लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
पंजाब में इस बार कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस ने अपना परचम फहरा जिया है । पंजाब विधान सभा की कुल सीटें ११७ हैं । ये ११७ सीटें पंजाब के तीन भौगोलिक खंडों में विभक्त हैं । मालवा क्षेत्र में सबसे ज्यादा ६९ सीटें आती हैं । उसके बाद दोआबा में २३ और माझा में २५ सीटें आती हैं । मालवा परम्परागत रूप से अकाली दल का गढ़ माना जाता है । दोआबा और माझा के बारे में कहा जाता है कि वहाँ कांग्रेस का ज़ोर रहता है । लेकिन माझा के ग्रामीण क्षेत्रों में अकाली दल भी धावा मार सकता है और वह मारता भी रहा है ।

इस बार पंजाब के 2017 के चुनावों में दो की बजाए तीन मुख्य खिलाड़ी हो गए थे । अकाली-भाजपा गठबंधन , आम आदमी पार्टी और कांग्रेस । जहाँ तक सीटें जीतने का सवाल है कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस ने 77 सीटें जीतीं और उसे 38.5 प्रतिशत मत मिले । अकाली दल को 15 सीटें और 25.2 प्रतिशत मत मिले । अकाली दल ने इन पन्द्रह सीटें में से 8 सीटें मालवा से , 5 दोआबा से और 2 माझा से जीती हैं । यह उसका 1966 से लेकर आजतक का सबसे ख़राब प्रदर्शन कहा जा सकता है । भारतीय जनता पार्टी को केवल तीन सीटें और 5.4 प्रतिशत मत मिले । आम आदमी पार्टी को 20 सीटें और 23.7 प्रतिशत मत मिले । आम आदमी पार्टी को 18 सीटें मालवा से , 2 दोआबा से मिलीं । २०१२ के चुनावों में भाजपा ने २३ सीटें लड़ कर १२ सीटें जीतीं और ७.१८ प्रतिशत मत प्राप्त किए । अकाली दल ने ९४ सीटें लड़ कर ५६ सीटें जीतीं और ३४.७३ प्रतिशत मत प्राप्त किए । अकाली दल और भाजपा का आपसी गठबन्धन था । कांग्रेस ने सभी ११७ सीटों पर कर ४६ सीटें जीती और ४०.११ प्रतिशत मत प्राप्त किए थे । 46 से 77 तक की यह छाल ऊँची उड़ान ही कही जाएगी । लेकिन कोई भी इसका श्रेय सोनिया कांग्रेस के उपाध्यक्ष और उत्तराधिकारी राहुल गान्धी को नहीं देता । जबकि संकट की इस घड़ी में राहुल गान्धी को इसी श्रेय की सबसे ज़्यादा जरुरत है ।
यहाँ तक कांग्रेस हाई कमांड का प्रश्न है , वह शुरु में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के पक्ष में नहीं थी । उसने पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजबा को बना रखा था । बाजबा की पंजाब के नेता के रुप में पहचान न बन सकती थी और न ही बनी हुई थी । इसलिए अकालियों को भी बाजवा ही सुविधाजनक लग रहा था । लेकिन अपने जीवन के आठवें दशक में प्रवेश कर चुके पटिय़ाला के पूर्व महाराजा अमरेन्द्र सिंह अपने जीवन में अकालियों , ख़ास कर प्रकाश सिंह बादल से एक बार पुराना हिसाब जरुर चुकता कर लेना चाहते थे । ध्यान रहे आप्रेशन बल्यू स्टार के बाद विरोध स्वरूप अमरेन्द्र सिंह कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर अकाली दल में शामिल हो गए थे । लेकिन कहा जाता है कि वहाँ प्रकाश सिंह बादल ने उसके पैर नहीं लगने दिए । तब अमरेन्द्र सिंह ने अपना अलग अकाली दल बना लिया था । उनके दल ने 1992 में कांग्रेस के ख़िलाफ़ पंजाब विधान सभा का चुनाव भी लड़ा । तब भाजपा भी उसके साथ थी । लेकिन अमरेन्द्र सिंह का अकाली दल केवल तीन सीटें जीत सका था । जिसमें एक सीट