लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-
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क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय विकल्प बनने के मंसूबों पर चुनाव परिणामों ने पानी फेर दिया है। तीसरे र्मोचे के सूत्रधार रहे वामपंथी दल भी सकते में हैं। मुलायम, लालू, मायावती, नीतीश कुमार, करूणानिधी और अजीत सिंह जैसे दिग्गज मुंह लटकाए फिरने की स्थिति में आ गए हैं। अलबत्ता मोदी लहर के बावजूद ममता बनर्जी, जयललिता और नवीन पटनायक ने शानदार सफलता हासिल की है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन भी दुमका सीट बचाए रखकर संसद में वजूद कायम रखेंगे। आंध्र प्रदेश से विभाजित होकर बने नए राज्य तेलगांना का फयदा जरूर टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव को मिला है। सीमांध्र में वायएसआरसी के जगनमोहन रेड्डी ने बड़ी कमयाबी हासिल की है। दूसरी तरफ, आंध्र में ही चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी राजग गठबंधन में शामिल होकर अपनी पुनर्स्थापना कर ली। सबसे हैरत में डालने वाला कारनामा जुम्मा-जुम्मा एक साल पहले अस्तित्व में आई आप पार्टी ने कर दिखाया है। पंजाब में आप ने चार सीटों पर जहां विजयश्री हासिल की, वहीं दिल्ली की सातों सीटों पर कांग्रेस के दिग्गजों को पीछे खदेड़ कर दूसरे नबंर पर रही। यह अरविंद केजरीवाल का ही बूता था कि वह बनारस में नरेंद्र मोदी को टक्कर दे पाए। एक नई पार्टी को इतने कम समय में देशव्यापी विस्तार देना आसमान से तारे तोड़ लाना जैसी चुनौती है, जो अरविंद ने स्वीकारी।

सोलहवीं लोकसभा चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया है कि फिलहाल क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय विकल्प बनने के मंसूबे दिवास्वप्न ही हैं। देश को सबसे ज्यादा 80 सांसद और 6 प्रधानमंत्री देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश और फिर बिहार मजबूत क्षेत्रीय दलों के उत्थान और पतन का पिछले तीस साल से असरकारी प्रयोगशाला रहा है। लेकिन अब इन्हीं दोनों राज्यों में गलत संगत और जाति व मुस्लिम तुष्टीकरण के अतिवादी प्रयोग ने क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा के अखिल भारतीय सपने को धूल चटा दी। जयप्रकाश नरायण की समग्र क्रांति और इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल के असंतोष से इन राज्यों की राजनीतिक उर्वराभूमि में राष्ट्रीय लोकदल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी उभरी थीं। राष्ट्रीय लोकदल को छोड़ ये सभी दल डॉ. राम मनोहर लोहिया की सामाजवादी सोच के अनुयायी थीं। बहुजन समाजवादी पार्टी के जन्म का आधार जरूर डॉ. अंबेडकर की प्रेरणा और कांशीराम का दलित हित चिंतन था। लेकिन सत्ता में बने रहने के लालच में मायावती ने महज दलित हित संरक्षण का चोला ओढ़े रखने का काम किया। बसपा के बुनियादी सिद्धातों के साथ सामाजिक समरसता मसलन सवर्ण और अवर्ण के तालमेल का बेमेल खेल खेला।

दलितों और वंचितों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को उन्होंने कभी केंद्रीय मुद्दा नहीं बनाया। इसके उलट प्रधानमंत्री पद की दौड़ उनके लिए मुख्यमंत्री रहते हुए इतनी जरूरी हो गई थी कि उन्होंने दलितों के कानूनी हितों को भी सीमित कर दिया। जबकि उन्हें शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक विषमताएं दूर करने की दृष्टि से ऐतिहासिक पहल करने की जरूरत थी। गरीब की बुनियादी जरूरतों को नकारने ही का परिणाम है कि वे अर्श से फर्श पर आ गई हैं। बसपा का खांटी जाटव वोट भी खिसककर भाजपा के पाले में आ गया है। कांशीराम के सपने के इस हश्र ने मायावती के चेहरे की रंगत उड़ा दी है। 20 सांसदों से शून्य पर आ जाने के कारण बसपा की राष्ट्रीय मान्यता भी खतरे में है।

