लेखक परिचय

डॉ.प्रेरणा चतुर्वेदी

डॉ.प्रेरणा चतुर्वेदी

लेखिका कहानीकार, कवयित्री, समाजसेवी तथा हिन्दी अध्यापन से जुड़ी हैं।

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rainआधी रात से शहर में झमाझम बारिश हो रही है। रह-रहकर बिजली जब तेज आवाज से कड़कती है, तो दिल बैठने लगता है। बादलों को चीरती हुई तेज गड़गडाहट के साथ, युद्ध में किसी महाबली सम्राट की चमकती, तेज, खून की प्यासी, तलवार की तरह बिजली चमक रही है।

सुबह के सवा आठ बज चुके हैं। मगर सूरज की रश्मि का आंचल अभी तक धरती पर नहीं पसरा है। शायद सूरज के सातों घोड़े बीमार पड़ चुके है, या वरूण देव से तकरार करने का सूर्यदेव का अभी मूड नहीं है। अवन्तिका ने खिड़की खोलकर बाहर की ओर देखा। तेज बारिश से आसपास के मकान, उनकी मुंडेरे, दीवार सब पानी से भीगे। चुपचाप शांत होकर खड़े हैं। मानों टीचर की डांट खाकर सहमें से क्लास के बाहर मुंह लटकाए बच्चे खड़े हों। रेडियो पर उद्घोषिका इस मौसम के बारे में अपडेट देती हुई श्रोताओं के पसंद का गाना पेश कर रही है, एक दो विज्ञापन के बाद ही ‘बरसो रे मेघा… मेघा बरसो रे…’का गाना शुरू हो गया।

अवन्तिका सोचने लगी कल रात से ही काले बादल छाए हुए थे, सो लग ही रहा था कि तेज बारिश होगी। मगर अब तक तो बारिश बंद हो जानी चाहिए थी।‘चलो अच्छा है कि आज छुट्टी है, वरना बरसात के मौसम मे आफिस जाने में बड़ी फजीहत होती। किचन मे जाकर उसने चाय बनायी। फिर एक कप ढक कर रख दी और दूसरा कप लेकर कमरे में आ गई। वह अक्सर अच्छे मौसम में ज्यादा चाय बना लेती है, ताकि फिर चाय पीने का मन करे, तो उसे बनाने की झंझट न हो।रेडियो में अभी भी गायिका मेघों को बरसाने का सुरीला आमंत्रण दे रही है। उसके इस आमंत्रण पर अवंतिका सोचने लगी।

‘हुँअ…अखबार नहीं आया, दूधवाला नहीं आया। सड़क पर चारों ओर पानी भर गया होगा। कीचड़, गंदगी और पानी-पानी और ये कह रही है बरसो रे मेघा…।’

अवन्तिका दूरसंचार विभाग में थी। पढ़ाई-लिखाई का एकमात्र उद्देश्य था नौकरी ‘नारी तभी प्रसन्न होती है जब वह आर्थिक रुप से स्वतंत्र होती है।’ ये वाक्य उसने अपने कॉलेज में प्रख्यात अर्थशास्त्री डा. सुधा देसाई से सुना था। शुरू से ही उसे अर्थशास्त्र विशेष प्रिय था। और डा. सुधा देसाई के किताबें उसके पाठ्यक्रम में थी। इसलिए जब कालेज के फंक्शन में उसने सुना कि डा. देसाई आज लड़कियों को संबोधित करेंगी, तो वह खुश हुई और पूरा भाषण सुना।

उसके बाद कॉलेज खत्म होने पर नौकरी करनी है, आर्थिक सुदृढ़ता, आर्थिक स्वतंत्रता जैसे नारीवादी फार्मुले पर चलते हुए उसने सब कुछ पा भी लिया। जिसके बाद वह स्वयं में गर्वानुभूति कर सकती थी, लेकिन इस गर्वानुभूति की प्राप्ति में वे सारी अनुभूतियां जो एक लड़की के मन में उठती है। वे ख्वाब, वे कल्पनाएं, जो एक मन को झंकृत करती है। वे सपने जो आंखें बद करने पर होठों को मुस्कान दे जाते हैं। वह सब पीछे छूट गया। मुझे भी किसी की जरूरत है। ये बात दूसरों को क्या अपनों को भी समझा ही नहीं पायी। वरना शायद…शायद जिंदगी कुछ और होती।

‘पेपर…’ कल्लू की तेज आवाज और सुबह का अखबार दोनों ही बारिश की बूंदों को चीरकर कमरे में घुस आए। अवंतिका ने पेपर उठाया। कल रात से शुरू हुई बारिश का फोटो समेत वर्णन था। ‘किसानों के चेहरे प्रसन्न, सीजन शुरू होने से कारोबारी खुश..जमकर होगी इस बार बरसात’ इस तरह की खबरों में बारिश से केवल खुशी, प्रसन्नता का ही स्वर गूंज रहा है।

नौ बज चुके थे, अवंतिका नें खिड़की खोली,बारिश की रफ्तार थोड़ी कम हो चकी थी। उसके घर के सामने की सड़क पर बरसाती लपेटे छग्गन बूआ अपनी फूलमाला की छोटी सी दुकान लगा चुकी थी। उनकी चेहरे की उदासी से साफ लग रहा था कि सुबह से उनकी कोई खास बोहनी नहीं हुई है। पारदर्शी पालीथीन में रखे हुए माला-फूल ग्राहकों की बाट जोह रहे थे। दूसरी तरफ कोयला मजदूर रघू, सिर पर कोयले का टोकरा रखे नंगे पांव कीचड़ में तेज चले जा रहा था,कि बारिश फिर तेजी पकड़े इससे पहले ही अपने गंतव्य स्थल तक कोयला पहुँच जाए।

