लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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-प्रवीण दुबे-
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किसी ने सच ही कहा है, लोकतंत्र में जनता भगवान की तरह है। वह जिसे चाहे सिंहासन पर बैठा दे और जिसे चाहे धूल में मिला दे। बड़े अफसोस की बात है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को सबसे पुराने राजनीतिक दल ने न केवल जनता जनार्दन की अनदेखी की बल्कि अपनी भ्रष्ट नीतियों और जनविरोधी कार्यों से जनता को नौ-नौ आंसू रोने के लिए मजबूर कर दिया। आज उसी जनता जनार्दन ने लोकतंत्र में अपनी ताकत का अहसास कुछ इस तरह कराया कि कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर जा गिरी। 16 मई को जो जनादेश ईवीएम से बाहर आया है वह कई मायनों में अद्भुत, आश्चर्यजनक और अनोखा होने के साथ-साथ बहुत कुछ संकेत देता है। अब यह बात अलग है कि हमारे राजनीतिक विश्लेषक अपने-अपने अनुसार इसका विश्लेषण कर रहे हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो कुछ कांग्रेसियों के बयानों को देखकर हो रहा है। वह अभी भी यह मानने को तैयार नहीं कि इस देश की जनता वास्तव में कांग्रेस मुक्त भारत देखना चाहती है। यदि ऐसा नहीं होता तो तमाम सारे प्रदेशों में कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ नहीं होता। जहां उसे कुछ सीटें मिली भी हैं वह उम्मीदों से बहुत कम या नहीं के बराबर ही कही जा सकती हैं।

देश की राजधानी दिल्ली हो अथवा अपने भीतर देश की सांस्कृतिक विरासत को समेटने वाला प्रदेश राजस्थान हो, पहाड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाला हिमाचल, उत्तराखंड हो अथवा मोदी का गुजरात या फिर गोवा कांग्रेस अपना खाता ही नहीं खोल सकी। आखिर इससे ज्यादा शर्मनाक क्या होगा? उन दो प्रदेशों की बात की जाए जिनके लिए यह कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता यहीं से होकर पहुंचता है। ऐसे उत्तर प्रदेश और बिहार में न केवल कांग्रेस बल्कि मोदी पर दंभोक्तिपूर्ण आरोप लगाने वाले मुलायम और सपा जैसे दल किस कोने में सिमट कर रह गए इसकी शायद राजनैतिक पंडितों ने कभी कल्पना तक नहीं की होगी। यह जनादेश उन लोगों के मुंह पर भी कड़ा तमाचा कहा जा सकता है जो भाजपा को राष्ट्रीय जनाधार वाली पार्टी मानने से इंकार करते रहे हैं और 15 मई की देर रात्रि तक यह मानने को तैयार नहीं थे कि भाजपा अपने बूते 272 का जादुई आंकड़ा पार कर लेगी। जनादेश गवाह है कि भाजपा ने पूरे देश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इस जनादेश ने उस मिथक को भी तोड़ा है। कि भाजपा को अल्पसंख्यक खासकर मुसलमानों का वोट नहीं मिलता, उसे दलित, पिछड़ों का वोट नहीं मिलता। यदि मुसलमान वोट भाजपा को नहीं मिलता तो शायद बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भाजपा प्रत्याशी बड़े अंतर से चुनाव नहीं जीतते और न ही भाजपा को इन प्रदेशों में इतनी सीटें प्राप्त होती। इस जनादेश ने इस बात के सभी संकेत दे दिए हैं कि इस देश की जनता अब सेक्युलर-सेक्युलर के राग से उकता चुकी है, वह झूठे वादों, जातिगत राजनीति, तुष्टीकरण के मोहपाश की असलियत को भी समझ गई है। यही वजह रही कि मोदी के विकास और सुशासन की बात को उसने अपना भरपूर समर्थन दिया। साफ है जनता अब केवल विकास की राजनीति चाहती है। जनता ने भाजपा को प्रचंड बहुमत के साथ सत्तासीन करके इस बात के संकेत भी दिए हैं कि अटल सरकार के समय भाजपा को स्पष्ट बहुमत न होने के कारण जो वादे अधूरे रह गए थे वह पूरे किए जाएं। अयोध्या में राममंदिर निर्माण हो, कश्मीर में धारा 370 का मामला हो, समान नागरिक संहिता जैसे तमाम ऐसे विषय हैं जो शुरुआत से भाजपा की प्राथमिकता रहे हैं। अब स्पष्ट जनादेश के बाद मोदी पर एक बड़ी जिम्मेदारी जनता ने डाल दी है। यह सच है कि समस्याएं बहुत हैं और जनता की अपेक्षाएं भी बहुत ज्यादा हैं लेकिन मोदी में वह योग्यता है कि वह अपने कुशल नेतृत्व के द्वारा इस राष्ट्र की सभी समस्याओं का समाधान करेंगे और अच्छे दिन अब दूर नहीं।

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