लेखक परिचय

डॉ. सौरभ मालवीय

डॉ. सौरभ मालवीय

उत्तरप्रदेश के देवरिया जनपद के पटनेजी गाँव में जन्मे डाॅ.सौरभ मालवीय बचपन से ही सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण की तीव्र आकांक्षा के चलते सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए है। जगतगुरु शंकराचार्य एवं डाॅ. हेडगेवार की सांस्कृतिक चेतना और आचार्य चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि से प्रभावित डाॅ. मालवीय का सुस्पष्ट वैचारिक धरातल है। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया’ विषय पर आपने शोध किया है। आप का देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक मुद्दों पर निरंतर लेखन जारी है। उत्कृष्ट कार्याें के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है, जिनमें मोतीबीए नया मीडिया सम्मान, विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान और प्रवक्ता डाॅट काॅम सम्मान आदि सम्मिलित हैं। संप्रति- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। मोबाइल-09907890614 ई-मेल- malviya.sourabh@gmail.com वेबसाइट-www.sourabhmalviya.com

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डा. सौरभ मालवीय

रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि पर्व है ।अनेकानेक श्रेष्ठतम आदर्शों उच्चतम प्रेरणाओ,महान प्रतिमानों और वैदिक वांग्मय से लेकर अद्यतन संस्कृति तक फैले हुए भारतीयता के समग्र जीवन का प्राण है|यह पर्व श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आयोजित किया जाता जाता है, जब चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र में विचरण करते हों तो यह पर्व आता है। इस श्रवण नक्षत्र का नाम ही मातृ–पितृ भक्ति के श्रेष्टतम बिन्दु श्रवण कुमार के नाम पर पड़ा है|यह नाम ही बताता है कि हमारे आदर्श कैसे होने चाहिए। इस नाम की गरिमा इतनी आदरणीय है कि अनेक कुलीन परिवारों में श्रावणी कर्म किया जाता है।

इसी दिन भारत की सांस्कृतिक नगरी काशी में भगवान विष्णु का हयग्रीव अवतार हुआ था,आज के ही शुभ दिन पर हमारे ऋषियों ने परम-पावन सिन्धु नदी में प्रातःकाल स्नान करके सामवेद को देखा था, इसी सामवेद में परम प्रतापी राजराजेश्वर नरेश्वर श्री लंकेश्वर महाराजा रावण ने स्वर दिया था श्री रावण उत्तम कुल उत्पन्न ऋषि पुलत्स के वंशज थे। सामवेद की स्वर परम्परा आज भी महाराजा लंकेश्वर का अनुसरण करती है|आज ही के दिन भगवान महादेव ने श्री अमरनाथ में परमसती त्रिपुर सुंदरी भगवती को पहली बार राम कथा सुनाई थी इसी के फल स्वरुप रामकथा इस धरती पर उतारी थी,इतना ही नही आज ही के दिन भगवान चंद्रमौलिस्वर विश्वेश्वर महादेव ने देवताओं की अत्मा हिमालय में भगवती जगदम्बा पार्वती को श्रीकृष्ण कथा का भी उपहार दिया था तभी से श्रीमदभगवत कथा की भाव भूमि बनी|

rakshabandhanपुराणों में रक्षाबंधन के सन्दर्भ में कथा ऐसी है कि राजा बली की परीक्षा के लिए स्वयं भगवान वामन अवतार राजा बली के यहाँ गए राजा बली अपनी श्रेष्टतम दान कार्य के कारण प्रसिद्ध थे भगवान वामन ने राजा बली से अपने लिए साढ़े तीन पग भूमि की याचना की महाराज बली सहर्ष देने के लिए तैयार हो गए,यद्यपि महाराज बली के गुरु महर्षि शुक्राचार्य ने रजा बली को मना किया था कि भगवान वामन को दान नहीं देना, लेकिन अपने जीवन भर की उच्चतम परम्परा को राजा बली मलिन नहीं कर सकते थे और गुरु आदेश के विपरीत यह जानकर की स्वयं भगवान नारायण उनके यहाँ मांगने आये है राजा बली ने दान देना स्वीकार कर लिया और भगवान वामन ने तीन पग में तीनो लोको को नाप दिया आधे पग में अपनी पीठ राजा बली ने भगवान वामन के चरणों में रख दिया|यह देख साक्षात् नारायण अपने मूल स्वरूप में प्रगट होकर राजा बली को आशीर्वाद दिया और वर मांगने को कहा रजा ने बरदान में भगवान की अखंड भक्ति और यह भी माँगा की आप हमारी रक्षा सदैव करते रहे और निरंतर मेरे आँखों के सामने बने रहे भगवान श्री हरी ने एवमस्तु कहा और रजा बली के राज भवन के मुख्य द्वार पर खड़े हो गए क्योकि अब तो वे राजा बली के पहरेदार भी थे और निरंतर आँखों के सामने खड़े रहने का आशीर्वाद भी दे चुके थे|

इस प्रकार बहुत समय बीत गया भगवती नारायणी को देव वार्ताकार नारद जी ने यह पूरी सूचना दी तो भगवती बहुत चिंतित और दुखी हुई कि अब नारायण हमेशा रजा की रक्षा में ही रहेंगे,अनेक विचार विमर्श के बाद देवी नारायणी स्वयं रजा बली से याचना करने और दान मांगने राजा के सम्मुख राज सभा में पहुची रजा बली ने भगवती से निवेदन किया की आप निःसंकोच अपनी इक्छा प्रगट करे इस पर भगवती ने राजा से उस पहरेदार को ही मांग लिया जो मूल रूप से भगवान वामन थे यह सुन कर रजा बली ने कहा की श्री हरी वचन दे चुके है की अहर्निश मेरे आँखों के सामने ही रहेंगे यह संकल्प कैसे पूर्ण होगा|यह सुन कर भगवती नारायणी ने आशीर्वाद दिया की भगवन श्री हरी सदैव आप की भावभूमि में ही रहेंगे इसलिए निरंतर दर्शन का तो समाधान हो गया और भगवती ने अपने वस्त्र से कुछ धागे निकाल कर राजा बली के दाहिने हाथ में वाध दिया यह कहते हुए की इस रक्षा सूत्र से आप के और आप के राज्य की निरंतर रक्षा होती रहेगी वह पवित्र दिन श्रवण पूर्णिमा ही था और तभी से रक्षाबंधन की परम्परा हमारे समाज में चली आ रही है।

 

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