सामने वाले घर के बाहर नल में टुल्लू लगाती राधा बार-बार माथे से गिरती बारिश की बूंदों को दुपट्टे के एक कोने से पोंछती हुई नल की टोंटी से टुल्लू की पाइप जोड़ रही है। थोड़ी देर में टुल्लू ऑन हो गया और पाइप के सहारे पानी दौड़ पड़ा मिसेज शांति वर्मा के घर में…।

सोलह-सत्रह साल की राधा… जो कि मिसेज वर्मा की नौकरानी है, उसने आसमान से गिरती बूंदों को उपेक्षा की नजरों से देखा। दरअसल, बरसात में उसे घर में तीन-चार बार पोंछा लगाना पड़ता है। क्योंकि बरसाती पानी से मिसेज वर्मा को एलर्जी है। उसका काम बरसात में बढ़ जाता है।

इसलिए राधा, फूलमाला वाली छग्गन बुआ, कोयला मजदूर रघू इनको बारिश भला कैसे अच्छी लग सकती है।

अवंतिका को याद आया कि कॉलेज के दिनों में जब आसमान में काली घटाएं छायी रहती, तो वह घर के बाहर निकलती भी नहीं थी। उसकी सहेली कावेरी अक्सर कहा करती कि तू कल कॉलेज क्यों नहीं आयी। कल खूब पानी बरसा और हमने खूब मस्ती की। गर्म पकौड़े, समौसे खाए और बारिश को इन्जाय किया।

अवन्तिका सहेलियों की बारिश से जुड़ी मनोरंजक बातें सुन भर लेती। बारिश और मौसम आता और बीत जाता उसने उसे कभी इन्जॉय किया ही नहीं….। फिर धीरे-धीरे खुशनुमा मौसम में खुश रहने और एन्जाय करने की उसकी उम्र ही बीत गई। उसने खिड़की से देखा कि बारिश की तेज बूंदे हवा को काटती हुई तड़ातड़ धरती पर चोट कर रही थीं। उसने टी.वी. आन किया। अखबार, टीवी, रेडियो हर जगह बारिश का आनंद लेते लोग दिखाए व सुनाए जा रहे थे। विविध भारती पर गाना बज रहा था ‘बरसात में हमसे मिले रे तू सजन…तुमसे मिले हम बरसात में…।’

किसी से मिलना-जुलना बरसात में कितना सुहाना लगता है। अवंतिका सोचने लगी कहां मिला कोई उसे,और कहां मिली वह किसी से…।’ शायद यह मिलना-मिलाना भी किस्मत से होता है और किस्मत भी बारिश को बूंदों की तरह किसी को बालकनी में बैठकर चाय पीने का आनंद देती है और किसी को उलझन…जैसे छग्गन बुआ, रघु और मिसेज वर्मा की नौकरानी राधा को यह बूंदे तलवार की तरह ही लग रही होंगी। फिर भी बारिश हो रही है और होनी भी चाहिए। वरना कैसे उपजेगा अन्न और खिलेंगे किसान। जबकि इसी बरसात में गिर जाती है उनकी कमजोर दीवारें, फूट जाते हैं खपरैल, और टूट जाती है अक्सर बिजली आधी रात के वक्त कड़ककर किसान और मजदूरों की छतों पर और उनकी किस्मत पर। फिर भी सब खुश हैं क्योंकि ठेलेवालों, खोमचेवालों और चायवालों की ज्यादा बिक्री होगी। इसलिए इन सबको बारिश पसंद है…। कार्यालय, दफ्तर, स्कूल सब जगह उपस्थिति कम रहेगी। सब घरों में दुबके, खिड़कियों से झांकते हुए चाय की चुस्की लेंगे। कौन कहेगा कि यह मौसम किसी को उदासी देगा। दो-चार दिन की बारिश के बाद ही नदी का पानी उफन जाएगा और बाढ़ का रोना नेता से लेकर मंत्री तक सब रोएंगे…जब तक राजकोष की राहत राशि उनका सूखा दूर नहीं कर देगी। सामने वाले घर की मिसेज वर्मा की नौकरानी राधा अपना काम खत्म कर चुकी थी। बारिश की गति भी अब तक कुछ कम हो चुकी थी। प्लाईवुड की तरह दुबली-पतली राधा के होठ कोई गीत गुनगुना रहे थे और कमरगीत के बोलों पर बलखाती नागिन सी लहरा रही थी। यानि अपना सारा काम खत्म करके वह भी इस मौसम का आनंद ले रही थी। सड़क के एक कोने में बैठी छग्गन बुआ भी अपनी बोहनी से बेफिक्र प्लास्टिक के गिलास में गर्म चाय का आनंद ले रही थी।

यानि जब काम की जिम्मेदारी का बोझ हटता है तब शुरू होता है आनंद। रेडियो पर अब भी गाना बज रहा है। उद्घोषिका कह रही है बारिश की बूंदे लाती है अपने साथ खुशियां, उत्साह और उमंग लेकिन उसको आनंद नहीं मिल रहा है, बारिश के मौसम में खुश होना चाहिए वह खुश नहीं है। क्यों वह खुश नहीं है।…यह उसे भी नहीं पता…या किसी को इसका कारण वह बताना नहीं चाहती।

उसे कहां दिया जिंदगी ने खुशी, आनंद और उत्साह वह कवि है नहीं कि कविता करें इस पर या कलाकार भी नहीं है। जो अपने चरित्रों के माध्यम से खुशी और आनंद दिखाए और ऐसा कोई नहीं है जिससे वह यह सब बांटे। वह सोच रही है, भले ही ऐसा कुछ हो या न हो, तब भी बारिश होनी चाहिए। क्योंकि इससे धरती को खुशी, आनंद और तृप्ति।

 

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