लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

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-विश्व मोहन तिवारी

१४ सितंबर राजभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह सरकार को याद दिलाने के लिये नहीं वरन सरकारी कर्मचारियों को याद दिलाने के लिये होता है, ताकि सरकारी कार्य राष्ट्रभाषा में हो। अर्थात सरकार यह इंगित करती है कि अपनी‌ भाषा को भूलने के लिये हम ही जिम्मेदार हैं। यह कुछ सत्य तो है। किन्तु हमें ऐसा याद दिलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

नौकरी तो गुलामी की भाषा अंग्रेज़ी सीखने पर ही मिलती है, अर्थात काम भी उसी‌ अंगेज़ी भाषा में होना है। यह हिन्दी दिवस तो जनता को भुलावे में रखने के लिये नाटक है। जब नौकरी बिना अंग्रेज़ी जाने नहीं मिलती तब ऐसी स्थिति में हम हिन्दी ही‌ क्यों कोई भी‌ भारतीय भाषा क्यों पढ़ें !! यदि सरकार चाहती कि देश का कार्य राजभाषा में‌ होना है तो अंग्रेज़ी‌ के स्थान पर हिन्दी को अनिवार्य और अंग्रेज़ी को वà ��कल्पिक भाषा होना चाहिये । यह क्यों नहीं हो रहा है ? इसके मुख्य दो कारण हैं – एक, हम मानसिक रूप से अंग्रेज़ी के गुलाम हैं; २, भारतीय भाषाओं में आपसी इर्ष्या है, क्योंकि हम अपनी संस्कृति द्वारा प्रदत्त प्रेम तथा त्याग के स्थान पर स्वार्थ को अधिक महत्व दे रहे हैं । शेष कारण, यह कहना कि हिन्दी‌ में‌ वैज्ञानिक तथा विधि को पर्याप्त अभिव्यक्त करने की क्षमता नहीं है, योग्यता नही है, मात्र बहाना है। संस्कृत की‌ बेटी में‌ क्षमता न हो, यह तो भ्रम है। और योग्यता भी है चाहे, १९५० में थोड़ी कम थी, जो १५ वर्षों में‌ ही दूर कर दी गई थी। भाषा को बिना अवसर दिये योग्यता कैसे पैदा हो सकती है ! क्षमता रहने पर और समय मिलने पर हिन्दी‌ ने योग्यता प्राप्त कर ली है, जो अवसर मिलने पर सतत आधुनिक रहेगी।

जो लोग इस समस्या को मात्र हिन्दी की समस्या मान रहे हैं वे भयंकर गलती‌ कर रहे हैं। वास्तव में‌ यह भाषा की समस्या अखिल भारतीय भाषाओं की समस्या है, और आँख खोल कर देखें तब उन सभी पर संकट है। यह संकट, अन्य बड़े संकटों के समान वैश्विक है, उन सभी विकासशील देशों की‌ भाषाओं पर संकट है, जो पहले उपनिवेश रहे हैं, और जिनमें अपने देश के प्रति सम्मान कम है। हमारे देश में न केवल अपने देश के प्रति सम्मान की समझ ही कम है वरन अपने पुराने स्वामी के प्रति अंधभक्ति अधिक है। जो देश क्रिकैट पर अपने देश के सम्मान को परखे, उस देश का यारो क्या कहना!! जिस देश के युवाओं के हीरो खिलाड़ी या एक्टर या माडल हों, उस देश का भविष्य क्या हो सकता है!!

जब देश में शिक्षा का माध्यम ही एक कठिन और विदेशी भाषा अंग्रेज़ी हो उस देश की‌ भाषाओं का क्या भविष्य हो सकता है, और विशेषकर कि जब वह भाषा भी साम्राज्यवादी देश की हो !! उनके जीवन का लक्ष्य ही दूसरों को लूटना ऱहा हो । एक तरफ़ तो हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी में विकसित देशों के बराबर नहीं खड़े हो पाएंगे क्योंकि हम आविष्कार तथा नवीनीकरण में कमजोर ही रहेंगे । विदेशी भाषा में जो ज्ञान प्राप्त होता है उसका आत्मसात होना बहुत कठिन होता है, और बिना आत्मसात ज्ञान के आविष्कार शायद ही हों।

