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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-कुमार कृष्णन-
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-गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की जयंती पर विशेष-

रवीन्द्र नाथ ठाकुर का उपन्यास ‘गोरा’, अंग्रेजी शासन में भारत की राष्ट्रीय चेतना का औपन्यासिक महाकाव्य है। यह उस कालखण्ड की रचना है, जब भारतीय समाज अपने जातीय गौरव से विछिन्न होकर या तो अपने कालचक्र के कारण या फिर पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में आकर राष्ट्रीय चेतना से कट-सा गया था। चूंकि अंग्रेजी शासकों की राजधानी बंगाल थी, इसीसे यह भाव वहां ज्यादा प्रखर था और उसे ही प्रतीक रूप में स्वीकार कर तत्कालीन भारतीय सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को ‘गोरा’ उपन्यास में बड़ी जीवन्तता के साथ उभारा गया है।

भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि जब अंग्रेजों ने भारतीय मन को पराजित करने के लिए ईसाइयत का प्रचार प्रारम्भ किया, तब उसका विरोध भी जमकर हुआ। आरम्भ में अवश्य ही ईसाई पादरियों को अपनी लक्ष्य-सिद्धि में असफलता लगी, लेकिन ई. १८१३ में, धर्म-प्रचारकों पर से प्रतिबन्ध उठ जाने के बाद जिस तरह से ईसाइयत का प्रचार हिन्दू धर्म को खत्म करने के लिए हुआ, उसका उल्लेख इतिहास ग्रन्थों में बद्ध है। कैरी, डफ, विल्सन आदि के नेतृत्व में ईसाई धर्म हिन्दू धर्म पर बाज की तरह टूट पड़ा। और इसके लिए अंग्रेजों ने बंगाल के पढ़े-लिखे लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करना प्रारंभ किया। अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से ईसाई धर्म का प्रचार सहज संभव हो गया। स्थिति को ही देखकर तब मेकाले ने कहा था-थोड़ी-सी ही पाश्चात्य शिक्षा से बंगाल में मूर्त्ति पूजने वाला कोई नहीं रह जायेगा और ई. १८३५ में ही बंगाल में ईसाइयत के प्रचार से खुश होकर चर्चों की एक सभा में डफ ने कहा था- यह अंग्रेजी, देश में जिस-जिस ओर बढ़ेगी, उस ओर हिन्दुत्व के अंग टूटते जायेंगे और एक दिन ऐसा भी होगा कि हिन्दुत्व पूरी तरह से पंगू हो जायेगा।

रवि बाबू की कालजयी कृति ‘गोरा’ का हारान साहब यानी पानू बाबू अंग्रेजी शिक्षा और ईसाइयत से प्रभावित बंगाल के शिक्षित वर्ग के प्रतीक हैं, जो उपन्यास में हिन्दू धर्म के कट्टर विरोधी हैं। ईसाई प्रभाव के कारण ही पानू बाबू न केवल गोरा, विनय का विरोधी हैं, बल्कि वह बाद में परेश बाबू, सुचरिता, ललिता, सब के विरोधी बन बैठते हैं, और हिन्दू धर्म के प्रति झुकाव रखने या नम्रता दिखाने के कारण उन सबों के विरुद्ध अनेक अनैतिक कार्यों को सम्पादित करने में भी नहीं चूकते।

