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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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अमरेन्द्र सुमन 

प्रगतिशील लोग, प्रगतिशील समाज, प्रगतिशील विचारधारा अर्थात् जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगतिशीलता। चाहे वह उद्योग-धंधे से जुड़ा हुआ क्षेत्र हो, वाणिज्य-व्यापार, प्रशासकीय या फिर चिकित्सीय-अभियंत्रण। शहर हो, गांव अथवा कस्बा, अमीर हो या गरीब, उच्चवर्गीय हो या फिर निम्नवर्गीय। सभी के लिए स्वंय को प्रगतिशील विचारों से जुड़े रखना आवश्‍यक हो चुका है या फिर कहें कि एक स्टेटस सिंबल बन गया है। वर्तमान परिदृश्‍य में प्रगतिशील विचारधारा की परिभाषा यह है कि आप धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के खिलाफ बोलें और कार्य करें। ऐसी ही प्रगतिशील विचारधारा बच्चे के जन्म को लेकर बन चुकी है। छोटे और समृद्ध परिवार की इच्छा, बच्चे प्राप्त न करने की इच्छा। जब चाहें गर्भ-धारण करें और यदि लड़की हो तो गर्भपात की इच्छा।

यदि आप तथाकथित प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक हैं तो आप अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए स्वतंत्र हैं। मां, बहन, बेटी, पत्नी, व ऐसे ही अन्य शब्दों की परिभाषाओं को विकृत करने की इस आधार पर खुली छूट है कि आप प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक हैं। धर्मग्रन्थों, किवदन्तियों, व अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों में जिस शब्द के गुणगान से लगातार हम विश्‍व को अवगत कराते रहे हैं उसी भारतीय संस्कृति के दामन को पष्चिमी सभ्यता की छाया ने दागदार किया है। फैशन व नकल की प्रवृत्ति के पीछे पागल होता जा रहा हमारा समाज और इस पागलपन की शिकार हो रही हैं गर्भ में पल रहीं मासूम बच्चियां।

प्रतिवर्ष देश के विभिन्न भागों-प्रान्तों में प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप से हजारों बालिका भ्रूण हत्या के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। बेटे की चाह और कुल चिराग के नाम पर बेटियों को दुनिया में आने से पहले ही मार देना परंपरा बनती जा रही है। एक तरफ समाज में नारी को भले ही देवी का दर्जा दिया जाता हो परंतु दूसरी ओर गर्भ में उसे मारने का दबाव भी बनाया जाता है। घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों की सलाह और प्रताड़ना पर भी महिला को गर्भपात के लिए बाध्य होना पड़ता है जो लड़की की अपेक्षा लड़का प्राप्ति का मोह मन में पाले बैठते हैं। ऐसा नहीं है कि कन्या भ्रूण हत्या के लिए केवल समाज को ही दोशी ठहराया जाए। इसके लिए कुछ हद तक नारी भी स्वयं जिम्मेदार होती जा रही है। आधुनिक परिवेश में पलने वाली महिलाएं आपने फिगर को ध्यान में रखते हुए दो से अधिक बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती है और छोटा परिवार के चाहत में उसे भी कहीं न कहीं बेटी से अधिक बेटे की चाहत आकर्षित करता है। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि गर्भपात की घटना गांवों से अधिक शहरों में और अशिक्षित से अधिक शिक्षित वर्गों में पाया जा रहा है। ऐसे में हम यह नहीं कह सकते हैं कि उस पढ़ी लिखी महिला को दबाब में गर्भपात के लिए मजबूर किया गया है।

