लेखक परिचय

ब्रह्मदीप अलुने

ब्रह्मदीप अलुने

.राजनीति विज्ञान एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध , शा. माधव कला, वाणिज्य एवं विधि महा. उज्जैन

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ब्रह्मदीप अलुने

स्वामी विवेकानंद को युवाओं के लिए महान पथ प्रदर्शक माना जाता है। उन्होंने युवाओं में ऐसी ऊर्जा का संचार करने का सदैव प्रयत्न किया जिससे भारत एक मजबूत राष्ट्र बन सके और अपने गौरव को स्थापित कर सके। युवा किसी राष्ट्र की ऊर्जा होते है, प्राणवायु बनकर राष्ट्र के स्नायुतंत्र में बहते है। वे युवाओं से कहते कि भविष्य को तय करने का यही समय है। युवाओं को नए जोश से काम करना चाहिए। काम करने का यही समय है। इसलिए अभी अपने भाग्य का निर्माण कर लो और काम में लग जाओ। क्योंकि तुम वो फूल हो जिसकी सुंदरता और वैभवता स्थापित हो सकती है।

भारत में व्याप्त गरीबी, दरिद्रता, अशिक्षा और अंधविश्वास को स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र की प्रगति में चुनौती बताते हुए युवाओं से भारत को मजबूत करने का आह्वान किया। वर्तमान में दुनिया में सबसे ज्यादा युवा भारत में ही है, दुनिया के सामने असंख्य चुनौतियां है, मानव अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है, पर्यावरण निरंतर दुषित हो रहा है। ऐसे समय में भारत की भूमिका विश्व में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। समस्याएं और चुनौतियां हमारे राष्ट्र में भी कम नहीं है। समस्याएं अनगिनत है, राष्ट्र के सामने अनगिनत खतरे है। अशिक्षा आज भी हमें पिछड़ेपन की ओर ले जाती है तो अंधविश्वास समाज को पीछे धकेलता है। गरीबी आज भी व्याप्त है और आतंकवाद मुंह पसार रहा है। स्वामी विवेकानंद ऐसी समस्याओं का सामना करने में युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण समझते थे।

उन्होंने कहा – ’’लाखों युवा स्त्री पुरूष जिनमें पवित्रता की आग है, ईश्वर के प्रति चिर श्रद्धा का दुर्ग है, जिनमें गरीबों और पिछड़ों के प्रति सहानुभूति का सिंह जैसा साहस है, वे भारत भूमि के कोने-कोने तक पहुंचकर मुक्ति का संदेश, सहायता का संदेश, सामाजिक उत्थान और समानता का संदेश देंगे। विवेकानंद के विचारों में नवयुवक ही समग्र भारत का निर्माण कर सकते है। उन्होंने कहा – सबकुछ हो जाएगा, किंतु आवश्यकता है, वीर्यवान, तेजस्वी, श्रीसंपन्न और पूर्ण प्रामाणिक नवयुवकों की। मेरी आशा इस नवोदित पीढ़ी में केंद्रित है। मैंने अपना लक्ष्य निर्धारण कर लिया है और संपूर्ण जीवन उसके लिए समर्पित कर दिया है। यदि मैं सफलता प्राप्त नहीं कर पाता तो उसे पूरा करने के लिए कोई अन्य आएगा और मुझे संघर्ष करते रहने में संतोष प्राप्त होगा।

स्वामी विवेकानंद भारत और उसकी जनता के लिए प्रेम की एक मूर्ति थे। जो भी उनके संपर्क में आया उन्होंने उसमें भारत के प्रति प्रेम जाग्रत कर दिया। विवेकानंद के विचारों और वाणी में ऐसा चमत्कार था कि समस्त ग्रंथ भी लोगों में ऐसा भाव नहीं जगा सकते थे, जिन्होंने भी विवेकानंद को सुना उन पर प्रेम का जादू चल गया। निःसंदेह उनके इस साहस और विश्वास से पश्चिम के सहस्त्र लोगों में भारत और उसकी सभ्यता के प्रति प्रेम जाग्रत हो गया था।

