लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

प्रवक्‍ता ब्यूरो

Posted On by &filed under राजनीति, विधानसभा चुनाव.


डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

उत्तर प्रदेश में पाँच वर्षों पहले भ्रष्टाचार और भय सबसे बड़े मुद्दे हुआ करते थे। आज भी प्रदेश की राजनीति में वही है। इन मुद्दों पर विफलता के कारण सपा को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। इनसे निपटने के लिए बसपा पर ‘सर्वजन’ ने विश्वास किया। कांग्रेस केन्द्र की सत्ता में है। वहाँ भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है। प्रदेश में भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा कर रही है। भाजपा सिध्दान्त, विचारधारा, शुचिता, चाल, चरित्र की दुहाई देती रही, लेकिन सच्चे अर्थों में इनका पालन करने वाले हाशिये पर हैं। राजनीति में अपने-अपने पैंतरे हैं। संयोग देखिए, जिस समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही गम्भीर आरोपी बाबूसिंह कुशवाहा को पुष्प-गुच्छ भेंट कर रहे थे, लगभग उसी समय एक अन्य बाहुबली और धनबली डी.पी. यादव को सपा प्रदेश अध्यक्ष ने पार्टी में शामिल करने से इन्कार कर दिया। बसपा, कांग्रेस के पैंतरे भी कम नहीं। कुछ घटनाओं से किसी पार्टी के बारे में अन्तिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन चुनावी मौसम में इसके संदेश को नजरअन्दाज भी नहीं किया जा सकता। सपा, भाजपा, कांग्रेस और बसपा के अपने-अपने पैंतरे हैं। उत्तर प्रदेश का चुनावी माहौल निराशाजनक है। भय, भूख, भ्रष्टाचार विकास के मुद्दे अपनी जगह पर हैं, लेकिन बिहार या गुजरात की तरह विश्वसनीय दावेदारों की कमी खटकती है। यहाँ सिर्फ सियासी दाँव-पेंच का बाजार गर्म है। किस पर विश्वास किया जाये? कुछ समय पहले समाजवादी पार्टी ने बसपा के दागी विधायक को शामिल किया था। अब डी.पी. यादव को सपा में शामिल करने से इन्कार कर दिया। इस मसले पर पार्टी में मतभेद उजागर हुए। आजम खाँ ने डी.पी. यादव को सार्वजनिक रूप से अपनाया। बाद में लीपापोती करनी पड़ी। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश ने उन्हें सपा में लेने से इन्कार कर दिया। सपा प्रवक्ता मोहन सिंह को अपने पद से हाथ धोना पड़ा। साफ है कि सपा में आरोपी गुड्डू पंडित और डी.पी. यादव के हिमायती भी हैं। अखिलेश अपनी अलग छवि दिखाना चाहते हैं। देखना होगा कि वे अकेले पार्टी की छवि को कितना निखार सकते हैं। बाबूसिंह कुशवाहा बसपा सरकार के महत्वपूर्ण मंत्री थे। उनको मुख्यमंत्री मायावती का बेहद करीबी माना जाता था। उनके कार्यकाल में ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के धन में भारी घोटाला या बंदरबाँट हुआ। यह बेहद गम्भीर मामला था, पर बाबूसिंह सरकार के चहेते बने रहे। बात आगे बढ़ी। लोकायुक्त और सी.बी.आई. जाँच तक पहुँची। बाबूसिंह को बाध्य होकर हटना पड़ा। यदि जाँच की गिरफ्त में न आते, तब भी क्या उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया जाता? अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ही बाबूसिंह ने बागी तेवर अपनाये थे। इसके बावजूद उन्होंने मायावती की आलोचना नहीं की। उन्होंने केबिनेट सचिव और सबसे महत्वपूर्ण मंत्री पर निशाना साधा। इन लोगों से अपनी जान को खतरा बताया। इन बगावती दिनों में बाबूसिंह कांग्रेस के संरक्षण में बताये जा रहे थे। सच्चाई वही जानते होंगे। लेकिन वे भाजपा में शामिल हो गये। शामिल होने के कुछ घंटों बाद ही उनके ठिकानों पर सी.बी.आई. के छापे पड़ने लगे। यह ठीक है कि कानून अपना काम करे। सी.बी.