लेखक परिचय

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला

भारतीय जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त। ट्रेड यूनियन में तीन दशक से अधिक कार्य करता रहा। अध्ययन व लेखन में रुचि। रायपुर से प्रकाशित स्थानीय दैनिक अख़बारों में नियमित लेखन। सामाजिक कार्यों में रुचि। सामाजिक एवं नागरिक संस्थाओं में कार्यरत। जागरण जंक्शन में दबंग आवाज़ के नाम से अपना स्वयं का ब्लॉग। कार्ल मार्क्स से प्रभावित। प्रिय कोट " नदी के बहाव के साथ तो शव भी दूर तक तेज़ी के साथ बह जाता है , इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि शव एक अच्छा तैराक है।"

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rahul-gandhi1एकदम सच कहते हो राहुल बाबा! शादी, बोले तो एकदम झमेला। शादी करेंगा तो बीबी, बच्चों की रिस्पांसबिलिटी तो लेना का होता| अब अपने अखिलेश भैया की बात को ही ले लो। शादी किया तो मुख्यमंत्री बनने के बाद बीबी को सांसद बनाया की नहीं और वो भी निर्विरोध। अपुन को नहीं मालूम की कभी आपका मां, दादी या नाना भी कभी निर्विरोध सांसद बना है की नहीं? अपुन को तो लगता है राहुल बाबा की कांग्रेस के कल्चर के बारे में आपसे ज्यादा कोई नहीं जानता। आप एकदम ठीक बोला, ये हाईकमान आपका दादी का शुरू किया हुआ ही है। जब सब तरफ से आक्रमण होगा तो कोई न कोई को कमान तो संभालना ही होगा| फिर, आपका फेमिली क्यों न संभाले।आपका दादी, आपके चाचा को कार बनाने का कारखाना खुलवा दिया| सबको बड़ा तकलीफ हुआ। अटलजी को लम्बी उम्र मिले , अभी तो सुना है वो बोल नहीं पाते, उस समय खूब बोलते थे, बोले की इंदिरा सरकार गाय है और आपके चाचा, याने संजय चाचा, बछड़ा। अब बोले तो सबके मां, बाप को अपने बच्चों की रोजी रोटी का फिकिर होता है। आपके दादी को था तो क्या गलत था। आप ये भी बोले की आप यदि दादी की जगह होते तो वही करते जो दादी ने किया| अपुन आपको एक और बात कहता हूँ, बोले तो ये कि अगर आपका दादी आज अगर आपकी जगह होता तो वो भी ये ही करता, जो आज आप या आपकी मां कर रहे हैं| बोले तो अंडा दे मुर्गी और ऐश करे फ़कीर। पर, आप शादी नहीं करेगा, ये एकदम परफेक्ट डिसीजन है, आखिर देश के वास्ते सबको कुछ न कुछ कुरबान करना मांगता है। वैसे भी, अपुन फिल्मों भी देखा है, खासा हीरो, बोले तो समाज की हर बुराई के खिलाफ लड़ने को हरवक्त तैयार, पर, शादी करने के बाद बीबी के चक्कर में बोले तो खलनायकों से बहुत मार खाता है। बीबी भी बोले तो उसे बुराई के खिलाफ लड़ने की परमीशन तब देती है, जब प्रोड्यूसर, डायरेक्टर सब का सब फिलिम बनाते बनाते थक जाता है और फिलिम ख़त्म होने को होती है। आपका फिलिम का तो भी शूटिंग भी शुरू नहीं हुआ है, आप इस झमेले एकदम ईच नहीं पड़ना। आप बोले की आपका आदर्श गांधी हैं, वहां तक तो ठीक है। और बोले तो निष्काम कर्म में विश्वास रखते हैं, वहां तक भी ठीक है| पर, आगे गांधी बाबा को फालो करने की जरुरत नहीं है। बोले तो इस वास्ते