सभी भारतीय भाषाओं के स्थान पर अब बच्चे, युवा तथा प्रौढ़ अंग्रेज़ी ही पढ़ रहे हैं। अंग्र्ज़ी छा जाएगी तब हम अपनी संस्क्RRति भूलकर, पश्चिमी संस्कृति के पक्के गुलाम हो जाएंगे। हिंदी तो भारत के विशालतम क्षेत्र की भाषा है, वह तो अधिक समय तक अंग्रेज़ी से लड़ सकेगी, किन्तु कम क्षेत्रों में या कम संख़्या में बोली जाने वाली‌ भाषाएं तो दुर्बल से दुर्बलतर होती रहेंगी। आवश्यकता है कि भारतीय भाषाएं‚ आपस में द्वेष न करें, प्रेम तथा त्याग के बल पर एकजुट होकर विदेशी भाषा का सामना करें। केवल दिन्दी दिवस ही न मनाया जाए, वरन राष्ट्रभाषाएं दिवस मनाए जाएं। एक होकर अंग्रेज़ी को राजभाषा के पद से हटाएं। सभी प्रदेश, जिनकी‌ भाषाएं समृद्ध हैं अपने कार्य अपनी भाषा में करें, केवल केन्द्र सरकार के और जो प्रदेश ऐसा चाहते हैं उनके कार्य हिन्दी में‌ हों।

यह लड़ाई केवल भाषा की‌ नहीं है वरन भारतीय संस्कृति की है। भारतीय संस्कृति ही पूर्ण रूप से मानवीय संस्कृति है, शेष संस्कृतियां भोगवादी‌ हैं, अत: अमानवीय हैं। भारतीय संस्कृति हमें मानवता की‌ भलाई के लिये बचाना है।

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16 Comments on "राष्ट्रभाषाओं को बचाएं, भारतीय संस्कृति बचाएं"

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Dr Ashok kumar Tiwari
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Dr Ashok kumar Tiwari
आदरणीय विश्वमोहन जी मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ :– ” यह लड़ाई केवल भाषा की ही नहीं भारतीय संस्कृति की भी है और मानवता की रक्षा के लिए हमें इन्हें बचाना है ” !!! बहुत दुखद है वास्तव में अंग्रेजी परस्त प्राचार्यों को जगह-जगह बैठाकर – केंद्रीय – नवोदय विद्यालय- इण्डियन स्कूल और इसी तरह अन्य प्राइवेट स्कूलों में हिंदी को कमज़ोर करने की शाज़िस की जा रही है :——- 1) अधिकांश डी.ए.वी. स्कूलों में 11-12 से हिंदी एलेक्टिव और कहीं-कहीं एक्टीविटी को प्रोत्साहन देने के बहाने हिंदी एलेक्टिव और हिंदी कोर दोनों को हँटाकर आर्य समाज की मूल… Read more »
ken
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Mr.Tiwari, Does this type of mostly spell checker free Global Hindi maintain all needed sounds in speech? हीन्दी /Hindi /hindii/Heendee/Hindee राष्ट्रभाषाऑ को सरल बनाऍ, भारतीय सन्स्कृती बचाऍ Posted On September 13, 2010 by &filed under साहीत्‍य. -वीश्व मोहन तीवारी १४ सीतन्बर राजभाषा दीवस के रुप मॅ मनाया जाता है.यह सरकार को याद दीलाने के लीये नही वरन सरकारी कर्मचारीयॉ को याद दीलाने के लीये होता है, ताकी सरकारी कार्य राष्ट्रभाषा मॅ हो.अर्थात सरकार यह इन्गीत करती है की अपनी‌ भाषा को भुलने के लीये हम ही जीम्मेदार है.यह कुछ सत्य तो है.कीन्तु हमॅ ऐसा याद दीलाने की आवश्यकता क्यॉ पडी?… Read more »
विश्व मोहन तिवारी
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विश्व मोहन तिवारी

हिमवंत जी
बिलकुल सही कह रहे हैं आप ..
तब हमारा कर्त्तव्य बनाता है की इस सरकार को चुनाव में हराएं ..
वरना जैसा तुलसी ने कहा है, ”
” निशि गृह मध्य दीप की बातन्ही तम निवृत्त नहीं होई..”
धन्यवाद

विश्व मोहन तिवारी
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विश्व मोहन तिवारी
अजित भोंसले जी धन्यवाद उस बुरी खबर के लिए. कितना बड़ा दुर्भाग्य है हमारा की हमारे ही भाई जो दलित कहलाते हैं कुप्रचार के कारण हम से अलग होकर हमारे विरोध युद्ध कर रहे हैं.. जैसा की मैंने सिद्ध किया है की श्री राम ने शम्बूक को नहीं मारा था वह उत्तर काण्ड किसी दुश्मन ने प्रक्षेप किया है और वह झूठा बोलकर जीत गया और सत्य की हार हो रही है.. क्या हम अपने दलित भाइयो को यह सत्य समझा सकते हैं? जब की विश्व में, पश्चिम में भी, गरीबों को हर जगह सताया गया है उनका शोषण किया… Read more »
Himwant
Guest

वर्तमान सरकार हिन्दी विरोधी है। वह हिन्दी भाषा के विकास के लिए आवंटित धन का उपयोग कांग्रेसी जन के विदेश यात्रा पर कर रही है। नेपाल मे यह सरकार अंग्रेजी भाषा के विकास के लिए कार्यक्रम चला रही है। हिन्दी को डुबाना और अंग्रेजी को बढाना वर्तमान सरकार के अघोषित निति है।

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