लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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rohitसुरेश हिन्दुस्थानी

हैदराबाद विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले पर जिस तरह देश के राजनैतिक दलों द्वारा घटिया राजनीति की जा रही है, उसकी जितनी निंदा की जाये कम है। दादरी की तरह ही इस मौत को भी जातिगत रंग देने का प्रयास किया जा रहा है। बिना पूरे मामले को जाने समझे तमाम राजनैतिक दलों द्वारा जिस तरह इस मौत पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने का प्रयास किया गया। उससे इन राजनैतिक दलों के बारे में यही बात सामने आ रही है कि उनको केवल विरोध के लिए ही राजनीति करने का आदेश मिला है। हालांकि सवाल यह आता है कि ऐसा करने के लिए उन्हें कौन प्रेरित कर रहा है। इसमें अगर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से सोचा जाए तो यह कहना तर्कसंगत होगा कि ऐसे मामलों पर राजनीति कभी नहीं की जानी चाहिए, बल्कि ऐसे प्रकरण घटित न हों इसके लिए देश में राजनीति करने वाले सभी दलों को व्यापकता के साथ विचार विमर्श करना चाहिए।

हमारे देश में सर्व धर्म समभाव की बात की जाती रही है, लेकिन क्या ऐसे विरोध प्रदर्शन के चलते इस समभाव की कल्पना की जा सकती है। कदापि नहीं। जो लोग इस आत्महत्या पर विरोध करते रहे हैं, वह किसी न किसी रूप में देश के वास्तविक स्वरूप के साथ खिलवाड़ ही कर रहे हैं। जातिवाद के आधार पर देश में जो विद्वेष बढ़ रहा है, ऐसे मामले आग में घी डालने के समान है। ऐसे मामलों पर देशवासियों को अत्यंत सावधानी बरतना चाहिए।

इन आंकड़ों पर जरा गौर कीजिये। भारत में सालाना लगभग एक लाख लोग आत्महत्या करते हैं। 2014 में 1 लाख 31 हजार 666 लोगों ने खुद की जान ली। इनमें 2403 छात्र थे। यानी हर महीने 200 से ज्यादा छात्र आत्महत्या करते हैं। बकौल राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो, उस एक साल में 5650 किसानों और 20 हजार से ज्यादा घरेलू महिलाओं ने खुदकुशी की है। अब सवाल यह उठता है कि आत्महत्या के इन तमाम खबरों को अगर रोहित जितना ही फुटेज मिलता तो भारत आज एक आत्महत्या प्रधान देश ही कहा जाता। तो इस मामले में आखिर क्या ऐसा विशेष है? क्या जात के आधार पर ही आप आत्महत्याओं की विभीषिका को कम या ज्यादा करके आंकेंगे? पहली नजर में रोहित पर संस्थान द्वारा की जाने वाली कार्रवाई पूरी तरह जायज दिखती है। इसमें सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आत्महत्या वाले प्रकरणों में कभी जातिवाद का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। जो लोग रोहित के मामले में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें केवल देश की सरकार को नीचा दिखाने की राजनीति करने में ही मजा आ रहा है। आत्महत्या करने वाला व्यक्ति किसी न किसी कारण से ही आत्महत्या करने की ओर प्रवृत होता है। उसके जीवन में सब कुछ अच्छा नहीं होता। इसी कमी के चलते देश भर में न जानें कितने लोग मायूस होकर अपने जीवन का उत्सर्ग कर देते हैं। जो लोग विरोध कर रहे हैं उनको आतम्हत्या करने से पूर्व उन लोगों की दशा दिखाई नहीं देती। वास्तव में उनको करना यह चाहिए कि व्क्ति के जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण नहीं हो पाए, जिसके लिए उसकी आवश्यकता की पूर्ति की जाए।