उनकी अपनी भी थी , जिसमें वे निर्विरोध चुने गए थे । अकाली दल में अपमानित होने के बाद वे घूमते घूमते फिर कांग्रेस में ही लौट गए । वहीं से उन्होंने बादल अकाली दल को चुनौती दी और 2002 में उसे हराकर मुख्यमंत्री बनने का अपना सपना ही पूरा नहीं किया बल्कि बादल द्वारा किए अपमान का हिसाब भी निपटा दिया । उन्होंने प्रकाश सिंह बादल को जेल के सींखचों तक पहुँचा दिया था । लेकिन 2007 में हुए विधानसभा चुनावों में बादल अकाली दल ने हिसाब चुकता कर दिया और अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस पराजित हो गई । तब आया 2012 का चुनाव । अमरेन्द्र सिंह यह मानते हैं कि 2012 के विधान सभा चुनावों में उन्होंने प्रकाश सिंह बादल को लगभग अपदस्थ कर ही दिया था , लेकिन दिल्ली में बैठी कांग्रेस हाई कमान ने टिकट ऐसे लोगों को दिए जिनके पराजित हो जाने के बारे में अमरेन्द्र सिंह को रत्ती भर भी संदेह नहीं था । इसलिए अब 2017 का चुनाव 90 साल के प्रकाश सिंह बादल और 75 साल के अमरेन्द्र सिंह के लिए एक प्रकार से अंतिम चुनाव था । बादल तो अभी भी यही कहते हैं कि उन्होंने कभी किसी को चुनौती नहीं दी लेकिन अमरेन्द्र सिंह कुछ नहीं छिपाते । उनके लिए 2007 का हिसाब बादल से चुकता कर लेने का यह अंतिम अवसर था । इसलिए उन्होंने लगभग धमकी की भाषा में ही कांग्रेस हाई कमान को बता दिया था कि यदि इस बार पंजाब कांग्रेस की कमान उन्हें न दी गई तो वे या तो अपनी पार्टी बना लेंगे या फिर किसी दूसरी पार्टी में शामिल होकर प्रकाश सिंह बादल को ललकारेंगे । चर्चा तो यहाँ तक होने लगी थी कि वे भाजपा में शामिल होने के लिए भी बातचीत कर रहे हैं । शर्त इतनी थी कि भाजपा अकाली दल से नाता तोड़ ले । कहा जाता है कि राहुल गान्धी के पास अमरेन्द्र सिंह के आगे हथियार डाल देने के अलावा कोई चारा नहीं था । अब यदि राहुल गान्धी पंजाब में अमरेन्द्र सिंह द्वारा किया गया शिकार अपने नाम करना चाहें तो उस पर कौन विश्वास करेगा ?
अकाली दल की पराजय पर पंजाब में किसी को किसी प्रकार का भी आश्चर्य नहीं है । अकाली दल के पास , चुनावों में भुनाने के लिए प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर सिंह की माईकरोमैनेजमैंट के सिवा कोई उपलब्धि नहीं थी । प्रकाश सिंह ने कुछ साल पहले अपने बेटे को पार्टी का अध्यक्ष भी बना दिया था और साथ ही उपमुख्यमंत्री का पद देकर परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री की ताक़त भी दे दी थी । सुखबीर सिंह ने चाहे उपलब्धियों के नाम पर विकास के लम्बे चौड़े आँकड़े पेश भी किए , जिन्होंने झुठलाना मुश्किल था । लेकिन चुनावों में अकाली दल की सरकार द्वारा दस साल में किया गया विकास चुनाव का मुद्दा बन ही नहीं पाया । चुनाव अकाली दल के हलका इन्चार्जों के आसपास घूमता रहा । ये हलका इन्चार्ज एक प्रकार से अपने अपने इलाक़े के सूबेदार बन गए थे । इन सूबेदारों का यह निज़ाम किस प्रकार का हो सकता था , इसका सहज अन्दाज़ा लगाया जा सकता है । मंत्रिमंडल में बादल परिवार की भरमार ने भी अकाली दल की छवि को धूमिल किया । नशों के कारोबार में जब सही या ग़लत बार बार सुखबीर सिंह के साले विक्रम सिंह मजीठिया का नाम आने लगा तो अकाली दल