स्वामी विवेकानंद ने विश्व के कोने-कोने तक भारतीय वेदों और पुराणों को पहुंचाया था। उन्होंने दुनियाभर का भ्रमण कर इस बात का अनुभव किया था कि पश्चिम और पूर्व में केवल इतना ही अंतर है कि उनमें राष्ट्रभाव व्यापक है जबकि हममें नहीं है अर्थात् वहां शिक्षा और सभ्यता जन साधारण तक प्रवेश कर चुकी है। वे शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के पक्षधर थे। लेकिन वे शिक्षा को आध्यात्म और राष्ट्र से संबंधित चाहते थे। उनके विचारों में सच्ची शिक्षा वह प्रशिक्षण है जिसके द्वारा विचारधारा एवं भाव अभिव्यक्ति को नियोजित, नियमित और कल्याणकारी बनाया जा सके। सच्ची शिक्षा तो वह है जो मानव बुद्धि, ज्ञान एवं दृष्टिकोण को विकसित कर व्यापक बना सके और व्यक्ति में न्यायप्रियता, सत्यप्रियता एवं कार्यदक्षता उत्पन्न कर सकें। सच्ची शिक्षा का लक्ष्य ही यथार्थ मानव का निर्माण होता है।

स्वामी विवेकानंद के विचारों में शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति और इच्छा शक्ति का समावेश था। वे युवाओं में ऐसी ही शक्ति देखना चाहते थे। स्वामी विवेकानंद ऐसे राष्ट्र की रचना करना चाहते थे जिसकी मांसपेशियां लोहे की और शिराएं इस्पात की बनी हो और उसके अंदर वज्र के समान मस्तिष्क हो। वे अपने देशवासियों के अंदर शक्ति पौरूष और ब्रह्मतेज का विकास करना चाहते थे।

यदि हम स्वामीजी की शिक्षाओं का निरूपण करना चाहें तो हम यही कहेंगे कि उन्होंने हमें एक महान मंत्र दिया और वह यह कि ईश्वर में विश्वास करो, अपने आप में विश्वास करो। वे भारतीयों के गौरव और स्वाभिमान का बोध कराने को सदैव तत्पर रहे। उन्होंने भारत भूमि को दर्शन आध्यात्मिकता नीतिशास्त्र इत्यादि का ऐसा पुण्यधाम बताया जो पशुत्व के विरूद्ध विश्राम स्थल है। उन्होंने कहा कि भारत वह देश है जो धर्म को व्यवहारिक एवं सच्चा रूप प्राप्त हुआ। भारत में मानव अन्तःकरण का विस्तार इतना अधिक हुआ कि उसमें संपूर्ण मानव जाति समा गई तथा प्रकृति को भी स्थान मिल गया। वे भारतीयों से आह्वान करते हैं कि सभी आत्म विश्वासी बनें, महापुरूषों का सम्मान करें। उनके नाम से लज्जित मत होओ। अपने पुरूषार्थ से अपनी आंतरिक शक्तियों को विकसित करो। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने जीवन के मर्म को समझा और दुनिया को दिया मानवता, कर्म, प्रेम, करुणा और विकास का संदेश। वास्तव में विवेकानंद एक ऐसे ओजस्वी और तेजस्वी युवा थे जिनकी प्रज्ञा के प्रकाश ने न केवल इस भूतल को बल्कि समस्त जग को आलोकित कर दिया है और जग के समस्त सरस्वती पुत्रों ने उनके समक्ष नतमस्तक कर दिया। वे युवाओं के ऐसे प्रेरणास्त्रोत बने जिन्होंने यौवन को उच्चता की प्राप्ति का मार्ग बताया। करोड़ों युवाओं को निद्रा से जगाया, उनकी ध्वनि ने राष्ट्र में उर्जा का संचार कर दिया।

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