लेखक परिचय

पवन कुमार अरविन्द

पवन कुमार अरविन्द

देवरिया, उत्तर प्रदेश में जन्म। बी.एस-सी.(गणित), पी.जी.जे.एम.सी., एम.जे. की शिक्षा हासिल की। सन् १९९३ से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में। पाँच वर्षों तक संघ का प्रचारक। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्तीय मीडिया सेण्टर "विश्व संवाद केंद्र" गोरखपुर का प्रमुख रहते हुए "पूर्वा-संवाद" मासिक पत्रिका का संपादन। सम्प्रतिः संवाददाता, ‘एक्सप्रेस मीडिया सर्विस’ न्यूज एजेंसी, ऩई दिल्ली।

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पवन कुमार अरविंद

भारत के मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी; दो ही दल ऐसे हैं जिनकी सोच का स्तर राष्ट्रीय है। इस श्रेणी में मान्यता प्राप्त अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक दल भी आ सकते हैं लेकिन उनकी सोच का स्तर बहुत छोटा होने के कारण वे इस कतार में खड़े नहीं हो पाते। वैसे कांग्रेस के चिंतन का स्तर राष्ट्रीय जरूर है लेकिन स्वाभाविक नेतृत्व के न होने से पार्टी अपनी सोच को देशहित में कार्यान्वित नहीं करा पाती। भाजपा-नीत राजग सरकार के बाद से ही कांग्रेस-नीत संप्रग केन्द्र में दूसरी बार सत्तारूढ़ है। संप्रग-1 सरकार का कार्यकाल बहुत सफल नहीं रहा। वहीं, संप्रग-2 सरकार अपने गठन के बाद से ही घपलों-घोटालों से अनवरत जूझ रही है। भ्रष्टाचार के एक से बढ़कर एक मामले सामने आ रहे हैं। इन मामलों से ऐसा लगता है कि संप्रग सरकार ने भ्रष्टाचार का पेटेंट करा रखा है। भ्रष्टाचार के लगातार उजागर हो रहे इन मामलों ने सरकार के नीति नियंताओं की नाक में दम कर रखा है। लेकिन सरकार को समय रहते इन घोटालों की भनक तक नहीं लग सकी, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

वैसे तो इन घोटालों के कई कारण हैं लेकिन उनमें से एक प्रमुख कारण नेतृत्व का स्वाभाविक न होना भी है। डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के मुखिया तो हैं, लेकिन वह इस पद पर बैठे नहीं बल्कि बैठाये गये हैं। नेतृत्व की इस अस्वाभाविकता के कारण ही सरकार का संचालन ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है। सरकार तो चल रही है लेकिन उस पर नेतृत्वकर्ता का नियंत्रण नहीं के बराबर है। यानी यह सरकार बिना किसी के चलाए स्वत: चल रही है।

ऐसी स्थिति में मुख्य विपक्षी दल भाजपा की जिम्मेदारी स्वत: बढ़ जाती है। लेकिन भाजपा भी स्वाभाविक नेतृत्व की कमी से जूझ रही है। पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी हैं लेकिन उनकी स्थिति भी डॉ. मनमोहन सिंह से भिन्न नहीं है। गडकरी पार्टी के अध्यक्ष बने नहीं बल्कि बनाये गये हैं। भाजपा के अब तक जितने भी अध्यक्ष हुए हैं, उनमें गडकरी का अब तक का कार्यकाल संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। वह पार्टी के दूसरी बार अध्यक्ष बनने जा रहे हैं लेकिन अब तक संगठन पर अपना प्रभाव रत्तीभर भी नहीं छोड़ सके हैं। हालांकि राजनीतिक हलकों में चर्चा चलती है कि गडकरी को अध्यक्ष बनाने के लिए आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहनराव भागवत ने अपना पूरा जोर लगा दिया था। इस कारण गडकरी मोहरा भर बनकर रह गये हैं। यदि भाजपा का नेतृत्व स्वाभाविक होता तो आज पार्टी की इतनी दुर्गति न होती। आश्चर्य की बात तो यह है कि भाजपा और उसकी पूर्वर्ती जनसंघ के विकास में आरएसएस की प्रमुख भूमिका रही है, लेकिन अब पार्टी की दुर्गति के लिए भी आरएसएस ही जिम्मेदार है। आरएसएस के महत्वाकांक्षी प्रचारक समय-समय पर भाजपा के स्वाभाविक नेतृत्व के उभार की राह में रोड़े अटकाते रहते हैं। इस कारण पार्टी का स्वाभाविक नेतृत्व नहीं उभर पाता।