परेश बाबू का पूरा परिवार ब्राह्म समाज के अनुयायी है। आरम्भ में बाह्य समाज का चाहे जो भी स्वरूप रहा हो, लेकिन केशवचन्द्र सेन के प्रवेश के साथ ही उस समाज का स्वरूप पूरी तरह से ईसाइयत में बदल गया था। और इस धर्म से जुड़े लोगों की स्थिति को उपन्यासकार ने कई बार सामने रखने का प्रयास किया है, चाहे वह स्टीमर पर बैठे एक अंग्रेज के साथ एक बंगाली बाबू का उन हिन्दू तीर्थयात्रियों पर हंसना हो, या फिर स्कूल में अंग्रेज अफसर के सामने अपनी बेटी का अंग्रेजी-कविता-पाठ को लेकर उत्साहित होती परेश बाबू को पत्नी वरदासुन्दरी की स्थिति। स्टीमर पर अंग्रेज के सामने जो स्थिति बंगाली बाबू की है, वही कमोवेश पूरे बंगाल के शिक्षित समुदाय की थी, जो ईसाइयत से प्रभावित थे। उपन्यास का एक पात्र है सतीश, जिसके पास कुत्ते की शक्ल का एक खिलौना है, जो कुत्ता एक पैर पर उठ कर सलाम करता है, फिर सर को जमीन पर टेक कर प्रणाम करता है, बिस्कुट का टुकड़ा देख कर पूछ पर बैठ, अगला पैर जोड़ कर भीख मांगता है। उपन्यास में इस खिलौने का प्रवेश एक विशेष मकसद के लिए ही है। यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि सतीश ब्रह्मसमाजी परेश बाबू के घर पल रहा सुचरिता का भाई है।

और यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक होगा कि ब्रह्म समाज की स्थापना जब राजा राममोहन राय ने की थी, तब उसका लक्ष्य हिन्दू धर्म की संकीर्णमतों के विरोध से राष्ट्रीय चेतना का विकास था, लेकिन केशव सेन तक आते-आते यह ईसाइयत का प्रचारक मात्र रह गया था। ‘गोरा’ उपन्यास के एक स्थल पर उपन्यास के ही एक पात्र, विनय, का ब्रह्म समाज में केशव बाबू का व्याख्यान सुनने जाने का उल्लेख आया है, यह तत्कालीन बंगाल की धार्मिक और सामाजिक स्थिति की ओर संकेत में संकेत है। चूंकि पराधीन भारत की राजनीति बंगाल से ही ज्यादा संचालित हो रही थी, इसीसे बंगाल के शिक्षित वर्गों की मनोदशा का भी भारी प्रभाव भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर पड़ रहा था। अंग्रजी ज्ञान से मुग्ध राममोहन राय ने अंग्रेजी के माध्यम से ही देश में शिक्षा की वकालत की थी, यह सर्वविदित बात है, जबकि अंग्रेजी सरकार भी इसकी कल्पना नहीं कर सकी थी। राममोहन राय संस्कृत, फारसी या कोई देशी भाषा कैसे स्वीकार कर सकते थे, जबकि इस देश की सारी मान्यताएं ही उन्हें जीवनविरोधी दिख रही थीं।

