लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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aryaमहर्षि दयानन्द का स्वयं का जीवन स्वर्ण के समान प्रकाशमान व पवित्र था। वह सच्चे पारसमणि पत्थर भी सिद्ध हुए जिनको छूकर अनेक साधारण मनुष्य वेदों के बडें-बड़े विद्वान बन गये। ऐसे विद्वानों में हम पं. शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ सहित पण्डित गुरूदत्त विद्याथी, स्वामी श्रद्धानन्द, पण्डित लेखराम, महात्मा हंसराज, दर्शनानन्द सरस्वती, स्वामी वेदानन्द, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय, डा. रामनाथ वेदालंकार आदि को सम्मिलित कर सकते हैं। पं. शिवशंकर शर्मा जी ने महर्षि दयानन्द के जीवन से प्रेरणा लेकर उनके वेद प्रचार के कार्य को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और विद्वता की जो पराकाष्ठा प्राप्त की उससे उन्होंने स्वयं का कल्याण ही नहीं किया अपितु उसे देश व विश्व को प्रस्तुत कर महर्षि दयानन्द के मिशन को सफल बनाया। खेद व दुःख इस बात का है कि वह अन्य अनेक महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते थे जो जीवनकाल के समाप्त हो जाने के कारण पूरे न हो सके। वह 6 वैदिक दर्शनों सांख्य, योग, वेदान्त, वैशेषिक, न्याय और मीमांसा की ही तरह एक सातवां आर्य दर्शन भी लिखना चाहते थे जिसके लिए उनको मात्र 6 महीनों का समय चाहिये था।

उन्होंने इस कार्य को सम्पन्न करने की इच्छा तो व्यक्त की थी परन्तु वह इस कार्य को पूरा नहीं कर सके। यह वैदिक साहित्य का महत्व समझने वाले लोगों के लिए अत्यन्त दुःख का विषय है। इससे भी अधिक दुःख का विषय है कि देश व विश्व के मनुष्यों के हित में संलग्न होकर उन्होंने जिस गम्भीर वैदुष्य से युक्त वैदिक साहित्य का सृजन किया था, उसका प्रकाशन करने वाला भी आर्य जगत में दिखाई नहीं देता। वस्तु स्थिति यह है कि आर्य समाज में अनेक सम्पन्न सार्वदेशिक, प्रान्तीय सभायें व आर्य समाजें हैं। अनेक प्रकाशन संस्थायें भी हैं, परन्तु उनका बहुमूल्य साहित्य उपेक्षित पड़ा है तथा विलुप्त हो चुका है और हमें लगता है कि अब वह विनाश के कागार पर है। यह एक प्रकार से महर्षि दयानन्द व आर्यसमाज के अनुयायियों का कृतघ्नता का दोष है़ जिससे वह शायद ही मुक्त हो सकेंगे। सम्भवतः इसी कारण से पूर्व जैसे विद्वान अब आर्य समाज में होना बन्द हो गये हैं।

