लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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priyankaप्रमोद भार्गव

 

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस प्रियंका गांधी को मैदान में उतारने की ऊहापोह में है। दरअसल इलाहाबाद में कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कार्यकर्ताओं की एक बैठक ली थी,जिसमें प्रियंका को चुनाव प्रचार की कमान सौंपने की मांग पुरजोरी से उठी थी। इस मांग से एक तो यह बात साफ हुई है कि अब कांग्रेस में राहुल गांधी से उम्मीदें शून्य की ओर बढ़ रही हैं। दूसरे, प्रशांत किशोर जिस तरह से सफल रणनीतिकार की भूमिका में सामने आए हैं, उससे यह लगता है कि कांग्रेस केंद्रीय नेतृत्व के साथ प्रांत स्तर के नेतृत्व में भी शून्य होती जा रही है। प्रशांत चुनाव लड़ने के कुछ सूत्र जरूर दे सकते हैं,लेकिन रणनीतिक जवाबदेही यदि पूरी तरह उन्हीं के सुपुर्द कर दी जाती है और कांग्रेस में यदि प्रत्यक्ष बोलवाला उन्हीं का बना रहता है तो इससे कांग्रेस के बुजुर्ग और अनुभवी नेता तो उपेक्षित महसूस करेंगे ही, यह भी समझ लिया जाएगा कि डेढ़ दशक का अवसर मिलने के बावजूद राहुल गांधी राजनीतिक रूप से परिपक्व नहीं हुए हैं। दरअसल कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में ही नहीं पूरे देश में अस्तित्व बनाए रखने की चुनौतियां इतनी जटिल हैं, कि उन पर पार पाना किराए के रणनीतिकारों से संभव नहीं है।

असम और केरल की सत्ता गंवाने के अलावा कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल और केरल में जिन दलों के साथ परस्पर विरोधी गठबंधन किए, वे चुनाव में हार का कारण ही नहीं, इस बात का भी आधार बने कि देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़े जनाधार वाली पार्टी में दूरदृष्टि और रणनीतिक समझ का लोप हो रहा है। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद प्रशांत का महत्व पार्टी में थोड़ा इसलिए परवान चढ़ गया, क्योंकि उन्होंने असम में जिन दो क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करने की सलाह दी थी, कांग्रेस ने उनसे गठबंधन तो किया नहीं, अलबत्ता भाजपा उनसे तालमेल बिठाकर कांग्रेस से सत्ता हथियाने में जरूर सफल हो गई। लेकिन गौरतलब है कि भाजपा ने जिन दलों से गठजोड़ किया, वह पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व और स्थानीय कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्ष करके किया, न कि किसी आयातित गैर राजनीतिक रणनीतिकार की सलाह से ?

प्रशांत किशोर यह परिवेश रचने में कमोवेश सफल हुए हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली बढ़ी जीत और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। जबकि यह मुगालता है। प्रशांत भाजपा की महज प्रचार रणनीति के सदस्यों में एक सदस्य मात्र थे। पार्टी का किस सीट से किसे उम्मीदवार बनाना है, यह भाजपा और संघ की मिली-जुली रणनीति थी। इसमें भाजपा की प्रदेश ईकाईयों की भी अहम् भूमिका अंतर्निहित थी। जहां तक राजग गठबंधन का सवाल है तो यह गठबंधन दीर्घकालिक है। भाजपा, शिवसेना और अकाली दलों का गठजोड़ तो करीब साढ़े तीन दशक से भी ज्यादा पुराना है। बिहार में भाजपा का रामविलास पासवान और उनकी लोक जनशक्ति पार्टी से जो गठजोड़ हुआ, उसमें बिहार के सुशील मोदी जैसे नेताओं की भूमिका अहम् रही थी, न कि प्रशांत की ?

बिहार विधानसभा चुनाव में शरद, नीतीश, लालू के महागठबंधन की जीत के परिप्रेक्ष्य में यह दलील दी जा रही है कि इसकी वजह प्रशांत की रणनीति थी। जबकि नतीजों से यह साफ हो गया है कि महागठबंधन बन जाने से पिछड़ी, अति-पिछड़ी, दलित-महादलित और अल्पसंख्यक वोटों का धु्रवीकरण हुआ, जिसने गठबंधन की महाजीत को आसान बना दिया। प्रशांत यदि अकेले ही जीत दिलाने में मददगार हुए होते तो नीतीश उन्हें छोड़ते ही क्यों ? वह भी तब, जब नीतीश ने उत्तर प्रदेश का रुख कर दिया हो। सब जानते हैं जनता दल एकीकृत के प्रमुख नीतीश की मंशा 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी से सीधी टक्कर लेने की है। इसके लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्होंने राजनीति की बिसात पर राणनीतिक चालें चलना शुरू कर दी हैं। नीतीश की योजना प्रदेश के छोटे दलों को अपने साथ लेकर मोदी का किला ध्वस्त करने की है। दरअसल प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखने वाला नेता अच्छी तरह से जानता है कि केंद्र का रास्ता वाया उत्तर प्रदेश होकर ही खुलता है। क्योंकि मोदी समेत ज्यादातर प्रधानमंत्री उप्र के बूते ही केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुए हैं। जदयू यहां नीतीश को कुर्मी नेता के तौर पर उभारने की कोशिश में है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि फिलहाल कांग्रेस समेत किसी और दल में कुर्मी जाति का कोई बड़ा नेता नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा बाराबंकी तक सिमट गए हैं। केंद्रीय मंत्री संतोष गंगावार का प्रभाव बरेली क्षेत्र तक सीमित है। विनय कटियार की पहचान जाति की बजाय मंदिर आंदोलन से जुड़ी है। कुर्मी समाज का नेता होने का दावा न उन्होंने किया और न ही समाज ने उन्हें नेता माना। ऐसे में इस बड़े वोट बैंक को कब्जाने की मुहिम नीतीश ने सुनियोजित ढंग से चल दी है,जबकि कांग्रेस या प्रशांत के पास इसे लुभाने का कोई नुस्खा फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा है।

