लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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rahulमैं आपको पहले ही स्पष्ट कर दूं कि मुझे फिल्म देखने का शौक पिछले जन्म में ही नहीं था, फिर इस जन्म की तो बात ही क्या है ? इसलिए आप इस शीर्षक को ‘फटा पोस्टर, निकला हीरो’ का प्रचार न समझें। इसके लिए तो अमिताभ बच्चन और उनका महाकरोड़पति वाला कार्यक्रम ही बहुत है।

फिर भी बहुत दिनों से प्रतीक्षा हो रही थी। बहुत दिन कहना शायद ठीक नहीं होगा, बहुत महीनों से प्रतीक्षा हो रही थी कि पोस्टर फटे और हीरो निकले; पर पोस्टर फटा, तो जो निकला, उसे देखकर सबकी हंसी निकल गयी। अरे, ये तो अपने राहुल बाबा हैं। न जाने कहां गायब हो गये थे; पता नहीं देश में थे या विदेश में; मैडमश्री तो अमरीका में स्वास्थ्य की जांच कराने के बाद लौट आयीं; पर बाबा शायद तन-मन रंजन के लिए वहीं रुक गये थे। और अब आये हैं, तो बिल्कुल क्रांतिकारी छवि के साथ।

अब तो बेचारे कम्यूनिस्ट भारत में इतिहास की वस्तु होते जा रहे हैं; पर कोई समय था, जब उनकी चमक-दमक देखने लायक हुआ करती थी। चेहरे पर आठ-दस दिन पुरानी घास-पात, अंगूठे से टूटी हुई नयी चप्पल, शरीर पर राजेश खन्ना कट कुर्ता और पैंट, कंधे पर थैला, उंगली में रेड एंड वाइट ब्रांड की आधी सिगरेट देखकर दूर से ही समझ आ जाता था कि ये आदमी नहीं कम्यूनिस्ट है। डिग्री काॅलिज में पढ़ने वाले प्रथम श्रेणी के युवक उनकी इस क्रांतिकारी छवि की ओर सहज ही आकर्षित हो जाते थे।

शर्मा जी का भी उन दिनों यही हाल था। सोते-जागते हर समय वे विरोध और विद्रोह की बात सोचते थे। कई बार तो इसका सिर-पैर भी समझ में नहीं आता था। जैसे गरमी में लोग छत पर सोते थे, तो वह नीचे कोठरी में घुस जाते थे। सरदी में कई बार उन्हें बाहर बरामदे में सोया पाया जाता था। कोई इसका कारण पूछता, तो वे कहते थे कि हम विद्रोही हैं। परम्पराओं को तोड़ना ही हमारा काम है। एक बार किसी ने उन्हें चिढ़ाने के लिए पैरों की बजाय हाथ से चलने की चुनौती दी, तो उन्होंने कुछ देर ऐसा भी करके दिखा दिया। हां, खाना उन्होंने मुंह से ही जारी रखा। इस परम्परा को वह चाहकर भी बदल नहीं सके।

पर धीरे-धीरे नून तेल लकड़ी के चक्कर में शर्मा जी के विद्रोह की हवा निकल गयी। वे समझ गये कि फैशन के लिए तो कुछ दिन विद्रोही होना ठीक है; पर जीवन की गाड़ी विद्रोह के सहारे नहीं चलाई जा सकती। उसके लिए तो परिश्रम रूपी इंजन के साथ-साथ समन्वय और धैर्य रूपी पहियों की आवश्यकता होती है।

पर राहुल बाबा को यह कौन समझाये। वे तो मुंह में सोने का चम्मच लेकर ही इस धरा पर प्रकट हुए हैं। नून तेल लकड़ी के लिए कष्ट तो उनके पुरखों को भी नहीं करना पड़ा। इसलिए उनका विद्रोह का स्वर अभी विद्यमान है। यह बात दूसरी है कि उस विद्रोह की आंच को बहुत फूंकना पड़ता है, तब जाकर उसमें कुछ देर को चिन्गारी उठती है।

पिछले दिनों जब भाजपा वालों ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया, तो लोगों ने समझा कि अब बाबा के चूल्हे में से भी कुछ धुआं निकलेगा; पर वहां तो लकडि़यां ही नदारद थीं। चेले और चमचों ने यहां-वहां से लकड़ी जुटाई, मिट्टी का तेल डाला, घंटों तक फूंक मारी; पर सब व्यर्थ।