ऐसे ही समय में १८७५ ई. में दयानन्द सरस्वती के द्वारा ‘आर्य समाज’ की स्थापना और बंगाल में रामकृष्ण के विचारों ने ब्रह्मसमाज के फैलते परों को पकड़ा और इसकी जगह हिन्दू विचारधारा को फिर बल दिया। इसी समय ई. १८९३ में एनी बीसेंट का भारत आगमन और थियोसाफिल सोसाइटी के द्वारा हिन्दू धर्म और भारत-भक्ति के प्रचार ने भी हिन्दू धर्म के परों में उड़ने के लिए नई ताकत दी। एनी बीसेंट ने ईसाई हुए ब्रह्म समाज की जगह अखण्ड हिन्दुत्व की बात कही। भारत के समस्त प्राचीन ग्रंथों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए, इसकी समस्त परम्पराओं को पूज्य माना, जिसे सुनकर भारतीयों का टूटा हुआ मन फिर से जाग उठा। हिन्दू धर्म के संबंध में वह अपने तर्कों को इतनी मजबूती और प्रभाव के साथ रखती थीं कि विरोधी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। कभी प्रख्यात साहित्यकार जार्ज बर्नार्ड शॉ ने उनकी वाक् कला के लिए कहा था-उस समय इग्लैंड में उनके जैसा ओजस्वी भाषण देने वाला कोई नहीं था। बीसेंट अपने उसी ओजस्वी भाषण में यह कहा करती थी, कि विश्व के सभी धर्मों में हिन्दू धर्म से बढ़कर पूर्ण वैज्ञानिक और दर्शनयुक्त अन्य दूसरा धर्म नहीं। ‘गोरा’ उपन्यास का नायक गोरा ऐनी बीसेंट का ही पुरुष रूप है। उपन्यास में कुछ शब्दों के हेर-फेर से वह बार-बार अपने विश्वास को दोहराता रहा है कि हिन्दू कोई दल नहीं है। हिन्दू तो एक जाति है। यह जाति इतनी बड़ी है कि इसका जातित्व किसमें है, यह किसी परिभाषा से बांधा ही नहीं जा सकता। समुद्र जैसे कोई नहर नहीं है, वैसे ही हिन्दू कोई दल नहीं है। गोरा सुचरिता से एक स्थल पर कहता है-इस भारतवर्ष की राख में अब भी बहुत दिनों की अग्नि जल रही है। एक दिन यह अग्नि सारी दुनिया में अपना प्रकाश फैलायेगी। हिन्दू धर्म मां की तरह अनेक मत-विश्वासों के लोगों को अपनी गोद में लाने का यत्न करता है।

इतना सब होते हुए भी हिन्दू जाति और धर्म में आई कुरीतियों से इनकार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि इस उपन्यास में ब्रह्म समाज का कोई मुखर विरोध नहीं मिलता। राम मोहन राय के बाद जिस ब्रह्म समाज का नेतृत्व महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर ने संभाला, वह भी हिन्दुओं के वेद-उपनिषद् में गहरी आस्था रखने के बावजूद, इसी रूढ़िवादिता से आहत थे। इस उपन्यास का एक नायक परेश बाबू एक स्थल पर सुचरिता से कहते हैं-आजकल हिन्दू धर्म में जिस तरह से जाल की तरह आचार और नियमों की कट्टरता घिर रही है, और हिन्दू धर्म में अन्य जातियों का प्रवेश कठिन हो गया है, उससे हिन्दुस्तान में एक दिन हिन्दू ही नहीं देखा जा सकेगा। उपन्यास में उपन्यासकार की यह चिन्ता सामान्य नहीं है। इसी कारण इस उपन्यास में हिन्दू धर्म के प्रति कट्टर भाव रखने वाले गोरा का विनयपूर्ण समर्पण ब्रह्म समाजी परेश बाबू और सुचरिता के समक्ष होता है और ब्रह्मसमाजी ललिता का विवाह हिन्दूधर्मालम्बी विनय के साथ। विवाह में परेश बाबू का विरोध नहीं दिखता। उपन्यास का यह अन्त, पराधीन भारत की मुक्ति के लिए सामाजिक एकता की अनिवार्य जरूरत पर बल देने के लिए ही था, जिसकी प्रासंगिकता आज भी खत्म नहीं हुई है।

वैसे भी यह अन्त इतिहास विरुद्ध नहीं हैं। ललिता और विनय का विवाह, दरअस्ल केशवचन्द्र सेन की अपनी पुत्री का कूचबिहार के राजा के पुत्र के साथ विवाह ही है। विवाह के सारे परिदृश्य इतिहास के ही परिदृश्य हैं। लेकिन उपन्यास में इसका चयन राष्ट्रीय एकता के मार्ग के विस्तार के लिए ही है और इसीकारण इस उपन्यास के गोरा को घोषपुर पहुंचाया गया है, जहां एक नापित दम्पति एक मुसलमान लड़के का भरण-पोषण कर रहा है, क्योंकि लड़के का पिता फर्रू सरदार अंग्रेजों का दुश्मन था। इस घटना का संयोजन तत्कालीन भारत में हिन्दू-मुसलमान की एकता को रूप देना ही है, जो अनैतिहासिक नहीं है। इतिहास बताता है कि बंगाल-विभाजन के प्रस्ताव और विभाजन ने किस कदर बंगाल के लोगों को क्रोधित किया था। यहां तक कि नापितों ने अंग्रेज साहिबों के दाढ़ी-बाल को बनाना तक बन्द कर दिया था।