हमारे चरित नायक पं. शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ जी का जन्म बिहार के दरभंगा के चिहुंटा ग्राम डाकखाना कमतौल में एक सुप्रतिष्ठित मैथिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह स्थान उन दिनों संस्कृत व्याकरण, नव्य न्याय तथा दार्शिनिकों के लिए बहुत प्रसिद्ध था। पौराणिकों और शास्त्रों का तो यह एक गढ़ ही समझा जाता था। आपकी शिक्षा-दीक्षा अपनी कुल परम्परा के अनुसार हुई। संस्कृत साहित्य के पूर्ण अवगाहन को आपने अपना ध्येय निश्चित किया। प्राचीन साहित्य के मर्मज्ञ, अपने समय के सर्वमान्य तार्किक और गणितज्ञ पं. अबिकादत्त जी व्यास आपके गुरू थे। यह पण्डित जी महर्षि दयानन्द के 16 नवम्बर, 1869 को मूर्तिपूजा पर काशी के 30 पण्डितों के साथ सम्पन्न हुए देश-विदेश में चर्चित शास्त्रार्थ में भी विरोधी पक्ष के विद्वानों में सम्मिलित थे। 30 विद्वानों की सूची में आपका चैदहवां स्थान था। आर्य समाज के विद्वान स्वामी अभेदानन्द सरस्वती, पटना के अनुसार स्वामी दयानन्द और पं. अम्बिका दत्त व्यास की पटना में परस्पर भेंट हुई थी। आपस में संवाद भी हुआ। इस संवाद में रोष में भरकर श्री व्यास ने महर्षि दयानन्द को कहा कि लोग श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों का खण्डन तो झट करने लग जाते हैं परन्तु उनकी अपनी योग्यता की यह अवस्था है कि श्रीमद्भागवत के श्लोकों की जोड़ के पांच श्लोक भी नहीं बना सकते? इस पर हंसते हुए महर्षि ने प्रत्युत्तर में कहा था–व्यासजी लिखिए, कितने श्लोक आप लिखना चाहते हैं। इसके अनन्तर महर्षि ने उसी समय पादत्राण और चरणपादुका का परस्पर संवाद विषय रखकर ही धाराप्रवाह, सुललित छन्दों में श्लोकरचना आरम्भ कर दी थी। तब महर्षि के अगाध पाण्डित्य का लोहा श्री व्यास जी महाराज को मानना पड़ा था। इस भेंट के पश्चात् तो वे महर्षि के भक्त और प्रशंसक ही बन गए थे।

श्री व्यास जी, श्री शिवशंकर जी को महर्षि की महिमा, विद्या और जीवन सम्बन्धी घटनायें प्रायः सुनाया करते थे। यह भी बतातें होंगे कि वह काशी शास्त्रार्थ में किस प्रकार से उनके विरोधी थे। पण्डित व्यास जी शिवशंकर जी की प्रतिभा और विद्या में अभिरूचि पर बहुत अधिक मुग्ध थे और उनको सब प्रकार से सुयोग्य बनाने का बहुत ध्यान रखते थे। इस प्रकार पं. शिवशंकर के हृदय में महर्षि के प्रति भक्तिभाव और विशेष अनुराग का बीज बोने वाले भी श्री व्यास जी ही थे, ऐसी सम्भावना है जबकि आर्य विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय इससे सहमत नहीं है। तब कौन जानता था कि गुरू पं. अम्बिकादत्त व्यास जी द्वारा अज्ञातभाव से बोया गया बीज किसी दिन विशेष रूप से पल्लवित, पुष्पित और सुविकसित होगा और उनका शिष्य शिवशंकर महर्षि दयानन्द का सुदृण़ भक्त, अनुयायी और प्रचारक बनकर वैदिक तत्वों के प्रसार में विशेष सफलता प्राप्त करेगा।

इस प्रकार पं. शिवशंकर शर्मा जी हृदय में महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों के अध्ययन की प्रेरणा उत्पन्न हुई। उन्होंने अध्ययन आरम्भ किया तो उन्हें पता चला कि उनका उस समय तक का सारा समय और परिश्रम व्यर्थ हो गया है। वेदों के ज्ञान के बिना उनकी सम्पूर्ण विद्या और योग्यता निष्फल है। अतः उन्होंने वेदों के अध्ययन में विशेष परिश्रम करना आरम्भ किया और फिर तो अपना सारा जीवन ही उन्होंने वेदों के मनन, पठन-पाठन, उच्च कोटि के शास्त्रीय ग्रन्थ लेखन, शास्त्रार्थ, उपदेश, शिक्षण और प्रचार में लगा दिया। पण्डित जी अपने विद्याध्ययन और पुरूषार्थ से वैदिक साहित्य के गम्भीर व उच्च कोटि के विद्वान बन गये। वह महर्षि दयानन्द और आर्य समाज को अपना आदर्श मानने लगे। अपने ग्राम में उन्होंने एक आर्य समाज की स्थापना भी कर दी। पौराणिक पण्डित भला कब इसे सहन कर सकते थे। पण्डित जी का विरोध किया गया और उन्हें हानि पहुंचाने के प्रयत्न किये गये। पण्डित जी ने महाराजा दरभंगा को न्याय की याचना सहित विस्तृत पत्र लिखा, परन्तु इससे कोई लाभ न हुआ अतः पण्डित जी ने अपने क्षेत्र को छोड़कर रांची जा कर वहां सन् 1898 से 1900 तक श्री बालकृष्ण सहाय, बार-एट-ला, प्रथम प्रधान, बंगाल-बिहार आर्य प्रतिनिधि सभा के साथ मिलकर वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार का कार्य किया। आर्य समाज के प्रख्यात कर्मकाण्डी शीर्ष विद्वान स्वामी मुनीश्वरानन्द जी ने यहां आपसे व्याकरण का विधिवत् अध्ययन किया था। बिहार से पण्डित जी अजमेर पधारे और यहां परोपकारिणी सभा को छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद के संस्कृत-हिन्दी के विस्तृत भाष्य तैयार कर दिये जिनका प्रकाशन परोपकारिणी सभा के द्वारा किया गया।

स्वामी श्रद्धानन्द जी को पण्डित शिवशंकर शर्मा जी की योग्यता का ज्ञान हुआ तो आपने उन्हें आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब की ओर से आमंत्रित किया और उन्हें सभा की संस्था गुरूकुल कांगड़ी में वेदाध्ययन कराने हेतु प्रथम वेदापाध्याय नियुक्त किया। यहां से बाद में पण्डित जी को पंजाब सभा के कार्यों के लिए बुलाया गया और जालन्धर व लाहौर में रखकर उनकी सेवायें ली गईं जो चिरस्मरणीय हैं। यहां रहकर ही पण्डित जी ने अपनी कालजयी कृतियों ओंकार निर्णय, त्रिदेव-निर्णय, जाति-निर्णय, श्राद्ध-निर्णय, वैदिक इतिहासार्थ-निर्णय आदि बड़े-बड़े ग्रन्थों की रचना की। इन ग्रन्थों के साथ ही पण्डित जी ने समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन किया। इन ग्रन्थों में चतुर्दश-भुवन, वसिष्ठ नन्दन, वैदिक-विज्ञान, वैज्ञानिक सिद्धान्त-अलौकिक-माला, श्री कृष्ण-मीमांसा, ईश्वरीय पुस्तक कौन? आदि मुख्य हैं। इनके अतिरिक्त उनकी कुछ अप्रकाशित पुस्तकों की चर्चा भी सुनने को मिलती है। इनका कुछ पता नहीं चला। अनुमान है कि वह नष्ट हो गईं। पण्डित जी ने जो साहित्य सृजन किया वह आर्य समाज की बहुमूल्य निधि है जिनके लिए आर्य जगत सदैव उनका ऋणी हैं।