लेकिन पिछले दिनों जब कांग्रेस और उनकी सरकार ने दागी नेताओं को चुनाव लड़ाने वाला विधेयक अध्यादेश के द्वारा पारित कराना चाहा, तो न जाने कहां से राहुल बाबा नमूदार हो गये। उन्होंने  भरी प्रेस वार्ता में इस बकवास अध्यादेश को फाड़कर फेंकने को कहा। उनकी इस विद्रोही छवि से कुछ देर को तो पत्रकार सकपका गये; पर जब उन्होंने कुछ प्रश्न पूछे, तो फिर बाबा को सांप सूंघ गया। क्योंकि वे तो केवल उतने ही नाटक का अभ्यास करके आये थे। इससे आगे के डायलाॅग या तो उन्हें लिखे हुए नहीं मिले, या फिर वे उन्हें भूल गये। जो भी हो; पर कुछ देर में ही इस क्रांतिकारी चादर की धूल झड़ गयी।

अब लोग राहुल बाबा से पूछ रहे हैं कि यदि तुम्हारा इस कानून से इतना विरोध है, तो जब सारी सरकार इसे स्वीकार कर रही थी, तब तुम और तुम्हारी मम्मीश्री कहां थे ? क्या तुम्हारी बिल्ली तुम्हारी इच्छा के बिना म्याऊं कर सकती है ? यदि नहीं, तो फिर म्याऊंमोहन सिंह को पहले ही क्यों नहीं रोका गया ?

लेकिन अब क्या करें ? सांप-छंछूदर वाली स्थिति हो गयी है। न निगलते बनता है न उगलते। डेढ़ साल पहले उ.प्र. की एक चुनावी सभा में उन्होंने ऐसे ही कुर्ते की बाहें चढ़ाकर श्रोताओं के सामने एक कागज फाड़ा था। सोचा था जनता इससे प्रभावित होगी; पर लोगों ने वह कागज तो नहीं उठाया, हां कुर्ते की बाहें जरूर आधी कर दीं। जितने सांसद पिछले लोकसभा चुनाव में जीते थे, विधायकों की संख्या उससे भी कम रह गयी। अब दूसरी बार उन्होंने ऐसा ही क्रांतिकारी कदम उठाया है। इसका परिणाम क्या होगा, राम जाने।

कुछ लोग इस कवायद को ‘खोदा पहाड़ और निकला चूहा, वो भी मरा हुआ’ या ‘बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जो चीरा तो इक कतरा खूं न निकला’ बता रहे हैं। वे चाहे कुछ कहें; पर मैं तो इस फटे पोस्टर से पप्पू की कापी की जिल्द बनाऊंगा। पोस्टर से भले ही जीरो निकला हो, पर उसका कागज बहुत सुंदर है, इसमें कोई संदेह नहीं।

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2 Comments on "व्यंग्य बाण : फटा पोस्टर, निकला जीरो"

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इंसान
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विजय कुमार जी, देखता हूँ आपने अन्यत्र प्रस्तुत कीर्तिश भट्ट द्वारा रचित व्यंगचित्र, “अध्यादेश “फाड़ो” समारोह” को व्यंगात्मक शब्दों का अर्द्ध आस्तीन कुरता तो अवश्य पहना दिया है लेकिन मुझे भय लगा रहेगा कि “फटा पोस्टर, निकला जीरो” में पप्पू-ब्रिगेड व मेरी पीढ़ी के अधमरे नेहरू-ब्रिगेड गोलाकार जीरो को लुड़काते प्रधान मंत्री की कुर्सी पर स्थापित न कर दें। मैं तो चाहूँगा कि संगठित समस्त भारतीय जनसमूह आलेख के शीर्षक को “खोदा पहाड़ और निकला चूहा, वो भी मरा हुआ” में बदल दें!

DR.S.H.SHARMA
Guest

This is so accurate and fitting article on Baba Rahul. He is immature , incapable , restless ,inexperienced, and good for nothing .
His guru is Digvijay Singh so what more can you expect?
GURU AUR CHELA LALACHI,
DUBENGE MAJHADAR.
I hope he goes back to a school to learn some basics about the country but he wants to be Prime Minister of India God help India from the disaster in the making.

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