लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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-पंकज झा

 

भैरों सिंह शेखावत जी के निधन ने लोकतंत्र के वास्तविक जनाधार को समेट कर रखने वाले, बिना किसी समझौता के जनमत का रुख अपनी ओर मोड़ लेने वाले, भीड़ की हां में हां मिलाने के बदले, भीड़ से अपनी उचित बात मनवा लेने वाले एक विरले नायक को देश से वंचित कर दिया. वर्तमान राजनीति में जहां आज ‘खाप’ के जनमत के आगे सभी पार्टियों के प्रतिनिधि नतमस्तक नज़र आ रहे हैं, वहां दिबराला सती कांड का वाकया उल्लेखनीय है. जब मोटे तौर पर उया समय भी ‘खाप पंचायतों का जनमानस की ही उस समय के जनमत का रुख सती कांड के पक्ष में था. लोग सती प्रथा को महिमामंडित करने लगे थे. उस समय भी क़ानून और समाज के बीच एक संघर्ष की स्थिति निर्मित हो गयी थी. तब राजस्थान के गांव-गांव जा कर शेखावत जी ने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया था कि लोग किसी भी तरह के अंधविश्वास को प्रश्रय ना देते हुए सभ्य समाज के मानकों का प्रयोग करें. हर सभा में शेखावत जी अपना ही उदाहरण देते थे कि उनके पिताजी का निधन इनके किशोरावस्था में रहते ही हो गया था, अगर उस समय उनकी माताजी को सती हो जाना पड़ता तो शेखावत जी का क्या होता? मोटे तौर पर लोग सहमत भी हुए थे उनकी बातों से. तो आज की फटा-फट राजनीति भले ही तात्कालिकता के आधार पर फैसले लेने के लिए जाना जाता हो. लेकिन जनमत परिष्कार का थोडा रपटीला, कठिन एवं कंटकाकीर्ण लेकिन शाश्वत मार्ग का संधान करने वाले कुछ विरले लोगों में से एक आज हमारे बीच नहीं रहे.

23 अक्टूबर 1923 को राजस्थान के सीकर जिले के एक छोटे से गांव खाचरिया-वास में जन्म लेकर राष्ट्र के क्षितिज तक पहुचना, एक आरक्षक की नौकरी से भारत के उपराष्ट्रपति पद तक का सफर न ही आसान था और न ही सामान्य मानव के बस की बात. लेकिन चुनौतियों से पार पा कर राष्ट्र को दिशा देने वाले नायक को ही तो भैरो सिंह शेखावत कहा जाता है. यह उनके ही व्यक्तित्व का कमाल था कि जब उन्हें  भाजपा नीत राजग ने राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया तब ‘गणित’ बिलकुल खिलाफ होते हुए भी लोग आश्वस्त जैसे थे कि शायद इस सबसे बड़ी लड़ाई को भी जीत ही लेंगे. आज जब झामुमो के द्वारा गठबंधन धर्म के उल्लंघन के कारण  झारखण्ड में अस्थिरता का वातावरण निर्मित हुआ है तब उस राष्ट्रपति चुनाव के समय राजग के मुख्य घटक शिवसेना द्वारा दिए गए धोखे की भी याद आ रही है. राष्ट्रपति  के लिए होने वाले चुनाव में भी क्षेत्रीय आधार पर निर्णय लेकर, गठबंधन धर्म का उल्लंघन कर शिवसेना ने लोकतांत्रिक परम्पराओं पर कुठाराघात ही किया था. लेकिन तब भी अविचलित रह कर शेखावत जी ने अपने वास्तविक सहयोगियों के साथ उस हारी हुई लड़ाई को जीतने में भी जी-जान लगा दी. और वह हार कर भी नैतिक रूप से विजयी हुए थे.

सात अलग-अलग विधान सभा क्षेत्र से विधायक चुना जाना, तीन बार मुख्यमंत्री और इतनी ही बार नेता प्रतिपक्ष, फिर राज्य सभा का सदस्य और अंततः भारत के ग्यारहवें उप राष्ट्रपति पद तक पहुचना यह उनके अद्भुत संघर्ष क्षमता और प्रतिभा का ही द्योतक माना जा सकता है. साथ ही उनके कद्दावर व्यक्तित्व, निस्संदेह जनाधार, समाज के हर क्षेत्र में उनकी पैठ का ही उदाहरण है. सामान्यतया विपक्षी दलों में भी अपनी लोकप्रियता और संकट के समय उनका भी समर्थन हासिल कर लेने के कारण वह भरोसे के एक प्रतीक ही बन गए थे.

लंबे समय तक उनके साथ काम करने वाले, उनके सहगामी ही रहे रामशंकर अग्निहोत्री उनको याद करते हुए कहते के अनुसार, एक बार भयंकर दुर्घटना हो जाने के बाद शेखावत जी के बचने की उम्मीद बिलकुल नहीं थी. तब गुरूजी गोलवरकर  उनको देखने गए और कहा कि ‘बहादुर उठो काम बहुत बाकी है, इस तरह लेटे रहने से काम नहीं चलेगा.’ और वास्तव में ढेर सारे बाकी कार्यों का संपादन करने वह राजस्थानी बहादुर उठ खड़े हुए थे और उन्होंने उपरोक्त सभी कामों का, नियति द्वारा सौपे दायित्वों का सम्यक निर्वहन किया था. निश्चित ही ‘काम’ अभी भी शेष है. उनके बताये, दिखाए मार्ग का अनुकरण कर, राष्ट्र गौरव को अधिष्ठित करने प्राण-पण से जुट कर ही दिवंगत नायक को सही और सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है.

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