लेखक परिचय

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं । उनकी अनेक हिन्दी कविताएँ विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी एक और पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।

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rajnathधारा-370 भारत और भारत के संविधान का एक ऐसा संवेदनशील विषय हो गया है, कि जब कभी भी भारत से कोई नेता पाकिस्तान जाता है तो, तब इसकी संवेदनाओं में तरंगता फैल जाती है । इन दिनों भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी सार्क सम्मेलन में भाग लेने पाकिस्तान क्या गए हुए हैं, धारा 370 का विषय फिर सुगबुगाने लगा है। वैसे भी धारा-370 का आविर्भाव ही संवेदनाओं की गहरी पराकाष्ठाओं के स्पर्शों, आलिंगनों और मिलनों के प्रतिफलस्वरुप ही हुआ था। तब क्यों न उसका प्रत्येक रोम लाजवंती की पत्तियों के मानिंद क्षणिक स्पर्श मात्र से सहम जाता सा प्रतीत होने लगता है। भारतीय संविधान की अन्य धाराओं से हटकर कुछ विशिष्ट यह धारा-370 देश के विशिष्ट राज्य जम्मू और कश्मीर की पूरक पहलू बन गई है। जहाँ कहीं देश में कश्मीर का ज़िक्र होता है, तो धारा-370 का ज़िक्र खुद-ब-खुद होने लगता है । धारा-370 को भारत का आम नागरिक किसी परिचित से और पहचाने हुए से शब्द की भाँति समझता है, परन्तु जानता कितना है, यह उसे भी नहीं मालूम है। सिवाय इसके कि धारा-370 की एतिहासिक प्रासंगिकता अधिक मायने रखती है, तो ज़रुर ही उसमें कुछ दम होगा। ए. जी. नूरानी, अरविंद लवकारे, मोहन कृष्ण तेंग जैसे लेखकों की पुस्तकों के गहन अध्ययन इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि धारा-370 को कश्मीर में लगाने का तत्कालीन उद्देश्य येनकेनप्रकारेण जम्मू-कश्मीर रियासत को 1947 के सद्यस्वतंत्र भारत संघ में विलीन करना था।

यह तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता का शाश्वत गुण रहा है कि सभी मिलजुलकर रहो, थोड़ी बहुत असुविधा के साथ यदि किसी को विशेष सम्मान देते हुए परिवार की एकता अक्षुण्ण बनी रहती है, तो यह त्याग करना बुरा नहीं है । एकता, त्याग, भाईचारा ये शब्दकोष के वे शब्द हैं जो संभवतः भारतीय संस्कृति से ही उद्भवित होकर उसी में समाहित भी हो गए हैं। मृदु रॉय और हिमांशु सेतिया के कश्मीरी ऐतिहासिक विश्लेषणों के साथ साथ और भी हमारी इतिहास पुस्तकों से प्रमाणित होता है कि भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होने के बाद 15 अगस्त 1947 से 30 जून 1948 तक लार्ड माउण्टबेटन ही भारत के पहले गवर्नर जनरल बना दिए गए थे । किसी भारतीय प्रारुपिक पारिवारिक झगड़े की तर्ज पर ही पाकिस्तान भी अपने समस्त राष्ट्रीय, राज्यीय व पारिवारिक और संवेदनशील मातृमृदीय रिश्तों को भुलाकर अपने हिस्से की तथाकथित सम्पत्ति को लेकर अलग हुए भाई की मानिंद भारत से अलग हो गया था। उस समय के अपने वे बैर भाव आज तक भी वह भारत को समय समय पर दिखाता रहता है और एक प्रारुपिक असंतुष्ट भाई की तरह कश्मीर को भी अपने कब्जे में लेने की माँग दुहराता रहता है।