इस वक्त देश के जिन 35 जिलों में महिला-पुरुषों की स्थिति में गंभीर असंतुलन की स्थिति देखी जा रही है, उनमें 50 प्रतिशत जिले पंजाब से ही आते हैं। एक आंकड़े के अनुसार जहां एक ओर फतेहगढ़ साहिब में 5-6 वर्षों पूर्व तक प्रति एक हजार पुरुषों की तुलना में 754 महिलाऐं थीं वहीं गुरुदासपुर में 755, पटियाला में 770, कपूरथला में 775, मनसा में 779 अमृतसर में 783, संगरुर में 754, रोपड़ में 791, व जालंधर में 797 थीं। राज्यस्तरीय आंकड़ों पर गौर करें तो यह बात सामने आती है कि पंजाब में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 793 है। इसी प्रकार हरियाणा में प्रति एक हजार पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या 820, राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली में 865, गुजरात में 878, महाराष्‍ट्र में 917, तमिलनाडू में 939, कर्नाटक में 949, केरल में 963, आन्ध्रप्रदेश में 964, मिजोरम में 971, गोवा में 974, त्रिपुरा में 975, तथा सिक्किम में 986 है। छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में प्रति एक हजार पुरुशों पर महिलाओं की संख्या 900 आंकी गई।

एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक हर साल लगभग 2 लाख 90 हजार बालिकाएं गर्भ में ही मार डाली जाती हैं। प्रतिवर्ष तकरीबन 450 करोड़ रुपये का इसका व्यवसाय होता है। जनसंख्या आयुक्त, भारत सरकार ने स्पष्‍ट किया है कि पिछले 10 वर्षों के दरम्यान लगभग डेढ़ करोड़ कन्याओं को गर्भ में ही मार डाला गया। वर्श 1994 में कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिये सरकार ने प्रसव पूर्व प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स सिस्टम तैयार किया था जिसे 1996 में लागू किया गया था। इस सिस्टम के तहत गर्भस्थ भ्रूण के लिंग परीक्षण पर पूर्णतः पाबंदी लगा दी गई थी। यह भी स्पष्‍ट किया गया है कि यदि ऐसे अपराध में शामिल व्यक्ति को 5 वर्ष तक के कारावास की सजा व 30 से 50 हजार रुपये तक के जुर्माने की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। परंतु देखा जाए तो सरकार के इन नियमों का पालन वर्तमान में एक मजाक बनकर रह गया है।

कुछ वर्ष पूर्व उत्तर भारत में दो डॉक्टरों को कन्या भ्रूण हत्या के अपराध में धर दबोचा गया था। इतना ही नहीं राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, दिल्ली व पंजाब के कई धन पिपासु डॉक्टरों को इस अमानवीय कृत्य के अपराध में बेनकाब भी किया जा चुका है जो दलालों और नर्सों की मिली-भगत से कन्या भ्रूण हत्याओें की दुकान चला रहे थे। विवाह पूर्व अवैध शारीरिक संबंधों के प्रतिफलन भ्रूण हत्याओं का सिलसिला पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। पंजाब प्रान्त के पातंगा कस्बे में कुछ वर्ष पूर्व एक निजी नर्सिंग होम के पीछे कुएं के आकार वाले एक स्थान से तकरीबन तीन दर्जन से अधिक बालिका भ्रूणों की बरामदगी हुई थी। मानवीय संवेदना को कलंकित कर देने वाली इस घटना पर पूरे राश्ट्र में विरोध का जबर्दस्त स्वर उभरा था। खबरों के मुताबिक डॉक्टर व उसकी पत्नी घटना पिछले 5-6 वर्षों से बालिका भ्रूण हत्या जैसे कुकृत्य में शामिल थे।

पंजाब प्रान्त के ही कुछ धार्मिक नेताओं द्वारा हाल के वर्षों में बालिका भ्रूण हत्या के विरुद्ध जारी निर्देशों के बावजूद धन के लोभी डॉक्टरों की आंखें नहीं खुली। ये लगातार इन अमानवीय अपराधों में शामिल होते रहे हैं। परोक्ष रुप से कस्बाई इलाकों एवं छोटे-छोटे शहरों में कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला बदस्तूर जारी है। महिला व बाल विकास एवं गर्भस्थ शिशुओं के लिये पूरे विश्‍व में कार्य कर रही प्राईवेट एजेन्सियां, सरकारी संस्थाओं से लेकर मानवाधिकार व महिला संगठनों द्वारा अथक प्रयास के बावजूद अभी तक इस पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। अलग-अलग देशों की सरकारें स्वास्थ्य सेवाओं के दृष्टिकोण से आबादी पर नियंत्रण तो चाहती हैं, किन्तु मानव भ्रूण हत्याओं पर बंदिशों के क्रम में कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे। भारत से अलग हटकर बात की जाय तो एशिया महादेश के कई अल्पविकसित देशों में मानव भ्रूणों के डिश (कॉन्टीनेन्टल डिश) तैयार कर उॅची-उॅची कीमतों पर उसकी बिक्री तक की जाती है। एक समय अखबारों की सुर्खियों में यह मामला काफी तूल पकड़ चुका था। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक इन छोटे-छोटे गरीब मुल्कों के नगरीय व उप नगरीय इलाकों में अविवाहित व विवाहित गर्भवती युवतियों-महिलाओं द्वारा चार से छह महीनें के भ्रूण की बिक्री जीविकोपार्जन हेतु की जाती थी। मानव भ्रूण की बिक्री तथा इससे तैयार डिश का बाजार काफी महंगा होता था। हालांकि इसके खिलाफ उठी आवाजों के कारण बहुत हद तक इसपर पाबंदी लग चुका है लेकिन पूर्णतः पाबंदी है इसपर अब भी संयश बरकरार है।

कन्या भ्रूण हत्या पर कठोर दण्ड का प्रावधान एक महत्वपूर्ण जरुरत बनती जा रही है। अल्ट्रासाउण्ड एवं अन्य चिकित्सीय मशीनों की वजह से इसमें तेजी से इजाफा ही हो रहा है। झारखण्ड जैसे पिछड़े राज्यों के कई बड़े-बड़े शहरों में भी कन्या भ्रूण हत्या सामान्य सी बात बन कर रह गई है। राजधानी रांची सहित जमशेदपुर, धनबाद, हजारीबाग, व संताल परगना प्रमण्डल के देवघर व दुमका जैसे जिलों के शहरी क्षेत्रों में चोरी-छिपे प्रतिदिन सैकड़ों भ्रूण हत्याएं हो रही हैं। जिसपर केंद्र व राज्य की सरकारों को एक साझा कार्यक्रम के तहत अंकुश लगाने की जरुरत है। इस गंभीर मसले पर ग्लोबल वार्ता के तहत सामुहिक कदम उठाने की जरुरत है। कठोर कानून व दोषी लोगों डॉक्टरों, नर्सों, दलालों व इस धंधे में शामिल तमाम लोगों की पहचान कर इन्हें दंडित करने की आवश्‍यकता है। अन्यथा भ्रूण हत्याओं का सिलसिला यूं ही जारी रहा तो आने वाले समय में महिलाओं का अस्तित्व तो संकट में पड़ेगा ही, पुरुष समाज भी अपने अस्तित्व और अधिकारों से बेदखल हो जाएंगे। प्रथम दृष्‍ट्या अवाम की संवेदनशीलता से इंकार नहीं किया जा सकता। नागरिक जागरुक होंगे तभी इस भेदभाव को मिटाया जा सकेगा अन्यथा पेट में पल रहे अजन्में मासूमों के हत्यारों का साम्राज्य फैलता ही रहेगा।(चरखा फीचर्स)

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1 Comment on "कन्या भ्रूण हत्या का तेजी से विकसित होता बाजार"

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parshuramkumar
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अब कन्याओं की भ्रूणहत्या स्वतःप्रवर्तित होकर बंद होने वाली है क्योंकि दहेजलोभियों का पारा ठंढा हो रहा है ,उनके घरों में ४० वर्ष के दुल्हे की जमात बढ गयी है शादी के लिए मुँह बाये खड़े हैं ~~~~~~~परशुरामजी

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