लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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इस आलेख का नाम ही भ्रम पैदा करने वाला है । शायद उत्सुकता जगाने वाला भी । कई बार आलेख का नाम इस प्रकार का रखना पड़ता है कि पाठक उत्सुक होकर उसे पढ़ लें । लेकिन मैंने यह शीर्षक केवल उत्सुकता जगाने के लिये नहीं लिखा है । पिछले दिनों ये दोनों महानुभाव अलग अलग कारणों से चर्चा में आये । पहले बात डा० अमर्त्य सेन की । सेन को कुछ साल पहले अर्थशास्त्र में नाबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था । वे दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्रियों में गिने जाते हैं । भारत सरकार ने उन्हें बिहार स्थित नालन्दा विश्वविद्यालय का कुलाधिपति नियुक्त किया था । वे आम तौर पर देश से बाहर ही रहते हैं , लेकिन विश्वविद्यालय के काम में बराबर रुचि लेते रहे हैं । आम तौर पर जब सरकार बदलती है तो इस प्रकार के पदों पर बैठे लोग त्यागपत्र दे देते हैं । लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों में हस्तक्षेप न करते हुये कुलाधिपति की मर्यादा का ध्यान रखते हुये उनकी कार्य अवधि में दख़लन्दाज़ी नहीं की । समय पाकर अमर्त्य सेन का नालन्दा विश्वविद्यालय का कार्यकाल पूरा हो गया । उनको आशा रही होगा कि सरकार मेरा कार्यकाल बढ़ा देगी या फिर दूसरी अवधि के लिये भी मुझे ही कुलाधिपति नियुक्त कर देगी । परन्तु उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई । तब अमर्त्य सेन को ग़ुस्सा आया । उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा संस्थानों में दख़लन्दाज़ी कर रही है । इन संस्थानों में राजनीति को नहीं आना चाहिये । सेन के हिमायती हुंकारने लगे कि यह एक विद्वान का अपमान है । सेन का यह ग़ुस्सा उनके किस मनोविज्ञान का प्रतीक है ? यह अहंकार है कि मुझसे विद्वान कोई और हो ही नहीं सकता । यदि सेन को पद नहीं दिया जाता तो उनकी दृष्टि में यह विद्वानों का अपमान है । उनको लगता है उनसे बड़ा विद्वान कोई और हो ही नहीं सकता । गुरु नानक देव जी ने इसे ही हऊमै कहा है । विद्या ददाति विनयम् , उक्ति प्रसिद्ध है । लेकिन दुर्भाग्य से विद्या अहंकार भी पैदा करती है । यह ज्ञान का अहंकार है । यह अन्य सभी अहंकारों से ख़तरनाक होता है । यह अहंकार नालन्दा की प्राचीन परम्परा के भी अनुकूल नहीं है , जिसके कुलाधिपति सेन रहे हैं । इसमें अमर्त्य सेन का दोष नहीं है । ऐसा बहुत से मामलों में हो ही जाता है । अहंकार का शमन इतना आसान नहीं है जितना आम तौर पर समझा जाता है । जब सरकार सेन को पद देती है तो उनकी दृष्टि में यह राजनीति नहीं बल्कि उनकी विद्वता का सम्मान है , जब उनको पद नहीं देती तो यह राजनीति हो जाती है । यदि कुलाधिपति का पद , सेन की दृष्टि में राजनीति है , तो उनको समझ लेना चाहिये था कि उनको यह पद राजनीति के कारण ही मिला था और राजनीति के कारण ही जा रहा है । यदि उनको लगता है कि उन्हें यह पद विद्वत्ता के कारण मिला था तो उन्हें यह भी समझ लेना चाहिये कि भारत में केवल वही विद्वान नहीं हैं , दूसरे भी विद्वान हो सकते हैं । मुझे लगता था कि अमर्त्य सेन अपने अहंकार को मार कर आचार्यों की उस श्रेणी में पहुँच चुके हैं , जिसका ज़िक्र पुराने ग्रन्थों में आता है । लेकिन सेन ज्ञानाभिमानसे फूले सामान्य व्यक्ति ही सिद्ध हुये ।