द्वारा दी जाने वाली सफाई लोगों के गले उतरनी बन्द हो गई । नशों के प्रयोग से होने वाली मौतें अकाली दल के गले का फन्दा बनने लगीं । गाँव के टैक्सी ड्राईवर से लेकर ट्रांसपोर्ट के धन्धे में लगी सभी कम्पनियाँ चिल्लाने लगीं कि पंजाब के ट्रांसपोर्ट पर बादल परिवार धक्के से क़ब्ज़ा कर रहा है । क्या कोई यक़ीन करेगा कि मालवा में ड्राईवर ही अकाली दल के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलें हुए थे । चंडीगढ़ में मुझे एक टैक्सी चलाने वाले ने बताया कि सभी ड्राइवरों ने आप को वोट दिया है । प्रदेश के केबल चैनलों पर बादल परिवार का शिकंजा है । कोई भी इलैक्ट्रोन चैनल बादल परिवार की इच्छा के बिना पंजाब में प्रवेश नहीं कर सकता । जाने माने पत्रकार कँवर सन्धू , जो आप के टिकट पर विधायक चुने गए हैं , बादल परिवार की इसी नीति का शिकार हुए । रेत और बजरी पर बादल परिवार के लोग आधिपत्य जमाए हैं । इन आरोपों में कितने सच्चे थे कितने झूठ , यह जाँच का विषय हो सकता है । लेकिन जनमत जाँच से नहीं व्यवहार से बनता है । अकाली दल के मंझोले नेताओं के व्यवहार ने यह कमी भी पूरी कर दी । कोढ में खाज यह कि जब अकाली दल द्वारा टिकट बाँटने का काम शुरु हुआ तो प्रार्थी के तर्कों पर , सुखबीर सिंह बादल का भाषण और डाँट डपट भारी पड़ने लगी । इसका असर यह हुआ कि अकाली दल के लोग भाग कर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में पनाह लेने लगे । पंजाब में अकाली दल हार रहा है , इसकी हवा चुनाव अभियान के पहले दिन से ही बनने लगी थी । यह हवा पोलिंग बूथ तक आते आते वह आँधी बन गई ।
कुछ राजनैतिक विश्लेषक यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि अकाली दल की हार का कारण पार्टी द्वारा पंथ का एजेंडा छोड़ कर , पंजाब का एजेंडा अपना लेना है । पंथ के एजेंडे का अर्थ केवल सिखों के हितों की बात करना माना जाता है । अकाली दल पर आरोप लगाया जाता है कि अब वह सिखों की पार्टी न रह कर समूह पंजाबियों की पार्टी बन गई है । यदि सचमुच ऐसा होता तब तो अकाली दल के हारने के बाद आम आदमी पार्टी को जीतना चाहिए था , क्योंकि उसका एजेंडा पंथिक एजेंडे को ही छूता था । उसके समर्थक तो पंजाब में पंथिक एजेंडे से भी आगे की बातें कर रहे थे । यदि सचमुच पंथिक एजेंडा ही पंजाब के सिखों के लिए चुनाव का मुद्दा होता तब तो सिमरनजीत सिंह मान के अकाली दल को सबसे ज़्यादा वोटें मिलनी चाहिए थीं क्योंकि उसका एजेंडा तो खालिस्तान का एजेंडा ही था । लेकिन उसके अकाली दल ने कुल 54 प्रत्याशी खड़े किए थे । ज़मानतें तो सिमरनजीत सिंह समेत सभी की ज़ब्त होनी ही थीं और वह हो भी गईं , लेकिन पार्टी को कुल मिला कर 0,3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए । इतने मत किसी बड़े शहर में नगरपालिका का चुनाव लड़ रहा कोई अकेला प्रत्याशी भी ले लेता है । बरनाला से क़िस्मत आज़मा रहे सिमरनजीत सिंह मान को ख़ुद ही 5000 वोट मिले । कुछ विद्वान कहते हैं कि पंजाब में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के अपमान के जो मामले हुए , उनमें अपराधियों को सरकार पकड़ नहीं पाई , इससे लोग अकाली दल से नाराज़ थे और चुनावों में उससे बदला लिया । यह ठीक है कि धार्मिक ग्रन्थों के अपमान से लोग नाराज़ थे , लेकिन इसने अकाली दल के खिलाफ आँधी चला दी – ऐसा मानना ठीक नहीं होगा । 2014 के लोक सभा चुनावों में ही अकाली दल अपने गढ़ मालवा से चार सीटें आप के पक्ष में हार गया था , तब तो धार्मिक ग्रन्थों के अपमान की घटना नहीं थी । इसलिए अकाली दल की हार को जानने के लिए पार्टी की कार्यप्रणाली का गहराई से अध्ययन करना होगा ।