परन्तु यह भी एक उतना ही शाश्वत व कड़वा सत्य है कि पुश्तैनी विरासतें लाख कोशिशों के बावज़ूद भी अपने मूल स्थान पर ही रहती हैं। अतः पाकिस्तान कितना भी प्रयास कर ले, भारत की पुश्तैनी विरासत कश्मीर को उससे कोई भी अलग नहीं कर सकता। 1947 में दोनों परिवाररुपी देशों के लोग अपने अपने रिश्तों की संवेदनाओं के तारों के टूटने की असह्य पीड़ाओं को सहन कर रहे थे। आँखों से आँसू बह रहे थे, परन्तु सड़कों पर रक्त बह रहा था । कितनी कराहों से भरा वह हृदयविदारक दृश्य रहा होगा, जिसकी कल्पनामात्र से कलम सिहरने लगती है । सब कुछ सिर्फ सुना और पढ़ा ही है, तब हमारे हृदय द्रवित हो जाते हैं, तो साक्षात् पीड़ा की तो कोई पराकाष्ठा ही नहीं रह जाती । ऐसी विषम और विकट परिस्थितियों के दौर में हमारे देश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटैल ने देश एकीकरण हेतु विभिन्न देशी रियासतों को एकसूत्र में बाँधने का जो विशिष्ट और अतिसराहनीय कार्य किया, उसके लिए भारत देश सदैव उनका ऋणी बन गया है । परन्तु कश्मीर रियासत के एकीकरण के काम से सरदार पटैल को दूर रखकर भारत ने भूल की या यह उस समय की माँग थी, यह विषय उस समय से ही विवादास्पद रहा है। हर विवादास्पद विषय के दो पक्ष सदैव होते आए हैं। इसके भी अपने तर्क-वितर्क रहे हैं। परन्तु तात्कालिक परिस्थितियों के विश्लेषणों से कश्मीर रियासत पर तब भी राजनीतिक लाभ लेने की सड़ांध आती है। प्रश्न यह उठता है कि, क्या पटैल यदि पूरे भारत को एकसूत्र में पिरोने की शक्ति रखने की सामर्थ्य से परिपूर्ण थे, तब कश्मीर रियासत का भारत में विलय करवाना उनके लिए असाध्य कार्य नहीं हो सकता था। धारा-370 के लिए अध्ययन किए गए विभिन्न दस्तावेजों, तथ्यों और पुस्तकों के अध्ययन इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि कश्मीर के प्रति पंडित नेहरु की व्यक्तिगत संवेदनाओं ने उनकी राष्ट्रगत संवेदनाओं को दबाने की सफल चेष्टा कर दी थी। 1947 का सद्यस्नात् भारत जिन परिस्थितियों से गुजर रहा था, वहाँ कोई भी गम्भीर राजनीतिज्ञ आपसी वैमनस्यता जैसे विवादों को सम्भवतः तूल नहीं देना चाहते रहे होंगे ।

