लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

शर्मा जी यों तो हर समय राजनीतिक मूड में रहते हैं; पर यदि उनके हाथ में ताजा समाचार पत्र हो, तो समझिये कि वे बहस पर उतारू हैं। सामने जो भी मिल जाए, वे बहस शुरू कर देंगे।

– वर्मा, देश में धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री हो, इसमें बुरी बात क्या है ?

– शर्मा जी, हम और आप साधारण लोग हैं। हम कौन हैं यह तय करने वाले कि राजा कौन और कैसा हो ?

– क्यों, भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां हर व्यक्ति को अपना शासक चुनने का अधिकार है।

– यही तो आपको भ्रम है। भारत में लोकतंत्र के आवरण में आज भी राजतंत्र और परिवारवाद जीवित है। कांग्रेस में यह ऊपर के लोगों से होता हुआ नीचे तक पहुंचा। भाजपा में यह नीचे से ऊपर की ओर खिसक रहा है। सभी नेताओं ने अपनी पत्नियों और बेटे-बेटियों को राजनीति में उतार दिया है।

– पर राजनीति में ये दो ही दल तो नहीं हैं ?

– हां, पर बाकी जो दल हैं, वे तो एक परिवार और जाति या कबीले के दल हैं। वे कुछ और कबीलों को अपने साथ मिलाकर सत्ता में आ जाते हैं। फिर जैसी आवश्यकता हो, कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा के साथ हाथ मिलाकर सत्ता सुख भोगते रहते हैं।

– तुम बात को घुमा रहे हो वर्मा। मैं कह रहा था कि प्रधानमंत्री धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए।

– और मैं कह रहा हूं कि प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री, वह धर्मनिरपेक्ष भले ही न हो; पर शर्मनिरपेक्ष अवश्य होना चाहिए।

– शर्मनिरपेक्ष से तुम्हारा क्या मतलब है वर्मा ?

– देखिये शर्मा जी, इस समय भारत की राजनीति में सबसे अधिक अकाल शर्म का ही है। सब नेता और दल शर्मनिरपेक्ष हो गये हैं।

– मैं समझा नहीं ?

– राष्ट्रपति का चुनाव इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। कांग्रेस की प्राथमिकता किसी मुसलमान को राष्ट्रपति बनाना था, जिससे उसके झोले में मुसलमान वोट फिर से आ सकें; पर ममता ने मुलायम सिंह के साथ मिलकर उसे जो झटका दिया, उससे मजबूर होकर उन्हें प्रणव मुखर्जी को अपना प्रत्याशी घोषित करना पड़ा।

– ये तुम्हारा दृष्टिकोण हो सकता है, सबका नहीं।

– पर मुलायमसिंह ने ममता के साथ जो खिचड़ी पकाई थी, उस पतीली को उन्होंने अगले ही दिन उलट दिया और प्रणव बाबू का समर्थन कर दिया। इससे नाराज ममता ने प्रणव बाबू का समर्थन न करने की घोषणा कर दी। वैसे वे अंतिम समय में कहां खड़ी होंगी, यह उनके अतिरिक्त कोई नहीं जानता।

– हां, ये तो है।

– दूसरी ओर नीतीश कुमार भाजपा के कारण बिहार में सत्ता की खीर खा रहे हैं; पर इस विषय में वे भाजपा के साथ नहीं हैं। उन्हें अगले लोकसभा चुनाव के सपने आ रहे हैं। शिवसेना भी प्रणव बाबू के साथ है। उ0प्र0 में मुलायम सिंह और मायावती कांग्रेस को फूटी आंख देखना पसंद नहीं करते; पर राष्ट्रपति चुनाव में दोनों उसके साथ हैं।

– और भारतीय जनता पार्टी … ?

– उसका खेल भी बड़ा निराला है। सबसे बड़ा विपक्षी दल होने के बाद भी उसे कोई प्रत्याशी नहीं मिला। अपनी शर्म छिपाने के लिए वे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उस संगमा के पीछे आ खड़े हुए हैं, जो न कभी उनके साथ था, और न कभी होगा।

– पर नवीन पटनायक और जयललिता तो इस बार भाजपा के साथ हैं।

– किसी भ्रम में न रहो शर्मा जी। उन्हें तो कांग्रेस का विरोध करना है, इसलिए वे संगमा के साथ हैं। वे भाजपा के हितैषी न कभी थे और न कभी होंगे। यह मत भूलो कि नवीन ने विधानसभा चुनाव से एकदम पहले भाजपा को लात मारी थी और जयललिता ने अटल जी की सरकार को तेरह महीने बाद एक वोट से गिराया था।

– भाजपा को हाल खस्ता है ही; पर कांग्रेस तो मजबूत है।

– तो उसकी भी सुनो। लालू बहुत दिनों से केन्द्रीय मंत्री बनना चाहते हैं; पर कांग्रेस उन्हें घास नहीं डाल रही। अब राष्ट्रपति चुनाव के लिए वही कांग्रेस लालू से समर्थन मांग रही है और लालू मंत्रीपद के लालच में उन्हें समर्थन दे भी रहे हैं।

– तुम कहना क्या चाहते हो। मैं धर्मनिरपेक्ष प्रधानमंत्री की बात कर रहा था और तुम राष्ट्रपति चुनाव की गोटियां गिना रहे हो।

– शर्मा जी, मैं यह कहना चाहता हूं कि राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री; सत्ताधारी दल हो या विपक्ष; एक बार धर्मनिरपेक्ष न हो तो चलेगा; पर शर्मनिरपेक्षता के बिना गाड़ी बिल्कुल नहीं चल सकती। इस शर्मनिरपेक्षता के कारण राजनीति और राजनीतिक नेताओं के प्रति आम लोगों में घृणा पैदा हो गयी है। यदि ऐसे ही चलता रहा, तो लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा, फिर क्या होगा, यह सोचो।

शर्मा जी अचानक बहुत गंभीर हो गये। इससे उनके कमजोर दिल को हानि न पहुंचे, इसलिए मैंने उन्हें एक किस्सा सुनाया।

शर्मनिरपेक्ष शामलाल के दस बच्चे थे। एक बार उन्हें कहीं से दावत का निमन्त्रण मिला, तो वे पत्नी और नौ बच्चों के साथ वहां जा पहुंचे। उन्होंने एक मेज पर कब्जा कर लिया और पूर्ण मनोयोग से भोजन करने लगे। सब लोग उनके इस आचरण पर हंस रहे थे।

दावत के बाद जब वे चलने लगे, तो किसी ने पूछ ही लिया – क्यों, लज्जा नहीं आयी ? शामलाल ने हंसते हुए जवाब दिया – जी लज्जा बिटिया की कल परीक्षा है, इसलिए आ नहीं सकी; पर मैंने उसके लिए खाना इस डिब्बे में ले लिया है।

भगवान ऐसे शर्मनिरपेक्ष लोगों से इस देश को बचाये।

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1 Comment on "शर्मनिरपेक्षता"

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आर. सिंह
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एक सामयिक खुबसूरत व्यंग्य.

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