सम्प्रति पण्डित शिवशंकर काव्यतीर्थ जी के सभी ग्रन्थों में से मात्र ओंकार निर्णय, जाति निर्णय, त्रिदेव निर्णय, वैदिक इतिहासार्थ निर्णय एवं वैदिक त्रैतादर्श पुस्तकें ही उपलब्ध हैं। अन्य सभी ग्रन्थ यद्यपि हिन्दी व कुछ संस्कृत-हिन्दी में हैं, परन्तु हमारी सभा व संस्थायें तथा प्रकाशकों का ध्यान इस ओर नहीं है। यह तथ्य है कि पण्डित जी के ग्रन्थों में सिद्धान्तों पर आधारित ठोस सामग्री विद्यमान है जिनका सरंक्षण आर्यसमाज के लिए आवश्यक है। वर्तमान में आर्यजगत में ऐसे विद्वान नहीं है जो इस कोटि के व इन विषयों पर ऐसे ग्रन्थ लिख सकें। अतः इन परिस्थितियों में यह स्थिति आर्यसमाज के लिए प्रशस्त नहीं है। आर्यजगत के प्रख्यात विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने लिखा है कि आर्य जगत के शिरोमणी विद्वान स्वामी वेदानन्द जी तीर्थ कहा करते थे थे कि ऋषि दयानन्द के वेद विषयक दृष्टिकोण को जितना पं. गुरूदत्त जी विद्यार्थी व पं. शिवशंकर जी काव्यतीर्थ ने समझा था उतना और किसी ने नहीं समझा। आर्यजगत के चोटी के विद्वान पं. चमूपति के अनुसार पं. शिवशंकर काव्यतीर्थ जी की कृतियां आर्य साहित्य का एक पाण्डित्यपूर्ण अंग हैं। प्रा. जिज्ञासु जी के अनुसार पण्डित शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ जी के साहित्य की एक-एक पंक्ति विचारोत्तेजक है। आपका साहित्य रोचक व प्रेरक भी है, नीरस नहीं है, जो मौलिकता आपके ग्रन्थों में है, वह आज के विरले ही लेखकों में मिलेगी। इसी कारण आर्य समाज के सर्वश्रेष्ठ व लोकप्रिय उर्दू मासिक आर्य मुसाफिर में आपके वैदिक पीयूषबिन्दु को गागर में सागर लिखा जाता रहा। यह आर्य समाज के साहित्य में अपनी शैली व विषय की प्रथम पुस्तक थी और बहुत लोकप्रिय रही। आज इस पुस्तक के देश व आर्यसमाज में कहीं दर्शन नहीं होते। आर्य सभायें, संस्थायें व आर्यसमाज पण्डित जी की इस मूल्यवान कृति को भूल चुके हैं। हमें यह भी आशंका है कि अब इसकी कोई प्रति शायद ही प्रकाशनार्थ कहीं से मिल सके।

जिज्ञासु जी यह भी बताते हैं कि पण्डित जी के पाण्डित्यपूर्ण लेख तत्कालीन हिन्दी के पत्रों में तो यदा-कदा छपते ही थे, आर्य समाज के सब उर्दू पत्र भी कभी-कभी उनके लेखों को अनूदित करके देते रहते थे। पण्डित जी का कार्यक्षेत्र सारा उत्तर भारत रहा। जिन दिनों पण्डित जी ने गुरूकुल कांगड़ी में वेदोपाध्याय के रूप में अपनी सेवायें दी, उन दिनों वहां के सब यशस्वी स्नातकों को आपके चरणों में बैठकर कुछ सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आप जहां एक कुशल लेखक, गवेषक एवं विचारक थे वहीं एक सिद्धहस्त शास्त्रार्थ महारथी भी थे। आपकी स्मृति असाधारण थी। सहस्रों प्रमाण आपको कण्ठस्थ थे। सूझ बहुत अच्छी थी। आपने पौराणिक विद्यानों से कई शास्त्रार्थ किये। विपक्षी भी आपकी योग्यता का लोहा मानते थे। आप बहुत उच्च कोटि के आस्तिक थे। जीवन की अन्तिम वेला में एक भयंकर रोग आपको हो गया। आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब ने अपना कर्तव्य निभाते हुए उस विपदा की वेला में आपको आर्थिक सहयोग जारी रखा। उनके रोग को देखकर जब आर्यजन यह कहते–पण्डित जी ! आपको ईश्वर ने यह भयंकर यातना दे दी। आप बड़े गम्भीर स्वर से कविरत्न प्रकाश जी के समान सबको यही उत्तर दिया करते थे कि ईश्वर की दया न्याय पर्याय है। ईश्वर न्याय करता है, यही उसकी दया है। वह प्रभु इसी कारण दयालु है कि वह अन्याय नहीं करता। मेरा रोग, मेरा दुःख मेरे ही कर्मों का फल है। अच्छा है कि वह भुगत जाय। वे उस अवस्था में कभी विचलित नही देखे गये।

पं. शिवशंकर शर्मा जी के विद्या गुरू पं. अम्बिका दत्त व्यास महर्षि दयानन्द के विरोधी व निन्दक थे। ऐसे शिष्य द्वारा अपने गुरू के विरोधी स्वामी दयानन्द जी के सिद्धान्तों व दार्शनिक दृष्टिकोण का अपनी ज्ञान-प्रसूता लेखनी से डंका बजाना महर्षि दयानन्द की अपूर्व दिग्विजय का द्योतक है। यह ऐसा ही लगता है जैसे की विभीषण जी व सुग्रीव जी द्वारा राम की सेवा में आना था। पण्डित जी ने वैदिक सिद्धान्तों पर असाधारण अधिकार प्राप्त करके आर्यसमाज के विस्तृत क्षेत्र में पदार्पण किया। आर्य समाज के आरम्भिक युग के नेताओं व विद्वानों ने आपके व्यक्तित्व व प्रतिभा को पहचान कर आपका यथोचित सम्मान किया। आर्य जगत के शीर्षस्थ विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय के अनुसार आर्य समाज के प्रारम्भिक काल के जिन साहित्यकारों ने अपनी विद्वतापूर्ण कृतियों से आर्य-साहित्य के भण्डार की अभिवृद्धि की है उनमें पं. शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ का नाम सर्वप्रमुख है। एक अन्य सन्दर्भ में उन्होंने लिखा है कि स्वामी दयानन्द जी के सिद्धान्तों के प्रति पं. शिवशंकर जी के हृदय में श्रद्धापूर्ण भाव उत्पन्न हुए और उन्होंने शीघ्र ही दयानन्द-वाड़मय का अध्ययन कर अपने आपको वेदों के स्वाध्याय में लगा दिया।

इस प्रकार सर्वशास्त्र-निष्णात होकर पण्डित जी कट्टर आर्यसमाजी और आर्योपदेशक के रूप में लोगों के समक्ष आये। पण्डित जी आर्यावर्त्त पत्र सहित अनेक पत्रों में सिद्धान्त सम्बन्धी लेख भी लिखा करते थे। बिहार से चलकर पण्डित जी ने अजमेर में 1903 से 1906 तक निवास किया। यहां परोपकारिणी सभा के तत्वावधान में राजस्थान, मध्यभारत, गुजरात में प्रचार किया, छान्दोग्य तथा वृहदारण्यक उपनिषदों पर बृहद-भाष्य-रचना की। ये उपनिषद्-भाष्य पण्डित जी की अपूर्व विद्वत्ता और उनकी शास्त्रज्ञता के ज्वलन्त प्रमाण हैं। आकार की दृष्टि से शांकर भाष्य के अनन्तर इतने विस्तृत भाष्य और किसी ने नहीं लिखे। सम्प्रति यह भाष्य देश में अनुपलब्ध हैं और इसके प्रकाशन पर किसी संस्था व प्रकाशक का ध्यान नहीं है। भारतीय जी ने आर्यजगत का ध्यान दिलाते हुए यह भी लिखा है कि कुछ भी हो यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि शिवशंकर जी आर्यसमाज के महान् लेखक थे। उनके ग्रन्थ आदि पुनमुद्रण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या आर्य प्रकाश कइस ओर ध्यान देंगे? स्वामी अभेदानन्द जी ने लिखा है कि मैं यह कहना चाहता हूं कि साधारण जनता ने अज्ञानवश और विज्ञजनों ने अहम्मन्यतावश श्रद्धेय पण्डित जी के साहित्य की ओर उतना ध्यान नहीं दिया जितना कि देना आवश्यक था। इसी प्रकार उनके पारिवारिक जनों के प्रति भी उपेक्षा का ही व्यवहार हुआ है जो कि आर्यसमाज के लिए किसी प्रकार भी शोभनीय नहीं है। सभी सुशिक्षित युवकों और युवतियों को सलाह देते हुए स्वामी अभेदानन्द जी कहते हैं कि यदि वे वेदों के रहस्यों, तत्वों और सिद्धान्तों को जानने की उत्सुकता रखते हैं, तो मैं सम्मति दूंगा कि वे एक बार स्वर्गीय पण्डित जी के ग्रन्थों को अवश्य ही पढ़ें और उनके पुनः प्रकाशन में अवश्य ही अपना सहयोग दें (सब ग्रन्थों को तो तभी पढ़ पायेंगे जब सभी उपलब्ध होंगे-लेखक)।

हमने पण्डित जी द्वारा 6 दर्शनों के समान एक अन्य दर्शन आर्यदर्शन की रचना के विचार का उल्लेख लेख के पूर्व में किया है। इस सम्बन्ध में स्वामी अभेदानन्द जी की लेखनी से निःसृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। वह लिखते हैं कि ‘‘एक बार पण्डित जी ने मुझसे कहा था कि अन्य दर्शनों के समान ही एक आर्यदर्शन लिखने की उनकी प्रबल इच्छा है। यदि छह मास का समय भी शान्ति से एकान्तसेवन का मिल गया, तो मैं अपना मानसिक वातावरण आर्यदर्शन लिखने के उपयुक्त बना लूंगा। उस आर्यदर्शन में आस्तिक, नास्तिक, पौरस्त्य और पाश्चात्य सभी प्राप्त दर्शनों का ऊहापोह करके वेदप्रतिपादित सिद्धान्तों का मैं अकाट्य स्वरूप खड़ा करूंगा। खेद है कि उन्हें इस कार्य का अवकाश मिला। पण्डित जी चल बसे और यह कार्य होने से रह गया।

लेख को विराम देने से पूर्व हम कुछ चर्चा उनकी जन्म व मृत्यु की तिथी को लेकर करना चाहते हैं। हमारे पास उपलब्ध साहित्य में स्वामी अभेदानन्द, आचार्य विजयपाल, प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी तथा डा. भवानीलाल भारतीय जी के लेख हैं। इनमें से किसी ने भी पं. शिवशंकर शर्मा जी के जन्म व मृत्यु की तिथी तथा वर्ष का उल्लेख अपने लेख व आर्यलेखककोष ग्रन्थ आदि में नहीं किया। क्या कारण रहे, कह नहीं सकते। अतः हमने अनुमान लगाया है जिसके अनुसार इनका जन्म लगभग सन् 1870 और मृत्यु सन् 1931 व इसके बाद के दो तीन वर्षों में होने का अनुमान है। इसी प्रकार से इन लेखों से पण्डित जी के परिवार के बारे में भी कुछ प्रकाश नहीं पड़ता। उपलब्ध हमारी जानकारी के अनुसार पण्डित जी अविवाहित प्रतीत होते हैं। पण्डित जी की पुस्तक ‘ओंकार निर्णय’ का परिचय देते हुए स्वामी अभेदानन्द सरस्वती ने लिखा था कि इस समय पण्डित जी के लघुभ्राता श्री पण्डित श्यामहीत जी और उनके भ्रातृव्य श्री पण्डित यज्ञवल्लभ जी अपने पारिवारिक जीवन की कठिनाइयों को सहते हुए भी आर्यसमाज के साथ हैं। इस विवरण से यह भी ज्ञात होता कि पण्डितजी के यह दोनों भाई भी महर्षि दयानन्द व आर्यसमाज के अनुयायी थे जिसका कारण पण्डित शिवशंकर जी का उन पर प्रभाव होना ही हो सकता है।

सम्प्रति पण्डित जी के कुछ ग्रन्थ ओंकार निर्णय, जाति निर्णय, त्रिदेव निर्णय, वैदिक इतिहासार्थ निर्णय तथा त्रैतसिद्धान्तादर्श तो उपलब्ध हैं परन्तु अन्य सभी ग्रन्थ अनुपलब्ध व विलुप्ति के कागार पर हैं। हम आर्य सभाओं, संस्थाओं एवं प्रकाशकों को इन ग्रन्थों का प्रकाशन करने की अपील करते हैं जिससे पण्डित शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ जी का यशःशरीर मृत्यु को प्राप्त न होकर अमर व चिरकीर्तिवान हो। जहां तक दायित्व का प्रश्न है इसमें दायित्व प्रकाशकों से कहीं अधिक हमारी सभाओं व आर्यसमाजों का है।

मनमोहन कुमार आर्य

 

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