समाजवादी पार्टी का भी कमोबेश यही हश्र हुआ है। तीसरे मोर्चे के पैरोकरों में मुलायम सिंह दिल्ली कूच के लिए सबसे ज्यादा बेताब थे। मुलायम ने सांप्रदयिक और जातीय राजनीति का इतना ध्रुवीकरण किया कि वे मुजफ्फनगर सांप्रदायिक दंगों को भी कौमी चश्मे से देखने लग गए। वोट की इस देश विरोधी राजनीति ने उनकी लुटिया डूबो दी। पिछली लोकसभा में उनके 23 सांसद थे, अब उनकी गिनती परिवार के चार सदस्यों तक ही सीमित रह गई है। मतदाता ने तृष्टीकरण का जैसा तल्ख जबाब सपा को दिया है, वैसा किसी और दल को नहीं दिया। बीते दस साल मुलायम संप्रग सरकार को बिना शर्त समर्थन देने के बहाने अपने हित साधते रहे हैं, लेकिन अब वोट बैंक की राजनीति ने ऐसे हालात बना दिए हैं कि उनके बिना शर्त समर्थन की जरूरत भी राजग को नहीं है। उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों से एक ओर अच्छा संदेश यह निकला है कि मतदाता ने खैराती योजनाओं से मिले लाभ को वोट का आधार नहीं बनाया। वरना अखिलेश यादव सरकार लैपटॉप वितरण, छात्राओं को विद्याधन जैसी योजनाओं पर अब तक 70 हजार करोड़ रूपए खर्च कर चुकी है। इससे साफ हुआ कि लालच के लॉलीपॉप से वोट नहीं बटोरे जा सकते। बढ़-चढ़ कर खैरात बांटने में लगे राजनीतिक दलों को मतदाताओं ने यह अच्छा संदेश दिया है। यही सबक मतदाता ने पंजाब में अकाली दल को दिया है।

अवसरवाद के पर्याय व पुरोधा रहे, अजीत सिंह का राष्ट्रीय लोकदल की हैसियत भी मतदाता ने शून्य में बदल दी। उनके सभी 10 प्रत्याशियों ने पराजय का नया इतिहास पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जमीन पर लिख दिया है। जबकि अजीत सिंह ने जाटों को आरक्षण दिलाने में अह्म भूमिका का निर्वाह किया था। प्रदेश का यह पश्चिमी भूखंड ऐसा क्षेत्र है, जो जाट बहुल है। अजीत सिंह को यह जाट वोटबैंक अपने पिता चरणसिंह की विरासत में मिला था। उन्हें मौकापरस्त होने के साथ मुजफ्फनगर दंगों से आंख फेर लेने की सजा भी मतदताओं ने दी है। क्योंकि वे मुस्लिम वोट बैंक को भी बचाए रखना चाहते थे। वोट के लिए इस पक्षपाति व्यवहार को मतदाता के सामूहिक आवेश ने सबक सिखाने का काम किया है। अजीत का वह जतीय भ्रम भी टूट गया, जिसे वह जेब में रखा वोट मानकर चल रहे थे।

मोदी लहर का नुकसान वाममोर्चा को बड़े स्तर पर भुगतना पड़ा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांगेस ने उसका लगभग सफाया कर दिया है। 2009 के चुनाव में 15 सीटों पर जीत दर्ज कराने वाले वामपंथी 2 सीटों पर ही बमुश्किल जीत दर्ज कर पाए, जबकि बंगाल में अछूत रही भाजपा ने अपना जनाधार बढ़ा लिया है। दार्जिलिंग संसदीय सीट पर तो वह पहले से ही काबिज थी, अब आसनसोल से भी उसके उम्मीदवार बाबुल सुप्रिय ने विजय पताका फहरा दी है। अन्य आधा दर्जन सीटों पर भी वह चुनौति बनकर उभरी है। ममता बनर्जी के मां माटी और मानुष मंत्र ने मतदाता को कुछ इस तरह प्रभावित किया कि 2011 में हुए विधानसभा चुनाव से लगातार तृणमूल, पंचायत, निकाय और अब लोकसभा चुनाव में भी वमदलों को हार का स्वाद चखाती चली आ रही है। वाममोर्चो की खिसकती जमीन ने उनकी पार्टी की अखिल भारतीय मान्ययता को भी खतरे में डाल दिया है। माकपा और भाकपा मान्यता के लिए जरूरी न्यूनतम मत प्रतिशत व सीटें हासिल करने में नकाम रही हैं। किसी भी राजनीतिक दल के लिए राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के दो विकल्प हैं। इसके लिए किसी भी दल को 4 राज्यों में न्यूनतम 6 फीसदी वोट पाने के साथ ही, लोकसभा की 4 सीटें भी जीतना जरूरी है। इस शर्त के मुताबिक अब बसपा और शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी भी अखिल भारतीय होने की मान्यता खो देंगी। देश में कुल 6 राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल थे, जिनमें से अब कांग्रेस और भाजपा ही शेष रह जाएंगे। आम आदमी पार्टी पंजाब में 4 सीटें हासिल कर राष्ट्रीय गौरव प्राप्त करने के करीब पहुंच गई थी, लेकिन उसे 4 राज्यों में 6 प्रतिशत वोट नहीं मिल पाए। यही स्थिति तृणमूल, अन्नाद्रमुक और बीजू जनता दल की रही, ये दल अपने राज्य के अलावा अन्य राज्यों में कारगर उपस्थिति दर्ज कराने में नाकाम रहे। बहरहाल, मोदी लहर ने सभी क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय विकल्प को पस्त कर दिया है। क्योंकि जनता को केंद्र में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार की दरकार थी, जिसका मजबूत विकल्प ‘अबकी बार मोदी सरकार‘ के नारे ने पेश कर दिया है।

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1 Comment on "क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय विकल्प पर फिरा पानी"

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bipin kumar sinha
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Kisi cheej ki ek had hoti hai. In kshetriy dalon ne secularism ki chhoti chhoti dukan khol rakhi thi aur apani tataf se discount sell laga ralha tha, to ye prinam to hona hi tha.

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