्यवस्था करने का आश्‍वासन दिया। (ज्ञात हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि इस माह के अंत तक स्कूलों में छात्राओं के लिए अस्थाई रूप से शौचालय की व्यवस्था अवश्‍य कर लें।) जबकि शिक्षकों के वेतन के संबंध में उन्होंने मुखिया को जिम्मेदार बताया। उनका तर्क था कि सरकारी अधिकारी बिहार सरकार के नियमानुसार शिक्षकों के वेतन से संबंधित चैक पंचायत के मुखिया को सौंप देते हैं। जिन्हें आधिकारिक रूप से चैक बांटने का अधिकार प्रदान किया गया है। शिक्षकों की कमी के संबंध में उक्त अधिकारी का तर्क था कि जब तक नई बहाली नहीं होती है वह भी पूर्ण रूप से लाचार हैं जो कहीं न कही सच है। पिछले कई वर्षों से राज्य की सरकार शिक्षकों की बहाली पर जोर तो दे रही है लेकिन अब तक इस संबंध में कोई ठोस परिणाम निकल कर नहीं आया है।

इन दोनों प्राइमरी स्कूलों का जायजा लेने के बाद यह प्रष्न उठना स्वभाविक है कि आखिर 187 बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में केवल एक ही शिक्षक कैसे कामयाब हो सकता है। नियमानुसार 40 छात्रों पर एक शिक्षक की नियुक्ति अनिवार्य है फिर शिक्षकों की कमी को पूरा किए बगैर बच्चों की बुनियादी जड़ किस प्रकार मजबूत की जा सकती है। यह कैसी लापरवाही है कि एक स्कूल को आवंटित पैसा दूसरे स्कूल में चला जाए? आंकड़े बताते हैं कि कभी बिमारू प्रदेश की श्रेणी में रखा जाने वाला बिहार अब इस काली छाया से बाहर आ चुका है। वर्तमान परिदृश्‍य में देश के जो राज्य सबसे तेजी से विकास कर रहे हैं उनमें बिहार भी एक है। आम आदमी को फायदा पहुंचाने तथा विकास के लिए राज्य सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाएं काबिलेतारीफ हैं, परंतु प्रश्‍न यह भी उठता है कि योजनाओं का प्रदर्शन केवल कागज पर सिमट कर रह जाएगा अथवा धरातल पर भी यह स्वरूप लेगा। (चरखा फीचर्स) 

(लेखक बिहार के दरभंगा स्थित कुशेश्‍वरस्थान के रहने वाले हैं तथा लखनउ स्थित विश्‍व प्रसिद्ध मदरसा नदवतुल उलमा से शिक्षा प्राप्त की है। पिछले कई वर्षों से विभिन्न समाचारत्रों के माध्यम से बिहार तथा उत्तर प्रदेश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर अपने आलेख से नीति निर्धारकों का ध्यान आकृष्‍ट करते रहे हैं) 

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1 Comment on "वायदों में उलझती बिहार की शिक्षा व्‍यवस्‍था"

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आर. सिंह
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दरभंगा जिला को ,मधुबनी जिला भी कुछ वर्षों पहले तक जिसका एक अंग था,बिहार के सबसे जागरूक जिलों में गिना जाता था ,अगर वहां यह हाल है तो स्थिति सचमुच भयावह है.

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