अब दूसरा क़िस्सा राहुल गान्धी का है । राहुल गान्धी राजवंश से हैं । यह ठीक है कि नेहरु वंश परम्परा से राजवंश परिवार नहीं कहलवा सकता लेकिन लोकतांत्रिक तरीक़े से जब कोई परिवार राजवंश का रुतबा हासिल कर लेता है तो वह नेहरु परिवार बन जाता है । ऐसे परिवारों में जब कोई जन्म लेता है तो उसे राजवंशों के सभी गुण अवगुण प्राप्त हो जाते हैं । जिन उपलब्धियों या प्रप्तियों के लिये सामान्य जन को कठिन संघर्ष करना पड़ता है , राजवंश के बच्चों को वे ,राजवंश में जन्म लेने के कारण ही प्राप्त हो जाती हैं । राजवंशों के बच्चों का मूल्याँकन उनके गुण,अवगुण या फिर उनकी योग्यता अयोग्यता के आधार पर नहीं होता । मूल्याँकन के ये पैमाने तो साधारण जन पर लागू होते हैं । वे राजकुल में होने के कारण शासन करने के लिये ही पैदा होते हैं । वास्तविक सत्ता न भी हो , राजकुल अपने आप में ही सत्ता का केन्द्र है । राजवंश में रहस्यमय वातावरण बरक़रार रहना चाहिये, उस रहस्य के कारण ही आम आदमी राजवंश के प्रति श्रद्धा पाल सकता है या फिर उससे भयभीत हो सकता है । लाल साड़ी के लेखक का यही कहना है कि उनके उपन्यास पर राजवंश को यही एतराज़ था कि सोनिया गान्धी केजीवन के इटली वाले हिस्से में सोनिया को एक सामान्य मानव प्राणी के नाते चित्रित किया गया है । जबकि यह चित्रण रहस्य के कोहरे में लिपटा होना चाहिये था । अब उस राजवंश के राहुल गान्धी के पास या उनके स्टाफ़ के पास पुलिस का एक अदना सिपाही एक मुडा तुड़ा फ़ार्म लेकर पहुँच जाता है और अपना घटिया सा पैन निकाल कर पूछना शुरु कर देता है कि साहिब आपका क़द कितना है , बालों का रंग कैसा है , आँखों का रंग कैसा है , बूट कौन से पहने हुये हैं ? हिमाक़त की भी हद होती है । राजवंश के बच्चों से ऐसे बेहूदा प्रश्न ?

पुलिस का कहना है कि उन्हें तो हर एक के ये विवरण इक्कठे करने पड़ते हैं , जिन्हें सुरक्षा प्रदान की जाती है । यह फ़ार्म तो हर एक के बारे में भरा जाता है । इसमें कोई शक नहीं कि यह फ़ार्म भरवाना , आज के युग में कितना प्रासांगिक है और कितना नहीं , इस पर बहस हो सकती है और होनी भी चाहिये । लेकिन दुर्भाग्य से बहस इस बात को लेकर नहीं हो रही कि फ़ार्म कितना जरुरी है और कितना नहीं । बहस तो इस बात को लेकर हो रही है कि राहुल गान्धी से यह फ़ार्म भरवाने की आपकी हिम्मत कैसे हो गई ? आप बाक़ी लोगों से भरमाते हो तो शौक़ से भरमाते रहो । आपको कौन मना कर रहा है । आज तक किसी ने किया भी नहीं । लेकिन अब तो आपने हद ही कर दी । वह फ़ार्म लेकर राहुल गान्धी के दरवाज़े तक पहुँच गये । दिल्ली पुलिस ने स्पष्टीकरण दिया कि यह विवरण तो हर साल एकत्रित किया जाता है । तब राज दरबार के एक ऐलची ने ख़ुलासा किया कि आज तक तो सोनिया गान्धी और राहुल गान्धी से यह फ़ार्म भरवाने की किसी ने हिम्मत नहीं की ।दरअसल राजवंश का यही कष्ट है । आज तक राजवंश सामान्य प्रक्रिया से अलग था । राजवंश आख़िर राजवंश होता है । अब उसके बच्चों को भी साधारण आदमी की श्रेणी में रखने की कोशिश हो रही है ।

शास्त्रों में जिसे राजमद कहा गया है , वह यही मद है जो राहुल गान्धी के वंश के सिर चढ़ कर बोल रहा है । गोसाईं जी कहते थे- प्रभुता पाहि काही मद नाहीं । राजवंश ही तो प्रभुता है । उसके मिलने पर मद या नशा क्यों नहीं आयेगा ? राजवंश का नशा या अहंकार तो ज्ञान के अहंकार से ख़तरनाक होता है । अमर्त्य सेन पहले के शिकार हैं और राहुल गान्धी दूसरे के । लेकिन अहंकार दोनों का एक जैसा ही बढ़ा चढ़ा है । किसी मध्यकालीन कवि ने कहा था कि सोने में धतूरे से सौ गुना ज़्यादा नशा है । धतूरे को तो खाने पर आदमी बौरा जाता है लेकिन सोना तो केवल प्राप्त हो जाने से ही आदमी बौरा जाता है । यदि इस दोहे में सोने की जगह प्रभुता लिख दिया जाये तो अर्थ में बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा । राहुल को राजवंश की प्रभुता हासिल है और अमर्त्य सेन को ज्ञान की । इसलिये दोनों का व्यवहार लगभग एक जैसा ही है । लोकतंत्र ने कुछ हद तक इस राजवंश के भीतर छिपा अहंकार का मद निकाल दिया था , लेकिन अभी भी कुछ बचा हुआ है । रही बात अमर्त्य सेन की ! यहाँ चुप रहना ही श्रेयस्कर है । विद्या का अहंकार बड़ों बड़ों को निगल गया ।

-डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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