की फिर आगे का रास्ता बहुत कठिन है। गांधी गलत को बिलकुल बर्दाश्त नहीं करता था, बोले तो एकदम सनकी माफिक| पर, आपको तो सब बर्दाश्त करना है। आप कर भी रहे हैं। इस देश में वो सब है, जो गांधी नहीं चाहता था और आप वो सब बर्दाश्त कर रहे हैं। बोले तो आपकी सरकार करप्शन में दुनिया में नंबर वन है। गांधी बोलता था की पहले गरीब को खाना मिलना चाहिए फिर अमीर के खाने की चिंता करनी चाहिए। आपकी सरकार पहले अमीर की चिंता करती है फिर गरीब की बात करती है। गांधी बोलता था पाप से घृणा करो पापी से नहीं। आपकी सरकार पापी और पाप दोनों से प्यार करती है। गांधी रोज शाम को प्रार्थना सभा में कुछ न कुछ बोलता था। आपकी पार्टी के प्रधानमंत्री और आपकी माँ जहां बोलना चाहिए , वहां भी चुप रहते हैं। आप बोले की गांधी हर तबके के लोगों को प्रेरित किया । पर, अपुन को ऐसा नहीं लगता। यदि गांधी सबको प्रभावित किया होता तो सबसे ज्यादा तो कांग्रेसी प्रभावित होने चाहिए थे, पर, आपको लगता है क्या कि कांग्रेसी गांधी से प्रभावित हैं? आप बोलेंगे की गांधी सूत कातते थे और अधिकाँश कांग्रेसी खादी पहनते हैं तो फिर सबसे ज्यादा प्रभावित तो वो हुए जिनके पास आपके राज में पहनने को कपडे नहीं हैं, क्योंकि गांधी जी भी आधे नंगे ही रहते थे( गांधी माफ़ करें)। अपुन से इसीलिये आपको एकदम मुफ्त की सलाह, बोले तो गिफ्ट में क्या, कि गांधी का पूरा पूरा इस्तेमाल करने का, पूरा दूध निकालने का, पर, फालो नहीं करने का, फालो करना बोले तो पचड़े में पड़ने के माफिक। आप एक बात और बोले की आप सांसदों को अधिकार सम्पन्न बनाना चाहते हो। बोले तो मुफ्त के खाने से लेकर भ्रष्टाचार, बलात्कार, सवाल पूछने का पैसा लेने जैसा कौन सा अधिकार है जो उनके पास नहीं है? अब आप उनको क्या सरे आम अपुन का खून करने का अधिकार दिलाना चाहते हो? राहुल बाबा, अपुन आपको एक राज की बात बोलता हूँ, अधिकार बोले तो देश के उन 70 करोड़ लोगों के पास नहीं है, जिनके लिए आप मनरेगा चलाते हो और उनको उनकी मजदूरी नहीं मिलती, जिनके लिए आप पिछले 9 वर्षों से खाद्य सुरक्षा क़ानून ला रहे हो(कभी सोचा की 9 साल कोई भूखा ज़िंदा भी बचेगा), अपना हाथ जिनके साथ होने की बात करते हो, पर, वो हाथ हमेशा लेने के लिए ही बढ़ता है, कभी देने के लिए नहीं उठता। पर, ये आपको कभी पता नहीं चलेगा, बोले तो क्यूं , इस वास्ते की ये गांधी को भी नहीं पता था। वो जब साऊथ अफ्रिका से वकालत करने के बाद आया तो आपके माफिक सूटेड बूटेड था। जस्ट लाईक गोल्डन स्पून इन सिल्वर माऊथ| अपुन का अंगरेजी कमजोर है, पर लगता है ये लाइन भी परफेक्ट कहावत बनेगा। देश का गरीबों का हाल जानने के वास्ते उसको पूरे देश का दौरा बिना चमचों के(उस जमाने में दिग्गी जैसे चमचे होते थे की नहीं अपुन को नहीं मालुम) करना पड़ा और वो आधे रास्ते में आधा नंगा हो गया। आगे अपुन क्या बोलेगा आप खुद समझदार हैं।

 

अरुण कान्त शुक्ला

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