आई. आरोपों की जाँच प्रक्रिया में छापे डाले। इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन इसके लिए अब तक किस बात का इन्तजार था। मामला तो पुराना है। यदि बाबूसिंह भाजपा में शामिल न होते, क्या तब भी जाँच में इतनी तेजी दिखाई देती? स्वास्थ्य घोटाले और उससे सम्बंधित घटनाओं की अब तक की जाँच पूरी तरह सन्तोषजनक तो नहीं कही जा सकती। सी.बी.आई. के अब तक के निष्कर्ष आसानी से लोगों के गले नहीं उतर रहे। कुछ दिन पहले ही संसद में सी.बी.आई. को लेकर जोरदार बहस चली थी। मुख्य विपक्षी भाजपा ने उसे राजनीतिक दबाब से मुक्त करने की माँग की थी। इसके लिए अनेक संशोधन पेश किये गये। सरकार ने नहीं माने। वह सी.बी.आई. में किसी भी प्रकार के बदलाव हेतु तैयार नहीं है। स्वास्थ्य घोटाले की जाँच और निष्कर्ष ने एक बार फिर सवाल उठाये हैं। इसी प्रकार मनरेगा में घोटालों की बात पर संप्रग सरकार करीब साढ़े चार वर्ष तक खामोश रही। इसके बाद ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने उत्तर प्रदेश में मनरेगा घोटाले पर पत्र लिखना शुरू किया। कार्रवाई के नाम पर किसी ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। भाजपा हाईकमान को अपने जिम्मेदार पदाधिकारी किरीट सौमैय्या के दावों का संज्ञान लेना चाहिए था। करीब तीन दिन पहले सोमैय्या ने लखनऊ में पत्रकारों के सामने बाबूसिंह कुशवाहा पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाये थे। उन्होंने दस्तावेजों के आधार पर दावा किया था कि चौबीस कम्पनियों में कुशवाहा और उनके परिवार ने भारी धनराशि का निवेश किया। उनके अनुसार यह स्वास्थ्य घोटाले की धनराशि थी। किरीट सौमैय्या का दावा था कि यह एक हजार करोड़ का घोटाला था। जिसके करीब पन्द्रह सौ पेज के दस्तावेज उन्होंने सी.बी.आई. को सौंप दिये थे। सौमैय्या भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री और भ्रष्टाचार उजागर समिति के अध्यक्ष हैं। बाबूसिंह के खिलाफ दस्तावेज एकत्र करने और उन्हें सी.बी.आई. को सौंपने की जानकारी पार्टी को थी। बाबूसिंह पिछड़ी जाति के हैं। विनय कटियार ने इस आधार पर सहानुभूति व्यक्त की है। उन्हें बताना चाहिए कि भ्रष्टाचार उजागर समिति के अध्यक्ष को कुशवाहा के खिलाफ दस्तावेज एकत्र करने की अनुमति क्यों दी गयी। क्या तब अति पिछड़े कार्ड का ध्यान नहीं आया। कुशवाहा दूसरे दल में थे, तब हमले के लायक थे। भाजपा में आ गये, तब बचाव होने लगा। वे जातीय समीकरण के हिसाब से अच्छे हो गये। जाहिर है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता के दावेदार भ्रष्टाचार, शुचिता, सुराज के मामले में निराश करते हैं। भाजपा इन मुद्दों की सबसे बड़ी दावेदार रही है। बाबूसिंह कुशवाहा, बादशाह सिंह, दद्दन मिश्र आदि वैचारिक आधार को आहत करते हैं। पार्टी आकलन कर रही है कि जातीय आधार पर कितने प्रतिशत वोट बढ़ेंगे। लेकिन वैचारिक पूँजी का कितना नुकसान होगा, इसकी चिन्ता नहीं है। ऐसे ही फैसलों ने भाजपा की औरों से अलग छवि को प्रभावित किया, पार्टी को उत्तर प्रदेश में नम्बर चार पर पहुँचा दिया। आडवाणी की रथयात्रा और लोकपाल की पैरवी सभी पर बाबूसिंह भारी पड़ेंगे। समझना कठिन है कि भाजपा इस प्रकार के फैसलों से क्या साबित करना चाहती है। वह किस प्रकार के चुनावी लाभ की उम्मीद कर रही है। संभव है कि ये दागी चुनाव जीत जायें, लेकिन भाजपा के सिध्दान्तों को गहराई तक नुकसान पहुँचायेंगे। बसपा से अलग हुए मंत्री केवल भ्रष्टाचार के आरोपी ही नहीं साढ़े चार वर्ष तक सत्ता के लिए खामोश रहने के अपराधी भी हैं। सत्ता में बने रहने की संभावना रहती, तब इनकी खामोशी नहीं टूटती। ये बसपा में पड़े रहते और मलाई काटते रहते। भाजपा या किसी पार्टी में इनका आना मजबूरी का निर्णय है। इनको साथ लेकर सिध्दान्तों की दुहाई देना कठिन है।

लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक तथा अध्यापन से जुड़े हैं।

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz