लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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मेरे पिछले दो-तीन दिन पुणे में गुजरे। इन दो-तीन दिनों में हम एक सपना देखते रहे। दिन में सपना! यह सपना था- अयोध्या के राम मंदिर के बारे में। बाबरी मस्जिद के बारे में। 60 एकड़ के राम जन्म भूमि परिसर के बारे में। यह सारा मामला दशकों से अदालत में अटका हुआ है। ऐसा नहीं है कि अदालत इस मामले पर अपना फैसला दे नहीं सकती लेकिन मुख्य प्रश्न है कि उसे लागू कौन करेगा? कौन सी सरकार इतना साहस कर सकती है कि वह अदालती फैसले को लागू कर दे? इसीलिए यह मामला टलता जा रहा है लेकिन हमारे राजनैतिक दल अभी भी राम मंदिर की माला जपने से नहीं चूकते।

राम मंदिर के प्रश्न को हल करने के लिए पुणे के डा. विश्वनाथ कराड़ ने जो सपना देखा है, मुझे लगता है कि वह एक श्रेष्ठ समाधान हो सकता है। डा. कराड़ ने देश के लगभग सभी धर्मों के प्रतिनिधियों को अपने शिक्षा संस्थान में आमंत्रित किया और उनके सामने एक नक्शा रखा। उसके अनुसार रामलला के स्थान पर राम मंदिर बने और उसके चारों तरफ फैले साठ एकड़ में एक मस्जिद, एक गुरुद्वारा, एक बौद्ध मंदिर, एक जैन मंदिर, एक यहूदी मंदिर और एक पारसी मंदिर बने। ये सब मंदिर सफेद संगमरमर के हों। इन पर लगभग तीन हजार करोड़ रु. खर्च होंगे। डा. कराड़ ने लाखों रु. खर्च करके इस सपने का एक मॉडल बनाया है। वह नमूना देखकर सब मुग्ध हो गए। सबने एक स्वर से इस सपने को साकार करने का संकल्प लिया।

यह सपना ऐसा है कि जिससे असहमत होना कठिन है। यह भारत के लिए ही नहीं, सारे संसार के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। भारत में अयोध्या-जैसे दर्जनों विवादित स्थान हैं। मैंने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्की तथा कई अन्य देशों में इस तरह के कई विवादास्पद स्थल देखे हैं। धर्म-स्थलों के इन विवादों में धर्म की भूमिका कम है, राजनीति की ज्यादा है। भक्ति की कम है, शक्ति की ज्यादा है। जो सपना पुणे की पुण्य-नगरी में देखा गया है, यदि उससे हम सभी संप्रदायों के प्रमुखों, नेताओं और जजों को सहमत करवा सकें तो राम जन्मभूमि का मामला तो हल हो ही जाएगा, वह भारत और संसार में भी सांप्रदायिक सद्भाव का अदभुत उदाहरण उपस्थित करेगा।

6 दिसंबर 1992 को जब अयोध्या में कोहराम मचा तो उसकी आंखों देखी खबरें तो हमने पीटीआई भाषा के माध्यम से सारी दुनिया को दी ही थी, उसके अलावा उस समय प्रधानमंत्री नरसिंहरावजी के अनौपचारिक प्रतिनिधि के तौर पर सभी पक्षों में मैंने संवाद बनवाने की कोशिश की थी। अब यह अवसर फिर उपस्थित हुआ है। यदि इस सपने को साकार करने के लिए हम राष्ट्रीय जनमत भी तैयार कर सकें तो यह राष्ट्र की बड़ी सेवा होगी।

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