कांग्रेस के साथ प्रभावशाली नेतृत्व का संकट तो है ही, जातिगत किसी एक वोट बैंक को अपने पक्ष में लाने का भी संकट है। समाजवादी पार्टी के पास यादव और मुस्लिमों का बड़ा वोट बैंक है। बहुजन समाज पार्टी के साथ दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम जुड़ जाते हैं तो वह बहुमत हासिल कर लेती है। बदले राजनीतिक परिदृष्य में ब्राह्मण कांग्रेस की बजाय भाजपा की तरफ रूझान बनाए हुए हैं। उत्तर प्रदेश में चुनावी विश्लेशकों का मानना है कि यहां जो अति पिछड़े वर्ग का वोट बैंक है, वह बड़ी संख्या में होने के बावजूद जातियों में उपजातीय विभाजन के कारण एकजुट नहीं है। बावजूद वह शत-प्रतिशत मतदान करता है। उसे जो भी पार्टी जीतती दिखती है, उसे वोट दे देता है। नीतीश की नजर इसी वोट बैंक पर है।

प्रदेश में ये जाति समूह आखिरी पंक्ति के मतदाता माने जाते हैं, जबकि पहली पंक्ति के मतदाता ब्राह्मणों को माना जाता है। उप्र में ब्राह्मणों के वोट करीब 14 फीसदी हैं, लेकिन ये अपने प्रभाव और वाक्चातुर्य से भी दल विशेष के लिए वोट  डलवाने में अहम् भूमिका निभाते हैं। 2007 में मायावती इन्हीं ब्राह्मणों और इनके बूते अति पिछड़ों का वोट मिलने के कारण ही स्पष्ट बहुमत लाने में कामयाब हुई थीं। लेकिन दलितों को कथित तौर से बड़े पैमाने पर एससी एवं एसटी कानून के तहत मामले दर्ज करने की छूट देने के कारण ब्राह्मणों का बसपा से मोहभंग हो गया और वे 2012 के चुनाव में कांग्रेस व भाजपा की पतली हालत देख सपा का रुख कर गए। प्रशांत के पास प्रियंका या राहुल गांधी को बतौर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री के रूप में घोशित करने के साथ यह नुस्खा भी होना चाहिए कि अग्रिम पंक्ति के ब्राह्मण और अति पिछड़े वर्गों के वोट अंततः कांगे्रस की झोली में कैसे आएं। इन वोट बैंकों पर नितीश ने तो निगाहें लगा दी हैं और अमित शाह इस वोट बैंक पर नजर लोकसभा चुनाव से ही लगाए बैठे हैं, ऐसे में नाम भर की घोषणा से कांगे्रस की चुनावी दाल गल जाएगी, यह नामुमकिन है। यह इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि दलितों को बसपा से और मुसलमानों का सपा से अभी मोहभंग नहीं हुआ है। इस स्थिति में कांग्रेस ही नहीं भाजपा के सामने भी यह संकट है कि वह आखिर मुख्यमंत्री के रूप में किसका चेहरा सामने लाए ? असम की जीत से सबक लेते हुए भाजपा की यह पूरी कोशिश रहेगी कि वह इस सबसे बड़े राज्य का चुनाव कोई चेहरा सामने लाकर ही लड़े। नरेंद्र मोदी और बिहार की जीत का संयोग प्रशांत के साथ जरूर बन गया है, लेकिन कांग्रेस के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश में भी बन जाएगा, यह आसान नहीं है।

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1 Comment on "उत्तर प्रदेश में प्रियंका को उतारने की कश्मकस में कांग्रेस"

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mahendra gupta
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कांग्रेस को यह दांव खेल ही लेना चाहिए , हालाँकि मुख्य्मंत्री का पद प्रियंका गांधी व उनके परिवार की गरिमा के अनुरूप नहीं है , लेकिन देश के लिए नहीं अपनी पार्टी के लिए करना यथेष्ट होगा , प्रशांत किशोर का भी भ्र्म दूर हो जायेगा ,अभी के लक्षणों के अनुसार तो कांग्रेस इस समर में खेत ही होनी है ,और विधान सभा अभी के समीकरणों के अनुसार स्पष्ट बहुमत वाली नहीं होगी , प्रशांत किशोर की भी वास्तविकता सामने आ जाएगी , पर दिग्गज नेताओं का बलिदान कांग्रेस करना होगा , और इसलिए वे उपरोक्त हालत पैदा होने ही… Read more »
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