अटल बिहारी वाजपेई भाजपा के स्वाभाविक नेता थे, जो अपनी प्रतिभा और संघर्ष की बदौलत पार्टी के शिखर पर पहुंचे। यही बात लालकृष्ण आडवाणी पर भी लागू होती है। आरएसएस और भाजपा के कुछ नेताओं के विरोध के बावजूद आडवाणी अपनी स्वाभाविकता के कारण ही आज भी पार्टी के सर्वमान्य नेता बने हुए हैं। मौजूदा दौर की भाजपा में आडवाणी जैसा सर्वमान्य नेता कोई दूसरा नहीं है। वैसे, आरएसएस के कुछ महत्वाकांक्षी प्रचारकों और पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के द्वारा वाजपेई की प्रतिभा को भी दबाने के प्रयास बहुत हुए थे लेकिन यह उनका स्वाभाविक नेतृत्व ही था जो उनकी राजनीतिक सक्रियता के अंतिम समय तक पार्टी के शिखर पर बनाये रखा।

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी पार्टी के स्वाभाविक नेतृत्व के तौर पर उभरे हैं। उनको शीर्ष पर आने से रोकने के प्रयास भी बहुत हो रहे हैं, लेकिन प्रतिभा किसी की मुहताज नहीं होती और समय आने पर लाख विरोध के बावजूद धरती फाड़कर अपना स्वाभाविक स्थान ग्रहण कर लेती है। मोदी के साथ भी यही होगा। मोदी जैसे नेताओं की अनदेखी पार्टी को भारी पड़ सकती है।

केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी भी पार्टी की स्वाभाविक नेता नहीं हैं। लेकिन कांग्रेस नेताओं में स्वयं पर विश्वास की कमी और गांधी परिवार के ‘आभा-मंडल’ ने सोनिया को अध्यक्ष पद पर अब तक बनाए रखा है। उनको पार्टी में कोई चुनौती देने की स्थिति में भी नहीं है। वहीं, राहुल और प्रियंका की बात करें तो राहुल पिछले कई वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं और नेतृत्व का पाठ पढ़ रहे हैं, लेकिन यह पाठ उनके भेजे में अभी तक नहीं घुस सका है। राहुल के इस प्रगति की अत्यंत धीमी रफ्तार से ऐसा नहीं लगता कि वह भविष्य में कभी पार्टी को सफल नेतृत्व दे सकेंगे। वहीं, प्रियंका को यदि आगे बढ़ने का मौका मिले तो वह नेतृत्व के मसले पर राहुल ही नहीं बल्कि सोनिया को भी काफी पीछे छोड़ सकती हैं। लेकिन राहुल को आगे लाने के लिए प्रियंका की प्रतिभा को दबाया जा रहा है। अन्तत: होगा यही कि राहुल की जगह प्रियंका को उतारना पड़ेगा।

हालांकि किसी भी राजनीतिक दल में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। लेकिन प्रतिभा के निखार के लिए सिर्फ मौका और माहौल की आवश्यकता होती है। अवसर मिलते ही प्रतिभाएं निखर जाती हैं और अपना स्थान ग्रहण करती हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू के आभा-मंडल के प्रभाव में उनकी पुत्री इंदिरा गांधी कांग्रेस के स्वाभाविक नेतृत्व के तौर पर उभरीं। उन्होंने देश को प्रधानमंत्री के रूप में बहुत कुछ दिया। वहीं, राजीव गांधी प्रधानमंत्री के रूप में सफल नहीं हो सके। वह अपने नेतृत्व का स्वतंत्र प्रभाव नहीं दिखा सके। वह मां इंदिरा की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद पर अभिषिक्त हुए थे। इंदिरा की हत्या की छाया में देश में हुए आम चुनाव में कांग्रेस को जबर्दश्त सफलता मिली थी लेकिन इस सफलता का कारण राजीव नहीं थे, बल्कि इंदिरा के निधन से उपजी सहानुभूति की लहर थी। 1989 में राजीव गांधी के स्वतंत्र नेतृत्व में हुए आम चुनाव में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा, जबकि इसके पूर्व के चुनाव में कांग्रेस को आजादी के बाद सर्वाधिक सीटें मिली थीं। यदि राजीव कांग्रेस के स्वाभाविक नेतृत्व होते तो पिछले चुनाव में मिली जबर्दश्त सफलता को पूरा नहीं तो कुछ हद तक जरूर बरकरार रख पाते। कहने का तात्पर्य है कि दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दल अपने-अपने स्वाभाविक नेतृत्व के मार्गदर्शन में दल और देश को बहुत कुछ दे सकते हैं। दोनों दलों का बढ़ना देशहित में है जबकि क्षेत्रीय दलों का उत्कर्ष कई प्रकार की समस्याएं खड़ी करता है।

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