लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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तनवीर जाफ़री
देश की सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एक बार फिर राजनीति के चेहरे को कलंकित होने से उस समय बचा लिया जबकि आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में निचली अदालत से चार वर्ष की सज़ा पाने वाली एआईडीएमके महासचिव शशिकला नटराजन को तमिलनाडु की मुख्यमंत्री पद की शपथ लिए जाने से पूर्व ही इस सज़ा को बरकरार रखने का आदेश देते हुए तत्काल समर्पण किए जाने का निर्देश दिया। शशिकला का जयललिता की मृत्यु के पश्चात अचानक एक बड़े नेता के रूप में अवतरित होना तथा सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के पद के लिए अपना दावा ठोंकना और हद तो यह है कि संगठन व पार्टी विधायकों की ओर से शशिकला को भारी समर्थन प्राप्त होना यह सबकुछ एक हाईप्रोफाईल ड्रामा सा प्रतीत हो रहा था। बड़े आश्चर्य की बात है कि शशिकला का अपना न तो कोई राजनैतिक रिकॉर्ड रहा है न ही संगठन के प्रति उनकी कोई क़ुर्बानी। उनकी विशेषता महज़ इतनी थी कि वे अपने राज्य सरकार में सेवारत पति के माध्यम से जयललिता के संपर्क में आईं तथा उनसे व्यक्तिगत् संबंध साधकर धन संग्रह करने के इकलौते लक्ष्य को पूरा करने में जुटी रहीं। यहां तक कि जयललिता, शशिकला तथा उनके कई करीबी लोग आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी पाए गए। तथा जयललिता को भी इस संबंध में जेल जाना पड़ा।
बड़े आश्चर्य का विषय है कि एआईडीएमके के जो नेता व विधायक शशिकला के समर्थन में खड़े थे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा शशिकला को जेल भेजे जाने के आदेश के बावजूद शशिकला का महिमामंडन अथवा सीधे शब्दों में यदि कहें तो उनकी चाटुकारिता करना नहीं छोड़ा। यहां तक कि जब शशिकला बैंगलूरू जेल जाने से पूर्व जयललिता की समाधि पर गईं तथा समाधि को तीन बार पीटकर शपथ लेने जैसा कोई भावुक कर देने वाला ड्रामा रचा उस समय भी पार्टी के विधायक व नेतागण शशिकला जिंदाबाद व हमारी नेता शशिकला जैसे नारे चिल्ला-चिल्ला कर लगा रहे थे। गौरतलब है कि शशिकला को जेल भेजने वाले न्यायधीश ने उन्हें जेल में रहने के दौरान किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा अथवा रियायत देने से इंकार कर दिया है। इसके बावजूद शशिकला ने जेल में अपने लिए एक अतिरिक्त डॉक्टर की मांग यह कहकर की कि उन्हें डायबिटिज का रोग है। शशिकला ने जेल में प्रथम श्रेणी की सेल में रखे जाने की मांग भी की। उन्होंने चेन्नई से अपने लिए एक वाहन भरकर कपड़े व साड़ियां आदि मंगाई। अपनी भांजी इलावरसी को उन्होंने अपने साथ जेल में अपने ही सेल में रखे जाने का भी निवेदन किया। परंतु माननीय न्यायधीश ने उनकी सभी ऐशपरस्ती व सुख-सुविधाओं संबंधी मांगों को अस्वीकार करते हुए तीन जोड़ी साड़ी जो महिला कैदियों को दी जाती है, उन्हें भी आबंटित करने का निर्देश दिया। चेन्नई से लेकर बैंगलूरू तक शशिकला के समर्थकों का लंबा काफिला उन्हें जेल तक छोडने के लिए गया।
अपराधी पृष्ठभूमि के अथवा भ्रष्टाचार में संलिप्त नेताओं का जेल जाना हमारे देश में कोई नई बात नहीं है। परंतु जिस प्रकार यह अपराधी नेता जेल जाते वक्त अदालत से लेकर जेल के मुख्य द्वार तक अपने समर्थन में हुड़दंगाई का प्रदर्शन करते हैं तथा जिस प्रकार जेल में स्वयं को दूसरे अपराधी कैदियों से अलग दिखाई देने की कोशिश करते हैं व जेल में रहते हुए भी घर जैसी सुविधाएं हासिल करने का प्रयास करते हैं यह बातें न केवल कानून व जेल प्रशासन का मजाक उड़ाती हैं बल्कि उन्हें दी जाने वाली इस प्रकार की विशेष सुविधाएं दूसरे कैदियों के साथ नाइंसाफी भी प्रतीत होती हैं। कभी-कभी तो ऐसे अपराधी लोगों की जेल यात्रा ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती है गोया नेता जी किसी अपराध अथवा घोटाले में नहीं बल्कि देशहित के लिए किए गए किसी बड़े काम की सजा्य काटने हेतु या स्वतंत्रता संग्राम के किसी महान सेनानी के रूप में जेल जा रहे हों। जेल यात्रा का ऐसा ही एक हाईप्रोफाईल ड्रामा 2001 में उस समय रचा गया था जबकि लालू यादव को करोड़ों रुपये के चारा घोटाले के आरोप में पटना से रांची जेल ले जाया गया था। 