रोहित मामले में विरोध का झंडा थामे लोग केवल और केवल राजनीति ही कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल आता है कि हम किस प्रकार का वातावरण निर्मित करना चाह रहे हैं। रोहित मामले में विरोध करने से राष्ट्र विरोधी चेहरे सामने आ गये हैं। एक ऐसे मामले में केन्द्र सरकार व केन्द्रीय मंत्रियों को घसीटने का घटिया प्रयास किया जा रहा है। जिस मामले से केन्द्र सरकार या उसके मंत्रियों का कोई लेना देना नहीं है। एक आत्महत्या को दलित शोषण का रूप दिया जा रहा है। जबकि मरने वाला स्वंय अपने आत्महत्या नोट में यह साफ कर चुका है कि उसकी मौत का कोई जिम्मेदार नहीं है। मरने वाले छात्र रोहित वेमुला ने अपने आखिरी पत्र में अपनी बिगड़ी मानसिक स्थिति को आत्महत्या का जिम्मेदार माना। पत्र में कहीं भी उसने न तो किसी सरकार का जिक्र किया और न ही विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर या अन्य जिम्मेदारों का। दिशाहीन तथा स्वार्थ की राजनीति करने  वाले राजनैतिक दलों को इस आत्महत्या मे कहां से दलित उत्पीडऩ नजर आ रहा है। यह तो वही बता सकते हैं लेकिन जिस तरह मौत को दलित अगड़े तथा पिछड़ो में बांटकर राजनीति की जा रही है वह देश के भविष्य के लिये खतरनाक है।

पूरे प्रकरण पर अगर नजर डाली जाये तो आत्महत्या करने वाला छात्र रोहित वेमुला विवादित छात्र संगठन अम्बेडकर स्टूडेंट फैडरेशन से जुड़ा हुआ था। यह वही स्टूडेंट फैडरेशन है जिसमें बम्बई बम व्लास्ट के दोषी याकूब मेमन की फंासी पर जमकर आंसू बहाये थे। गौहत्या को सही ठहराने के लिये विश्वविद्यालय परिसर में गौमांस की पार्टी का आयोजन कर खुलेआम बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय की धार्मिक आस्थाओं को ठेस पहुंचायी थी। राजनीति करने वाले लोग ऐसी घटनाओं को भले ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर टाल दें। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं होता कि आप किसी धर्म या किसी व्यक्ति के स्वाभिमान को ठेस पहुंचायें। अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे को बोलने से रोकें। जब अम्बेडकर स्टूडेंट फैडेशन के राष्ट्रद्रोही गतिविधियों का विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रो ने विरोध किया तो रोहित वेमुला तथा उसके साथियों ने कानून की धज्जियां उड़ाते हुये अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उस दलित छात्र नेता सुशील कुमार की बेरहमी से पिटाई कर दी। जो इनकी राष्ट्रद्रोही गतिविधियों को रोकने का प्रयास कर रहा था। चूंकि सुशील कुमार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा हुआ था। सो देश के दोगले राजनैतिक दलों के लिये वह दलित नहीं रहा। मरने वाला व्यक्ति रोहित वेमुला ही इन्हें दलित नजर आ रहा है। जबरन देश के माहौल को खराब करने वाले इन राजनैतिक दलों से भी पूछा जाना चाहिये कि आखिर किस आधार पर रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले को यह दलित उत्पीडऩ से जोड़ रहे हैं। कहां और किसने कब उत्पीडन किया, इनसे पूछा जाना चाहिये। अगर कोई प्रमाण है तो उन प्रमाणों को सामने लाये। अन्यथा देश का माहौल खराब करने का प्रयास न करें। ऐसे मामलों में केन्द्र सरकार को भी अपनी नीति में बदलाव करने चाहिये। आजकल फैशन हो गया है कि अगर किसी दलित या अल्पसंख्यक की मौत होती है, तो उस पर राजनैतिक दलों द्वारा जमकर होहल्ला मचाया जाता है। वहीं देश का कोई अन्य वर्ग उत्पीडऩ का शिकार होता है या किसी की मौत होती है तो यही राजनैतिक दल अजगर की तरह कुण्डली मारकर बैठ जाते हंै। आखिर यह कब तक चलता रहेगा। जरूरी है कि केन्द्र सरकार ऐसे मामलों के लिये सख्त कानून बनाये तथा बिना आधार के देश का माहौल खराब करने वालों के विरुद्ध राष्ट्रद्रोह के तहत मुकदमा दर्ज कर कठोर कार्यवाही की जाये, तभी देश के अंदर फैल रही इस घटिया मौत पर राजनीति का अंत होगा।

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