अकाली दल के ख़िलाफ़ चल रही इस आँधी का नुक़सान भारतीय जनता पार्टी को तो उठाना ही था । अकाली दल भाजपा को पिछले लम्बे अरसे से सीमान्त और जी टी रोड की तेईस सीटें देता आया है । इन्हीं तेईस सीटों पर भाजपा हारती या जीतती रहती है । इसलिए पार्टी में पिछले पन्द्रह साल से एक जडता व्याप्त हो गई है । इस बार भाजपा ने इस जड़ता को तोड़ने के लिए कुछ ज़्यादा सीटों की माँग की थी । लेकिन इस विषय पर तो अकाली दल बात करने के लिए भी तैयार नहीं था । उसके बाद भाजपा ने दो तीन सीटों की अदला बदली की ही बात चलाई ताकि भाजपा मालवा में कम से कम दो तीन सीटों पर चुनाव तो लड़ सके । लेकिन अकाली दल टस से मस नहीं हुआ । अलबत्ता भाजपा के भीतर और बाहर से यह आबाज जरुर उठने लगी कि यदि भाजपा ने पंजाब में अपनी साख बचानी है तो अकाली दल से अलग होकर चुनाव लड़ना चाहिए । यह सुझाव देने वाले और निष्पक्ष आकलन का दावा करने वाले तो यह भविष्यवाणी करते हुए भी देखें गए कि अकाली दल को छोड़ कर चुनाव लड़ने पर भाजपा पंजाब में सरकार भी बना सकती है । ऐसा आकलन तो दूर की कौडी लाना ही कहा जा सकता था , लेकिन भाजपा सम्मानजनक सीटें जरुर ही प्राप्त कर सकती थी , इसमें कोई संशय नहीं । परन्तु कहा जाता है कि पंजाब में अकाली दल के साथ गठबन्धन चुनावी नफ़ा नुक़सान पर आधारित नहीं है ,बल्कि पंजाब की सुख शान्ति के लिए किया गया सामाजिक सांस्कृतिक गठबन्धन है । इसलिए भाजपा को इस चुनाव में मिली सीटों का राजनैतिक लाभ हानि के परम्परागत पैमाने से आकलन करना ही सही नहीं होगा । पंजाब के शहरी हिन्दू ही भाजपा का परम्परागत वोट बैंक है । वे अकाली दल के अहंकार युक्त व्यवहार से नाख़ुश थे और आप के गिर्द जुड़ते रेडीकलज के कारण चौकन्ने हो गए । जब उन्होंने देखा कि भाजपा तो किसी भी हालत में अकाली दल का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है तो वे स्वयं ही भाजपा का साथ छोड़ कर अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस के साथ चले गए । आम आदमी पार्टी के साथ वे जा नहीं जा सकते थे क्योंकि अब तक सभी को ज्ञात हो चुका था कि आम आदमी पार्टी के मुखौटे के पीछे खालिस्तानी और नक्सलवादी एकत्रित हो गए हैं । उनका एकमात्र मक़सद किसी भी तरह बादल को अपदस्थ कर एक बार फिर पंजाब में अपने लिए ज़मीन तलाशना है ।
