लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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rahulप्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश रवानगी के तयशुदा समय के बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस ले रहे अजय माकन को बीच में रोकते हुए राजनीति में एंग्री यंग मैन की छवि को नए आयाम दे दिए। दरअसल राहुल ने दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को कूड़े में फेंकने की बात क्या की, राजनीतिक दलों से लेकर आम आदमी तक इसके निहितार्थों को समझने में लग गया। यह भी महज संयोग नहीं हो सकता कि राहुल के इस अवतार से एक दिन पूर्व ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अध्यादेश के संबंध में चर्चा के लिए कानून मंत्री कपिल सिब्बल और विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को बुलावा भेजा था। यानि देखा जाए तो राहुल का यूं प्रेस कांफ्रेंस में आना अनायास नहीं बल्कि एक तयशुदा स्क्रिप्ट के तहत था। फिर भी राहुल का अध्यादेश के विरोध में आना कई सवालों को जन्म दे रहा है। अव्वल तो अध्यादेश पर कबिनेट की बैठक में मुहर लगी थी जहां भले ही होने वाले फैसले सामूहिक कहाते हों किन्तु उन्हें लेता कौन है यह किसी से छिपा नहीं है? बैठक की अध्यक्षता जहां सोनिया गांधी ने की थी वहीं राहुल भी मौजूद थे। यदि राहुल को तनिक भी संदेह था कि यह अध्यादेश उनकी पार्टी की छवि को धूमिल करेगा तो उन्होंने इसके खिलाफ बैठक में मुखरता क्यों नहीं दिखाई? क्यों उस अध्यादेश को आनन-फानन में राष्ट्रपति के पास भेजा गया? दूसरा यह कि विपरीत परिस्थितियों में जिस तरह मनमोहन सिंह सरकार चला रहे हैं, वह काबिलेगौर है। मीडिया द्वारा उछाली गई सत्ता के तीन मजबूत केन्द्रों की अफवाह से बेपरवाह मनमोहन की विदेश यात्रा के दौरान राहुल को प्रोजेक्ट करना आखिर क्या वजह है? एक ओर तो मनमोहन सिंह अमेरिका में भारत की सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट के लिए समर्थन जुटा रहे हैं वहीं पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरेआम उनके और मंत्रियों के फैसले को कूड़े में फेंकने की बात कर रहे हैं। क्या यह स्थिति देश में कमजोर प्रधानमंत्री की छवि को विदेश में पुख्ता नहीं करती? आखिर प्रधानमंत्री की स्वदेश वापसी तक का इंतज़ार राहुल से क्यों नहीं हुआ? यहां यह विचारणीय है कि उत्तरप्रदेश में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी की एक रैली को संबोधित करते हुए राहुल ने बांह तक कुर्ता चढ़ाकर मंच से समाजवादी पार्टी के घोषणा-पत्र को फाड़ दिया था। और जैसा कि होता आया है, मीडिया ने राहुल की इस क्रिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया दी थी। हां, यह बात और है कि आम आदमी पर इस एंग्री मैन छवि का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। इस कृत्य ने राहुल के नंबर बढाने की बजाए उन्हें ही मजाक बना डाला था। कुछ ऐसा ही इस बार हो रहा है। तमाम सवालों के बीच अपने चिर-परिचित अंदाज में राहुल जब प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से मुखातिब थे, तो देश की जनता समझ रही थी कि राहुल का यह गुस्सा अपने प्रधानमंत्री या सरकार के फैसलों से ज्यादा खुद के छवि निर्माण से जुड़ा है। 
जहां तक अध्यादेश की बात है तो भाजपा से लेकर वाम दलों तक ने इसके विरुद्ध अपनी चिंताएं प्रकट की थीं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी यह गुजारिश की गई थी कि वे अध्यादेश पर मुहर लगाने से पूर्व राष्ट्र की चिंताओं से अवगत हों। अध्यादेश के विरोध में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी कहा था कि यदि इसे राष्ट्रपति के पास भेजने से पहले सर्वसम्मति बनाई जाती तो बेहतर होता। यह भी लग रहा था कि राष्ट्रपति ने जिस तरह वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों को बुलावा भेजा है, कहीं वे उन्हीं के हाथों पुनर्विचार हेतु विवादित अध्यादेश न भेज दें। और यदि ऐसा होता, जो काफी हद तक संभव भी लग रहा है, तो कांग्रेस की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। यहां तारीफ करना होगी प्रणब मुखर्जी की कि उन्होंने अपने फैसलों से राष्ट्रपति पद की गरिमा को उच्चतम स्तर तक पहुंचाया है। देश में व्याप्त ‘रबर स्टाम्प’ की धारणा को उन्होंने बदला है और कई मौकों पर सरकार के हितों से इतर देश हित में फैसले लिए हैं। शायद यही वजह थी कि सरकार और पार्टी को यह भान हो चुका था कि यदि राष्ट्रपति भवन से अध्यादेश वापस होता है तो यह शर्मिंदगी ऐन चुनाव के पूर्व उसे भारी पड़ने वाली है। अतः इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए जो रास्ता अख्तियार किया गया वह राहुल के रूप में देश के सामने आया। हालांकि इस दांव से भी पार्टी असहज है और विपक्ष इस वाकये को प्रधानमंत्री पद की गरिमा से जोड़कर चिंगारी को शोला बना रहा है, किन्तु इससे राहुल की छवि को फायदा हुआ है, ऐसा लग नहीं रहा। कुल मिलाकर राहुल को सामने लाकर जो प्रहसन रचा गया है वह मात्र इसलिए है ताकि अध्यादेश खारिज करने का श्रेय भाजपा को देने की बजाय राहुल को दिया जाए।फ़िर ऐसा करके एक तीर से दो निशाने भी साधे गए। पहला भाजपा को यह मौका नहीं मिल पाएगा कि उन्होंने राजनीति के अपराधीकरण को अस्वीकार किया जिसके कारण राष्ट्रपति को अध्यादेश खारिज करना पड़ा और दूसरा कांग्रेस के भीतर मनमोहन बनाम मुखर्जी के सत्ता समीकरण को भी ठीक कर लिया गया। आखिरकार २०१५ में मनमोहन प्रधानमंत्री रहें न रहें, प्रणव मुखर्जी को तो राष्ट्रपति रहना ही है। इसलिए राहुल को सामने कर दिया गया। अब जबकि यह तय हो चुका है कि राहुल की छवि और भावी राजनीतिक भूमिका के मद्देनजर विवादित अध्यादेश रद्दी की टोकरी में जाएगा, सभी की नजरें मनमोहन सिंह के अगले कदम पर जा टिकी हैं। सुना है वे नाराज हैं और अब सोनिया से लेकर राहुल तक उन्हें मनाने के प्रयास कर रहे हैं किन्तु तस्वीर तो अब ३ अक्टूबर को ही साफ़ होगी जब प्रधानमंत्री एक बार फिर कैबिनेट की आपातबैठक लेंगे। तब साफ़ होगा कि कांग्रेस में सत्ता के कितने ध्रुव हैं और आंतरिक लोकतंत्र के मामले में इंदिरा की पार्टी में क्या परिवर्तन हुए हैं?
सिद्धार्थ शंकर गौतम 

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