शायद यही कारण रहा होगा कि सरदार पटैल ने कश्मीर मुद्दे पर डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तरह सख्त रवैया नहीं अपनाया होगा कि अन्य रियासतों की तरह कश्मीर का मसला भी वे ही सुलझाएँगे। अम्बेडकरजी ने भारत का संविधान रचा, लेकिन संविधान के अनुच्छेद-370 की रचना के लिए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इंकार कर दिया था । इतिहास कहता है कि तब पंडित नेहरु को इसके लिए अयंगरजी का सहारा लेना पड़ा था । उर्मिलेश, कुलदीप चंद अग्निहोत्री, कृष्ण नंद शुक्ला जैसे लेखकों ने कश्मीर की अनकही कहानियों को शब्द और वाणी देते हुए धारा-370 के जन्म की हृदयस्पर्शी पीड़ाओं से जैसे मुझे अनुभूत करवा दिया। इस तरह धारा-370 अपने जन्म से लेकर आज तक, किसी अभिशप्त अहिल्या की भाँति किसी मर्यादा पुरुषोत्तम के आने की राह जोट रही है, ताकि स्वयं मुक्त होकर कश्मीर को सही मायनों में भारत का अभिन्न अंग कहलाने का पुख्ता सबूत विश्व बिरादरी में प्रस्तुत हो सके। फिर कोई भी पाकिस्तानी आतंकवादी इस्लामाबाद की सड़कों पर खुलेआम चीखचीखकर व्यर्थ ही कश्मीर को अपना कहने और भारत के अंदरुनी मामलों में दखलंदाजी करने की हिमाकत भी न कर सके। किसी भी जन्मजात विवाद की समाप्ति अतिदुष्कर और लघुसम्भाव्यता की कसौटी पर रखी होती है, लेकिन सत्य की विजय तो निश्चित है। यद्यपि इस दौरान बाधाओं, विडम्बनाओं और अवरोधों का आना भी उतना ही सुनिश्चित है, क्योंकि जितना गहरा वैमनस्य होता है, असत्यताओं की परतें भी उतनी ही सघन होती हैं। धारा-370 को लेकर वैमनस्य होना स्वाभाविक था और है। देखा जाए तो सर्वप्रथम ‘भारतीय जन संघ’ के संस्थापक श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के विरुद्ध संघर्ष का बीड़ा उठाया था, जो आज तक उनकी अनुपस्थिति में भी उनके बलिदान को अनवरत स्मरण करते हुए तब तक जारी रहेगा, जब तक उनकी राष्ट्र को दी गई प्राणाहुति सार्थक रुप नहीं ले लेती।

भारत में कश्मीर को जो जानते हैं, उनको दो श्रेणियों में रखा जा सकता है, प्रथम श्रेणी में वे लोग आते हैं जो कश्मीर को वास्तव में भारत का अभिन्न अंग मानते हैं एवम् उसके भारत में पूर्ण विलय की हृदय से पैरवी भी करते हैं। दूसरी श्रेणी में वे लोग शामिल हैं, जो अपने व्यक्तिगत व राजनीतिक लाभों के लिए कश्मीर को यथास्थिति में ही बने रहने देने का कड़ा समर्थन करते हैं। शुरु से ही अनुच्छेद-370 को लेकर सूचनाओं का विकृतिकरण हुआ है। प्रारम्भ से श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस संवैधानिक प्रावधान के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे। उन्होंने तब इस क़ानून के खिलाफ भूख हड़ताल भी की थी। नेहरू के मंत्रीमण्डल से इस्तीफा देने के बाद श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रजा परिषद् नाम से संगठन बनाया और धारा-370 के विरुद्ध आंदोलन भी चलाया। यह आंदोलन सन् 1952 में अपने चरम पर था। डॉ मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने एक सशक्त नारा भी दिया था कि “एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें”। जम्मू की एक विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा”। श्री मुखर्जी वर्ष 1953 में भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर गए थे।

वहां तब ये क़ानून लागू था कि भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर में नहीं बस सकते और वहां उन्हें अपने साथ पहचान पत्र रखना ज़रूरी था और उन दिनों कश्मीर में प्रवेश करने के लिए अन्य राज्यों के लोगों को एक प्रकार से पासपोर्ट टाइप का परमिट लेना पडता था और डॉ मुखर्जी बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर चले गए थे। अतः मुखर्जी जम्मू कश्मीर जाकर अपनी लड़ाई जारी रखना चाहते थे, परन्तु उनको कश्मीर में घुसने नहीं दिया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 11 मई 1953 को कश्मीर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लखनपुर क्षेत्र से गिरफ्तार कर एक बंगले में रखा गया। 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान ही उनकी रहस्यमयी मृत्यु हो गई । इसके बाद से ही कश्मीर में पहचान पत्र और परमिट के प्रावधान को रद्द कर दिया गया था। इस तरह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन को सख्ती से दबाने और उनके बलिदान के बाद जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण व्यवस्था कायम रखने व लोकतंत्र के अधिकार सुरक्षित करने के लिए निःसंदेह हल खोजे जा सकते थे, परन्तु ऐसा नहीं हो सका। डॉ मुखर्जी भारत की अखण्डता की रक्षा के लिए शहीद हो गए और भारत ने एक ऐसे देशभक्त को हमेशा के लिए खो दिया, जो राजनीति को एक नई दिशा दे सकता था। डॉ. मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं, इसलिए धर्म के आधार पर किसी भी तरह के विभाजन के वे सख्त विरोधी थे। उनका मानना था कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं, हममें कोई अंतर नहीं है, हमारी भाषा एक है, हमारी संस्कृति एक है और यही हमारी विरासत है।