1997 से लेकर 2001 तक लालू यादव को इसी मामले में पांच बार जेल यात्राएं करनी पड़ी थीं। परंतु जिस समय 25 नवंबर 2001 को उन्हें पटना से रांची के 350 किलोमीटर लंबे सड़क मार्ग से रांची जेल लाया गया वह दृश्य संभवतः आज तक किसी अपराधी नेता की जेल यात्रा के दौरान देखा नहीं गया होगा।
बिहार के चालीस मंत्रियों, सैकड़ों विधायकों व विधान पार्षदों, आरजेडी के सांसदों के अतिरिक्त लाखों समर्थकों के साथ हज़ारों कारों का क़ाफ़िला पटना से रांची के लिए लालू यादव को जेल तक पहुंचाने के लिए कुछ इस अंदाज में रवाना हुआ गोया वे जेल किसी अपराध में नहीं बल्कि देशहित के लिए कोई बड़ा किला फतह करने जा रहे हों। रास्ते में लालू यादव अपने सद्भावना रथ नामक विशेष वाहन से बाहर प्रकट होकर जनता को अपना दर्शन देते तथा अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, गृहमंत्री लाल कृष्ण अडवाणी तथा तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस पर अपने जेल भेजे जाने का आरोप मढ़ते चलते। उस समय लालू यादव के लाखों समर्थक सड़कों पर यह नारे लगाते सुने गए-लालू यादव मत घबराना, तेरे पीछे सारा जमाना्। इसी प्रकार जब सोहराबुद्दीन फर्जी एनकांऊटर मामले, कत्ल तथा फिरौती आदि जैसे जघन्य अपराधिक मामलों में वर्तमान भाजपा अध्यक्ष अमितशाह को जेल भेजा गया था तथा तीन महीने बाद जमानत पर वे जेल से रिहा हुए थे उन दोनों अवसरों पर अमितशाह पर उनके समर्थकों द्वारा फूलों की ऐसी वर्षा की जा रही थी तथा उनके समर्थन में ऐसे नारे लगते देखे जा रहे थे गोया देश में कोई नई क्रांति छिड़ गई हो। निःसंदेह इस प्रकार की छिछोरी व घटिया दर्जे की हरकतें ऐसे अपराधी नेताओं तथा उनके समर्थकों को क्यों न रास आती हों परंतु दरहकीकत में यह घटनाएं देश को तथा देश की राजनीति व उज्जलव छवि के राजनेताओं को भी बदनाम तथा संदिग्ध करती हैं। ऐसी घटनाओं से देश व दुनिया में यही संदेश जाता है कि यहां के मतदाता व नागरिक ऐसे ही भ्रष्ट व अपराधी नेताओं को अपने सिर पर बिठाते हैं। या फिर इससे दूसरा संदेश यह जाता है कि ऐसे अपराधी पृष्ठभूमि रखने वाले भ्रष्ट नेताओं के भय से घबराकर आम लोग मजबूरीवश इस प्रकार के नेताओं के समर्थन में खड़े हो जाते हैं। जयललिता, लालू यादव, शशिकला व अमितशाह के अतिरिक्त भी बीएस येदूरप्पा, ओमप्रकाश चौटाला, कनी मौजी, सुरेश कलमाडी, पप्पु यादव, ए राजा, रशीद मसूद, अमरसिंह, सुखराम, वाईएस जगमोहन रेड्डी, मधु कौड़ा, माया कोडनानी, सुशांता घोष, बीबी जागीर कौर, मोहमद शहाबुद्दीन व बंगारू लक्ष्मण, अकबरूद्दीन ओवैसी, महिपाल मदेरना, जैसे विभिन्न पार्टियों के विभिन्न भ्रष्ट व अपराधी नेताओं की एक लंबी सूची है जो किसी न किसी अपराध में जेल जा चुके हैं। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि इन नेताओं के समर्थकों में न तो कभी उत्साह की कोई कमी देखी गई न ही जेल में रहने के दौरान इनके रुतबों में कोई फर्क पड़ता दिखाई दिया। ऐसे में एक ज्वलंत प्रश्र यह है कि क्या सत्ता की कुर्सी से लेकर जेल की सलाखों के पीछे तक भी इन्हीं भ्रष्ट व अपराधी नेताओं का बोलबाला रहता है? क्या हर जगह इनकी मनमानी यूं ही चला करती है? और दूसरी बात यह कि अपराध साबित हो जाने के बावजूद देश की जनता ऐसे नेताओं से अपना मोह भंग क्यों नहीं कर पाती? भारतीय राजनीति के लिए इस प्रवृति को किस प्रकार का लक्षण समझा जाना चाहिए?

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