लेखक परिचय

राजीव दुबे

राजीव दुबे

कार्यक्षेत्र: उच्च तकनीकी क्षेत्रों में विशेषज्ञ| विशेष रुचि: भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन, इतिहास एवं मनोविज्ञान का अध्ययन , राजनैतिक विचारधाराओं का विश्लेषण एवं संबद्ध विषयों पर लेखन Twitter: @rajeev_dubey

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प्रश्नों के दायरे बढ़ रहे हैं,

और आवाजें फुसफुसाहटों से कोहराम में बदल रही हैं।

‘कलावती’ का नाम लेकर संसद में तालियाँ तो बज़ गईं,

और ‘कलावती’ को कुछ रुपये भी मिल गये होंगे – सहायता के नाम पर।

अब उसी ‘कलावती’ और उस जैसों के हजारों करोड़ लुट गए दिल्ली की निगरानी में – खेल-खेल में,

और आप चुप हैं राहुल जी।

इसे आपकी नियत का खोट कहें हम, या अयोग्यता का नाम दें,

पर हमें यह न कहिएगा कि यह केवल अफसरों की करामात थी, या कि आप अंजान हैं।

दूरसंचार के घोटालों में भी,

हम बेचारे नागरिक देखते रहे दूर – दूर से ….।

और लुटते रहे हमारे हक के पैसे आपकी सरकार के मंत्रियों की निगरानी में,

अब बैठ जाएगी कोई जाँच और हम करेंगे एक अंतहीन इंतजार।

अब न कहिएगा हमसे कि,

यह तो मनमोहन जी जानें।

सोनिया जी की कितनी ज्यादा चलती है,

यह हम सब – ‘कलावती’ और ‘नत्थू लाल’ – अच्छी तरह से पहचानें।

प्रश्नों के दायरे बढ़ रहे हैं,

और आवाजें कोहराम से नारों में बदल रही हैं।

कारगिल के नाम पर बनी इमारत की नींव के नीचे,

दफन कर दी आपकी सरकार ने सारी नैतिकता सरकार चलाने की, और आप चुप हैं !

महँगाई की मार झेल-झेल कर सुन्न पड़ गई जनता की जीभ,

और आप हैं, कि चले आते हैं तसला लेकर मिट्टी उठाने – बनाने को हमारा मजाक।

अच्छा लगता हमें अगर सस्ती होती दाल,

और मिल जाता दो वक्त थोड़ा प्याज मेहनत का – अपना तसला तो हम खुद भी उठा लेते।

प्रश्नों के दायरे बढ़ रहे हैं,

और आवाजें नारों से आंदोलनों में बदल रही हैं …।

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5 Comments on "राजीव दुबे की कविता : प्रश्नों के बढ़ते दायरे"

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shishir chandra
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वह राजीव जी . अत्यंत सुन्दर

MUKUL
Guest

बधाई राजीव
अत्यंत सुंदर व गहरी सच्चाई से ओत-प्रोत व ह्रदय से निकली अभिव्यक्ति के लिए. काश राहुल व उनके पार्टी जन इस को पढ़ते…पर उनको भ्रष्टाचार की व्यस्तता से फुर्सत कहाँ क़ि देशवासियों की आवाज सुन सकें.

डॉ. मधुसूदन
Guest

बधाई राजीव जी।
बहुत सुंदर-और सच्चाई से जुडा, भाव प्रवाह एवं अभिव्यक्ति।
इनके प्रबंधन गुरू जानते हैं, “जनता-प्रतीति” पर मतदान करती है। और दूरदर्शन पर देखा हुआ” आंखो देखा हाल, स्मृति में गडा रहता है। जनता को उल्लु बनाकर इनका काम बन जाता है।
पर आप, ऐसे ही घाव लगाते रहिए।
अंत सही परिणामकारक बन पाया है।
——
“अच्छा लगता हमें अगर सस्ती होती दाल,
और मिल जाता दो वक्त थोड़ा प्याज मेहनत का – अपना तसला तो हम खुद भी उठा लेते।”
कलावती सस्ते में निपट जाती है; पर मायावती महंगी पडती है, और खेल ग्राम?
भय लगता है।
और —
बेचारा सामान्य जन।
शुभेच्छाएं। लगे रहिए।

Anil Sehgal
Guest

“राजीव दुबे की कविता : प्रश्नों के बढ़ते दायरे”

सोनिया जी और राहुल जी ने चुप रहना तो पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हन राव जी से सीखा है.

और आप चुप क्यों नहीं हैं ? व्यंग की कविता का प्रसारण करवा रहें हैं जब अमरीकी प्रधान आने वाले हैं. थोडा serious रहें.

– अनिल सहगल –

पंकज झा
Guest

वाह वाह …बहुत अच्छी कविता….बधाई राजीव जी…ऐसा लग रहा है प्रवक्ता का कारवाँ लगातार बढ़ता जा रहा है जानिब-ए-मंजिल की तरफ…………!

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