रवि बाबू ने ‘गोरा’ उपन्यास का निर्माण देश के तत्कालीन सामाजित, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक दृश्यों की भूमि पर ही किया है, इसीकारण इस उपन्यास के नायक गोरा में हम दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण या ऐनी बीसेन्ट की आत्माओं का एक सम्मिलित रूप ही नहीं पाते, स्वामी विवेकानन्द की चिन्ताओं का भी जीवन्त रूप पाते हैं। विवेकानन्द हिन्दू धर्म के समर्थक होते हुए भी, भारत की पराधीनता के पीछे हिन्दू धम्र की जड़ कुरीतियों और आर्थिक विपन्नता को मानते थे। उपन्यास के अन्त में जब गोरा परेश बाबू से कहता है कि मैं हिन्दू नहीं हूँ, मेरे लिए भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण तक के देवमन्दिरों के द्वार बन्द हैं, मैं आयरिश हूूं, तब इसका कथन परेश बाबू के ही किसी कथन और विवेकानन्द की चिन्ताओं को रेखांकित करता है कि पराधीन भारत किस तरह तब भी अपनी सामाजिक-धार्मिक जड़ताओं से मुक्त होने से विमुख था, जिसके कारण विराट चेतना के हिन्दूधर्म से कटकर गोरा को आयरिश होने के बोध से भर जाना पड़ा। और तब गोरा हिन्दू धर्म की तमाम संकीर्णताओं को तोड़कर सम्पूर्ण भारत का हो जाता है-यह कहते हुए कि आज से मैं सारे भारतवर्ष का हूूं। मेरे भीतर हिन्दू, मुसलमान, ख्रिस्तान, सभी समाज हैं, किसी समाज के प्रति विरोध नहीं है। इस भारतवर्ष में सबकी जात मेरी जात है, सबका अन्न-मेरा अन्न। गोरा की इन पंक्तियों में भारत की मुक्ति का बीज छुपा हुआ है।

‘गोरा’ उपन्यास में राष्ट्रीय स्तर इतना प्रखर है कि यह गोरा से निकलकर उपन्यास की नायिका सुचरिता में भी आकर उतनी ही प्रखरता से बजने लगता है। उपन्यास के परिच्छंद छियासठ में वह अपने भाई सतीश से राष्ट्रधर्म के प्रति विमुख न होने की प्रेरणा के साथ कहती है-हमारा देश एक आश्चर्य है, ईश्वर के हजारों वर्ष के आयोजन का परिणाम है- यह भारतवर्ष। कितने महापुरुष यहां अवतरित हुए, कितने महायुद्ध हुए और कितने महावाक्य उच्चारित हुए। इस देश ने कितनी दिशाओं से धर्म को देखा है और दिशाएं दी है। ऐसा विराट है हमारा यह भारत वर्ष। तमाम बातों पर गंभीरता पूर्वक विचारने के बाद यह स्पष्ट होने लगता है कि गोरा उपन्यास में प्रेमकथा मूल कथा नहीं है-मूल कथा का यह भ्रम है, छाया है। मूल कथा तो है- १९वीं शती के उत्तरार्ध के पराधीन भारत के अवमूल्यन के कारणों की खोज और उसी के बीच राष्ट्रीय पुनर्जागरण के उभरते स्वरूप का गोरवपूर्ण आख्यान। उपन्यास के सारे पात्र, रूप बदले हुए, इतिहास के ही पात्र हैं। इसी अर्थ में गोरा उपन्यास एक रूपक का भी रूप धारण कर लेता है, जो रूपक हमारे उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध के भारत का है।

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