अगर कश्मीर के बारे में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नीतियों का अनुगमन किया होता तो आज कश्मीर वास्तविक अर्थों में भारत का अभिन्न अंग बनकर शान्ति एवं खुशहाली के रास्ते पर चल रहा होता। लेकिन उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दलों के तात्कालिक नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित व प्रसारित किया। ठीक उसी तरह आज भी लगभग यही होता दिख रहा है कि समस्या का उचित हल न खोजते हुए उसे राजनैतिक रूप दिया जा रहा है। सार रुप में देखा जाए तो धारा-370 कश्मीर के लिए बेड़ियों के अलावा और कुछ नहीं रह गई है। वहाँ की निरीह जनता आज भी धारा-370 की ऐतिहासिक प्रासंगिकता की सेंक से तपी जा रही है। भारत की अखण्डता को दृष्टिगत रखते हुए विचार करें तो यह तथ्य एकदम सटीक लगता है कि देश में एक समान नागरिक संहिता होना चाहिए और समान नागरिक संहिता लागू करने का सीधा-सीधा आशय यह है कि जम्मू कश्मीर से धारा-370 को हटाना। धारा-370 को कश्मीर से आसानी से हटा पाना निश्चितरुप से कोई सहज काम नहीं है। नीतिनिर्माताओं ने धारा-370 को इतनी पेंचीदगी के साथ बनाया है कि केंद्र सरकार को उसका तोड़ निकालना दुसाध्य हो सकता है। कड़वा सच तो यह है कि कश्मीर की राज्य सरकार कभी भी नहीं चाहती आई है कि धारा-370 को हटाया जाए और केंद्र सरकार अथवा भारत की न्यायपालिका इस दिशा में कुछ भी अकेले कर पाने की सामर्थ्य नहीं रखती। धारा-370 से मुक्त कश्मीर के निर्माण के लिए दोनों केंद्र व राज्य सरकारों के मध्य सहमति बनना प्रथम आवश्यक है।

भारत और भारत की जनता भावनात्मक रुप से निश्चिततौर पर यदि धारा-370 मुक्त कश्मीर को चाहती है, तो कोई न कोई समाधान तो निकल ही आएगा। बहसें बहुत हो चुकीं, यह कोई मनोरंजन का विषय नहीं है, यह भारत की अखण्डता की अस्मिता का विषय है, जो अनवरत मात्र बहसों के चलते विश्व परिवेश में हास्यास्पदता की ओर न चला जाए। अतः सबसे पहला संकल्प तो अब हमारा यह होना चाहिए कि अब इस मुद्दे पर बहस पूरी तरह बंद हो कि धारा-370 हटाई जाए कि नहीं। बल्कि अब यह सुनिश्चित है कि इसे हटाना है, वो भी शीघ्रातिशीघ्र हटाना है। धारा-370 की पाबंदियों के चलते कश्मीरी महिलाओं तथा अल्पसँख्यकों की सामाजिक स्थिति को सर्वाधिक क्षति हुई है। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा जम्मू कश्मीर राज्य का विकास भी बाधित हुआ है। वहाँ निवेश शून्य होने जैसी स्थिति के चलते रोजगार के अवसर भी शून्य जैसे ही हैं, इसीलिए अधिकाँश लोग रोजी-रोटी के लिए परम्परागत कार्यों पर ही निर्भर हैं। संवैधानिक दृष्टि से विश्लेषण करें तो आम भारतीय नागरिक की तुलना में प्रत्येक कश्मीरी के मूल अधिकार बहुत ही सीमित हैं। संवैधानिक प्रतिसीमितताओं से विश्वस्तर पर भारत की संप्रभुता भी कश्मीर की असुरक्षित छवि के कारण प्रभावित होती है। इतिहास साक्षी है कि भारत को कितनी ही बार इसका मूल्य चुकाना पड़ा है और आज तक हर रोज हम मूल्य चुकाते भी जा रहे हैं। कश्मीर की वर्तमान संवेदनशील होती जा रहीं परिस्थितियों के गहन विश्लेषणों से एक बात तो स्पष्टरुप से उभरकर आ रही है कि आम भारतीय का सपना धारा-370 मुक्त कश्मीर ही इन हालातों से भारत को निपटने के लिए अत्यावश्यक है। केंद्र व राज्य सरकारों के मध्य सामन्जस्य की महती आवश्यकता है।

