लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

विद्वानों की ज़बानी। 

प्रवेश: पाठकों के, विचार-चिन्तन-मनन इत्यादि के लिए, कुछ मौलिक कथन (१) एक मिशनरी का(२) एक विशेषज्ञ का(३) एक प्रभावी विचारक का प्रस्तुत है। 

पहले हिन्दी अनुवाद देता हूं। अंत में अंग्रेज़ी में मूल लेखक का कथन। 

बहुतेरे लेखक वर्ण और जाति दोनों के लिए अंग्रेज़ी Caste का प्रयोग करते हैं। कुछ संदर्भ से पता चल पाता है। मैं ने अंग्रेज़ी मूल परिच्छेद भी अंत में दिया है। अनुवाद में सरलता को ध्यान में रखते हुए भाषान्तर किया है।….. डॉ. मधुसूदन

(१) विलियम रॉबिन्सन–(मिशनरी लेखक ) ”मन्दिर के परिसरमें कमलों का तालाब ”से जातिका का गढ़ बाहरी प्रहारों से तोडा नहीं जा सकता। उसकी दिवारें जब अंदर के गढ़ रक्षक उनकी मरम्मत करना बंद करेंगे तभी गिरेगी। भारत नें एक ही अनुशासन अबाधित रखा है, और वह है उसके वर्णों का अनुशासन। यदि आप वास्तविक जनतंत्र भारत में स्थापित करने में सफल हो सकें, तो वह वर्णों को उजाड देगा। और यदि वह वर्णों को नष्ट करने में सफल रहा, तो उसके साथ हिन्दुत्व भी नष्ट होगा; और हिंदुत्व के नष्ट होते ही, जी हां, जो भारत, हज़ारों सालों से जिन्दा रहा है, वह भारत भी नष्ट होगा। उससे तो बहुत बहुत अच्छा यही होगा, कि वें निरंकुश नास्तिक बनने के बदले, अच्छे हिन्दू ही बने रहें।

By Temple Shrine and Lotus Pool, (पृ. ६६)

(२)

डॉ. कॊनराड एल्स्ट कहते हैं।

(क) जाति एक ”अलगतावादी” समूह के नाते देखी जाती है, पर उससे पहले वह ”आपसी मददगार (परस्पर सहायक) सदस्यों का” संगठित ढांचा है। इसी कारण ईसाई और इस्लामिक मिशनरियों को, हिन्दुओं को लुभाकर, बिरादरी से अलग कर, धर्मांतरण करने में बहुत कठिनाई प्रतीत हुयी।

कभी कभी सारी की सारी जाति इस्लाम में मतान्तरित होती थी, पर, पोप ग्रेगरी (पंद्रहवे १६२१-२३) {मतांतरण आसान करने के इरादेसे} ने आज्ञा दी कि मिशनरी, जातियों की पहचान धर्मांतरित ईसाइयों में भी सही जाएगी; इतने पर भी, स्थूल रूप से जाति ही, हिन्दुत्व की रक्षा करने में, और उसे बचाने में बडी कारगर साबित हुयी।

(ख) इसी कारण मिशनरी फिर जाति पर हमला करने लगे थे, विशेष रूपसे ब्राह्मण जाति पर। इसी कुत्सित, ब्राह्मण विरोधी, उग्र प्रचार ने राक्षसी रूप ले लिया , जैसे कि ऍन्टिसेमेटिज़्म का भी हुआ था।

(ग) हरेक जातिकी संप्रभुता, न्याय व्यवस्था, कर्तव्य और अधिकार, निश्चित हुआ करते थे। बहुत बार उनके अपने स्वतंत्र मंदिर भी हुआ करते थे।

अंतर जातीय मामले ग्राम पंचायत सुलझाया करती थी, जहां, एकदम ( तथाकथित ) नीची जाति को भी निषेध करने का पूरा अधिकार हुआ करता था।

इस प्रकारकी मध्यवर्ती सामाजिक स्वायत्तता जिंदा थी। और यह व्यवस्था, उस हुकुम-शाही के भी प्रतिकूल थी, जिस में सर्वसत्तात्मक राज्य के सामने आदमी का कोई मददगार नहीं मिलता । इस प्रकार का विकेंद्रित देहाती-नागरी (बिरादरी का ) समाज का ढांचा और हिन्दू धार्मिक प्रजातन्त्र, इस्लामिक शासन तले, हिन्दुत्व को बचाए रखने भी, बहुत कारगर साबित हुआ था।

(घ) जब, बुद्ध धर्म तो, उनके विहार नष्ट होते ही उजड गया,{पूरा अफ्गानीस्तान बुद्धिस्ट था, इस्लामी बन गया-मधुसूदन} पर हिन्दू समाज अपने जातियों के ढांचे तले रक्षा पा कर,(इस्लामीक) तूफान झेल गया।( पूर्वी बंगाल भी बुद्धिस्ट विहारो तले इस्लामीक बहुल हो चुका था-मधुसूदन)

ऐसी जाति-व्यवस्था, बहार से आए हुए यहुदि, पारसी (इरान से आए), और सिरीयन-इसाइ अतिथियों के लिए भी एक सहज आसरा (ढांचा)ही साबित हुयी।

वे केवल सहे ही ना गए, पर उन्हें परम्परा टिकाने में, सहायता भी दी गयी।

(च) पर, उन्नीसवी सदि के पश्चिमवादियों ने जातिप्रथा पर कॉलोनियल कल्चर थोप कर, पश्चिमी प्रजाति-वादी (रेशियल) सिद्धान्तों (थियरी) का (अंध)आरोपण कर दिया:

यह था, ”ऊंची गोरी जातियां बाहर से आक्रमण कर के, काले आदिवासियों पर, मालिकी हक जताने वाली, परदेश से आयी हुयी जातियां है।

(छ) यही मर चुकी हुयी थियरी, हिन्दु विरोधी लेखकों द्वारा, बार बार, ऊब आने तक दुहराई जाती है : जब मूर्ति पूजा की गाली भोथी पड गयी है। तो ”जातिवाद” की गाली का, नया शोध हिन्दुओं को राक्षस साबित करने में काम आ रहा है।

(ज)वैसे वास्तव में भारत में आपको, चमडी के सारे रंग मिल जाएंगे, और बहुत सारे ब्राह्मण भी, नेल्सन मॅन्डेला जितने काले भी मिल जाएंगे। प्राचीन-पुरातन ”आर्य” नर-नारी, आत्माएं जैसे कि, राम, कृष्ण, द्रौपदी, रावण (एक ब्राह्मण) और बहुत सारे वैदिक ऋषि भी, स्पष्ट रुप से काले रंग वाले ही बयान किए गए है।

(झ) अंत में जाति-युक्त समाज इतिहास में सब से ज्यादा स्थिरता वाला समाज (साबित हुआ) है।

(ट) भारतीय कम्युनिस्ट तो हँसी उडाया करते थे कि, ” भारत में कभी एक भी, क्रांति तक हुयी नहीं.” (उन्हें कोई बाताएं) कि, सच में यह कोई अहरी गहरी उपलब्धि (कमाई) नहीं है, {जो बिना खून बहाए उत्क्रान्ति कर लेती है। बदलाव भी आ जाता है, और खून भी कभी शायद न्यून मात्रा में बह्ता है।}

प्राप्तिस्रोत : ==>क्रिश्चन मिशनरी क्यों, जाति संस्था पर, और विशेष ब्राह्मणों पर प्रहार करते हैं।

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