लेकिन आम आदमी पार्टी को इस बात का पक्का विश्वास था कि दिल्ली के बाद चंडीगढ़ में केजरीवाल का परचम लहराएगा । इसका कारण 2014 के लोक सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी द्वारा पंजाब के मालवा क्षेत्र में अकाली दल के प्रत्याशियों को पराजित कर चार सीटें झटक लेना था । आम आदमी पार्टी के सदर अरविन्द केजरीवाल ने इसे पंजाब में आप की लोक प्रियता मान लिया । जबकि इसका कारण लोगों की अकाली दल से गहरी नाराज़गी थी , जिसका ऊपर ज़िक्र किया जा चुका है । इसलिए उसने दिल्ली के बाद पंजाब को अपनी लम्बी रणनीति में निशाने पर रख लिया । उधर देश विदेश में बिखरे खालिस्तानी और नक्सलवादी तत्वों को भी विश्वास होने लगा था कि यदि पंजाब में फिर से पैर ज़माना है तो आम आदमी पार्टी के मंच से कारगार और कोई मंच नहीं हो सकता । रेडीकलज को सुरक्षित मंच की जरुरत थी और केजरीवाल को चुनाव में लड़ने वाले ज़मीनी कार्यकर्ताओं की । कनाडा से समर्थन देने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पर जब पंजाबियों की पहली खेप उतरी और केजरीवाल के झंडाबरदार मनीष सिसोदिया उनकी आगवानी में भांगड़ा डालते नज़र आए तो पंजाब में चिन्ता होना स्वाभाविक ही था । दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए । उधर अकाली दल के प्रति गहरी नाराज़गी ने आम आदमी पार्टी को प्राण वायु दे दी । इससे केजरीवाल का अहंकार फूल कर कुप्पा हो गया । पार्टी में जिसने भी उनसे आँख से आँख मिला कर बात करने की कोशिश की उन्हें उन्होंने बाहर का रास्ता दिखा दिया । दिल्ली में वे प्रशान्त भूषण , योगेन्द्र यादव , आनन्द कुमार के साथ ऐसा कर चुके थे तो पंजाब में उन्होंने अपनी पार्टी के अध्यक्ष सुच्चा सिंह छोटेपुर , सांसद धर्मवीर गान्धी के साथ ऐसा किया । आप से छिटके इन समूहों ने अपने अपने प्रत्याशी मैदान में उतार दिए । यह ठीक है कि वे ज़्यादा वोटें तो नहीं बटोर पाए लेकिन केजरीवाल की हवा ख़राब करने में उन्होंने भी अपनी भूमिका निभा दी । पंजाब से ज़्यादा समर्थक आम आदमी पार्टी के अमेरिका और कनाडा में थे । केजरीवाल स्वयं अपनी पार्टी के समर्थकों की मिजाजपुर्सी करने सात समुद्र पार गए । उनपर आरोप भी लगे कि वहाँ रेडीकलज के साथ बैठकें करते रहे और चुनाव के लिए पैसे बटोरते रहे । केजरीवाल ने चाहे इसका खंडन किया लेकिन शायद किसी ने भी उसे स्वीकार नहीं किया । आम आदमी पार्टी के रेडीकलज के समर्थन की चर्चा को और भी बल मिला जब केजरीवाल ने मोगा में खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के उग्रवादी गुरिन्दर सिंह के घर रात बिताई । गुरिन्दर सिंह स्वयं इंग्लैंड में था लेकिन मोगा में उसके घर में उसके दोस्त सुनाम सिंह ने केजरीवाल का खैरमकदम किया । रात्रि वहाँ बिता कर सुबह केजरीवाल वहाँ से रुखसत हो गए । बाद में केजरीवाल ने अपनी सफ़ाई देने के स्थान पर उग्रवादियों की सफाईँ ही देनी शुरु कर दी । ऐसे में उनकी सफ़ाई को कौन सुनता ? बैसे भी केजरीवाल के पास दिल्ली शासन में अपनी रचनात्मक उपलब्धियों को गिनाने के लिए जी भर कर मोदी को निकाली गई गालियों के अतिरिक्त कुछ नहीं था । शायद केजरीवाल के मन में कहीं यह विश्वास बैठ गया था कि अकाली दल से दुखी लोगों के पास आम आदमी पार्टी को वोट देने के सिवा कोई विकल्प नहीं है । पंजाब के लोग , ख़ास कर सिख , कभी कांग्रेस को वोट नहीं डालेंगे , यह विश्वास उन्हें अमेरिका कनाडा के समर्थकों ने दिलवा दिया लगता था । पूरी रणनीति में केजरीवाल पंजाब के लोगों की काल्पनिक विवशता का लाभ उठा कर पंजाब फ़तह करना चाहते थे । लेकिन उन्हें किसी ने यह नहीं बताया कि पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जिस