इस समय यह बात मायने नहीं रखनी चाहिए कि सरकारें किन दलों की हैं, जबकि कश्मीर की अस्मिता की रक्षा करना ही सम्मिलितरुप से उनका उद्देश्य होना चाहिए है। इस संकल्प के साथ कि कश्मीर की भारत के साथ अविभाज्यता को विश्वबिरादरी के समक्ष सिद्ध करने के लिए भारतीय सेना की सैन्य शक्तियों के साथ कश्मीरियों सहित प्रत्येक भारतीय की राष्ट्रीय एकता से सराबोर भावनाएँ भी सशक्त होकर धारा-370 मुक्त कश्मीर के निर्माण में अपनी पूरी भागीदारी निभाएँगीं। धारा-370 मुक्त कश्मीर के साथ ही हम पाकिस्तान की इस विषय के अन्तर्राष्ट्रीयकरण करने की साजिश को धूलधूसरित कर सकते हैं। पाकिस्तान के झूठे आरोपों, असत्य बयानों और कश्मीर को इस्लामियत के नाम पर भारत से जबरन छीन लेने के कुत्सित प्रयासों को असफल बनाना होगा। कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान ने सदैव ही स्वयं को सहानुभूति का पात्र साबित करना चाहा है, पर प्रायः ही उसे मुँह की खानी पड़ी है। लेकिन हमारे लिए भी कहीं एक चुभता सत्य है कि कश्मीर को हम पूरी तरह अपना कह पाने में एक झिझक सी महसूस करते हैं।

निःसंदेह इस झिझक की मूल में धारा-370 की संवैधानिक मजबूरियाँ हैं, जिनसे भारत भी बँधा है और चाहकर भी अकेले केंद्र सरकार या न्यायपालिका के बल पर कुछ कर नहीं पा रहा है। अतः आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हर भारतीय के सपनों के एक ऐसे धारा-370 मुक्त कश्मीर का सृजन किया जाए जिसे अपना सा कह पाने, अपना सा अनुभूत कर पाने की प्रत्येक राष्ट्रभक्त भारतीय की एक सुदीर्घ अभिलाषा साकार रुप ले सके। अपने यथार्थ के धरातल से प्रयाण करता हुआ कश्मीर सही मायनों में भारत का अविभाज्य और अभिन्न अंग कहलाने की अपनी स्वपनिल आकाँक्षा की पूर्ति हेतु अग्रसर हो चुका है। उसे हमारे सम्बल की बहुत ज़रुरत है, आइए, आगे बढ़कर धारा-370 मुक्त कश्मीर के सृजन के पावन यज्ञ में हम अपनी अधिकाधिक भागीदारी साबित कर पाने में सफल हो सकें। यदि संवेदनाएँ प्रबल होंगी, तो संविधान के द्वार स्वतः ही खुल जाएँगे। तब धारा-370 मुक्त कश्मीर के विश्व अवतरण को कोई असुरी शक्ति नहीं रोक पाएगी। अभी निःसंदेह यह सब कुछ कितना सुखद स्वप्न सा लग रहा है, परन्तु सपने सँजोएँगे तब तो उसे साकार कर पाएँगे।

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