कांग्रेस का रथ लेकर घूम रहें हैं , वह राहुल गान्धी का नहीं माना जा रहा था बल्कि उसे कैप्टन की अपनी उपलब्धि माना जा रहा था । पंजाब में कैप्टन ने कांग्रेस का क्षेत्रीयकरण कर लिया था । इसलिए वह सिक्खों के लिए अछूत नहीं रह गई थी । अकालियों से नाराज़ पंजाबियों के पास कांग्रेस का विकल्प तैयार हो चुका था । अलबत्ता इतना जरुर हुआ कि जितना ज़्यादा केजरीवाल और उसके साथी रेडीकलज के अंग संग नाचते नज़र आए उतना ज़्यादा तेज़ी से पंजाब का शहरी मतदाता घबरा कर अमरेन्द्र सिंह के साथ जुडता गया ।
कुछ राजनैतिक पंडितों का मानना है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के कफ़न में अंतिम कील सिरसा के डेरा सच्चा सौदा ने ठोकी । मालवा में डेरा सच्चा सौदा का व्यापक जनाधार है । यह जनाधार दलित समाज में और भी गहरा है । मालवा में सच्चा सौदा के अनुयाई मोटे तौर पर आम आदमी पार्टी के साथ जुड़ चुके थे । लेकिन सच्चा सौदा ने चुनाव से कुछ दिन पहले अकाली-भाजपा को समर्थन देने की घोषणा कर दी । प्रत्येक विधान सभा क्षेत्र में रातोंरात अकाली दल के समर्थन में झंडे लग गए । रसातल में बैठी अकाली पार्टी को ये वोट जिता तो न सके लेकिन आम आदमी पार्टी की किश्ती को ऐन किनारे पर भी डुबोने में जरुर कामयाब हो गए । मालवा की ७० सीटों में से उसकी उपलब्धि १८ सीटों पर ही सिमट गई । माझा और दोआबा में आम आदमी पार्टी की हवा में चर्चा थी लेकिन ज़मीन पर कुछ ख़ास नहीं था । इसी चर्चा का शिकार दिल्ली का मीडिया हो गया और आप को पंजाब में सत्ता का दावेदार बताने लगा । चुनाव परिणामों का क्यास लगाने वाले इसी लिए इसीलिए पंजाब में आम आदमी पार्टी को सत्ता के क़रीब बताते रहे और अतिरिक्त उत्साह में दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया उन्हें पंजाब का भावी मुख्यमंत्री बताने से भी नहीं चूके ।
इन हालत में आम आदमी पार्टी को मिली वोटों का एक बार फिर विश्लेषण कर लिया जाए । अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस को ३८.५ , अकाली दल को २५.२ और आम आदमी पार्टी को २३.७ प्रतिशत मत मिले । यदि ठोस वोटों की बात की जाए तो आम आदमी पार्टी को 3662665 वोट मिले । अकाली दल को 3898161 और अमरेन्द्र सिंह की कांग्रेस को 5945899 मत मिले । उपरी तौर पर देखने से लगभग अढाई लाख वोटों का अन्तर दोनों पार्टियों में दिखाई देता है । लेकिन एक बात ध्यान में रखनी चाहिए । आम आदमी पार्टी को मिले वोट आँधी के वोट हैं । उसके ज़्यादातर प्रत्याशी अकाली दल और कांग्रेस से विभिन्न कारणों से छिटक कर आए थे । यह जरुरी नहीं कि आँधी के ये वोट ज़्यादा देर एक ही स्थान पर टिके रह सकें । इसलिए आप को लेकर पंजाब की भविष्य की राजनीति का सटीक विश्लेषण फ़िलहाल करना ठीक नहीं होगा । देखना होगा , सरकार न बना पाने के बाद भी क्या आप को कुनबा ज़्यादा देर तक टिक पाएगा ? अन्त में एक टिप्पणी । पंजाब में अकाली दल , भाजपा , और कांग्रेस किसी एक मुद्दे पर यदि एकमत थे तो वह यही था कि आम आदमी पार्टी किसी भी हालत में चंडीगढ़ स्थित पंजाब सचिवालय तक नहीं पहुँचनी चाहिए । इसमें उन्हें सफलता प्राप्त हुई ।

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