लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


इधर सुप्रीम कोर्ट ने ताजमहल की संरचना पर खतरे के संबंध में एक ब्रिटिश अखबार की खबर पर स्वतः संज्ञान लिया। खबर यह थी कि यमुना में जल स्तर घटते जाने से ताजमहल की नींव पर असर पड़ रहा है। उस के कुँओं में लगी साल लकड़ियाँ नमी न मिलने से सूख कर सड़ सकती हैं, इत्यादि। तब कोर्ट की एक खंड-पीठ ने इस खबर से चिंतित होकर भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय, पुरातत्व सर्वेक्षण तथा उत्तर प्रदेश सरकार, तीनों को नोटिस जारी कर दिया। एक महीने के अंदर ही सबको अपना उत्तर देने भी कहा। लेकिन 15 नवंबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट संतुष्ट नहीं हुई। उसे न उ.प्र. सरकार, न पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्तर से कोई तसल्ली हुई।

ऐसा नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने ताजमहल के लिए यह चिंता पहली बार दिखाई। पिछले बीस-पच्चीस वर्ष में वह कई बार विविध प्रसंगों में ताजमहल के लिए चिंतित हो चुकी है। मगर इस चिंता में एकांगिता है। माननीय न्यायाधीश किस रूप में ताजमहल को ऐसा विशिष्ट महत्व दे रहे हैं – आर्थिक, सांस्कृतिक या धार्मिक? यह प्रश्न इसलिए उठता है, क्योंकि उन्हें कोणार्क के अदभुत सूर्य मंदिर के खंडहर में बदलते जाने पर चिंता करते नहीं पाया गया।

कोणार्क का सूर्य मंदिर पुरातत्व विभाग की उपेक्षा का शिकार है। उसके सामने के प्रांगण में इतना पानी भर जाता है कि वहाँ जाया नहीं जा सकता। वैसे भी उसका अस्तित्व खतरे में है। उसके संरक्षण के लिए अब तक दस समितियाँ बन चुकी हैं, किंतु या तो उनकी रिपोर्ट नहीं आई अथवा उन पर अमल नहीं किया गया। यह स्थिति तब है कि जबकि यह यूनेस्को द्वारा नामित विश्व-धरोहरों में एक है। यह कोई अपवाद उपेक्षा नहीं।

हाल में चित्तूर स्थित श्रीकालहस्ति मंदिर का मुख्य द्वार जर्जर होकर गिर पड़ा। यह विजयनगर साम्राज्य के प्रसिद्ध हिन्दू राजा श्रीकृष्णदेवराय द्वारा पंद्रहवीं शती में बना मंदिर है, जहाँ आज भी तिरुपति के बाद सर्वाधिक श्रद्धालु जाते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण स्थान के साथ ऐसा क्यों हुआ, पूछने पर उस प्रदेश के मुख्य मंत्री कुछ उत्तर न दे सके।

भारत में ऐसे असंख्य महान सांस्कृतिक स्थल हैं, जिनकी सुध लेने की फुर्सत हमारे कर्णधारों को नहीं है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के ताजमहल प्रेम से खुशी नहीं होती। बल्कि एक प्रश्न उठता है। ताजमहल के प्रति ही इतनी चिंता क्यों? इस का उत्तर कुछ पहले यूनेस्को की संस्कृति कार्यक्रम विशेषज्ञ मोई चीबा ने दिया था।

मोई चीबा ने कहा कि भारत में एक से बढ़ कर एक महान सांस्कृतिक धरोहर हैं, किंतु यहाँ केवल मुगल कालीन स्मारकों को ही ‘विश्व-धरोहर’ बनाने का आधिकारिक आग्रह किया जाता है। मोई चीबा जापानी हैं और यहाँ की राजनीतिक संस्कृति से निर्लिप्त। इसीलिए ऐसा दुःखद सत्य कह सकीं। अन्यथा बरसों से दुनिया यह लज्जास्पद तमाशा देख रही है कि रामेश्वरम् स्थित राम-सेतु जैसी अद्वितीय धरोहर का सम्मान करने के बजाए उसे तोड़कर पैसे कमाने का उपक्रम हो रहा है! जबकि दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे और कुतुबमीनार की शान धूमिल न हो, इस के लिए मेट्रो परियोजना का मार्ग बदल दिया जाता है।

निस्संदेह, जैसे राम जन्म-भूमि मंदिर को काल-क्रम में पहले ‘मस्जिद जन्म-स्थान’ तथा फिर केवल ‘बाबरी मस्जिद’ बना दिया गया। उसी तरह यदि किसी मध्यकालीन हमलावर ने रामसेतु पर भी कब्जा कर ‘जहाँगीर पुश्ता’ जैसा कुछ नाम दे दिया होता – तो आज उसे बड़े हैरत, तारीफ और अजूबा नमूने के रूप में दुनिया को दिखाया जा रहा होता! उसे हम अपनी धरोहर बताते, जिसे तोड़ने की बात किसी को सपने में भी नहीं आती। अयोध्या में राम जन्म-भूमि स्थान पर बनी जीर्ण, प्रयोगहीन इमारत के लिए दुनिया भर में कैसा बवेला मचा रहा है, यह हम सब जानते हैं। अतः आसानी से सारा अनुमान कर सकते हैं।

यह समूचा परिदृश्य उस वैचारिक दृष्टिकोण की ही सहज परिणति है, जिसमें हिन्दू प्रतीकों, परंपराओं, स्थानों को नीचा माना या उपेक्षा की जाती है। जबकि मुस्लिम कब्रगाहों को भी संस्कृति का नमूना बताया जाता है! जिन मुगल चिन्हों को हमारे अनेक सत्ताधारी एक के बाद एक ‘विश्व-धरोहर’ बनाने पर लगे हुए हैं, उनमें अधिकांश केवल मृतक बादशाहों, उनकी बेगमों के मकबरे और दूसरे मात्र विलासिता के प्रतीक हैं। कश्मीर जैसे स्वर्गोपम प्रदेश में मुगल बादशाहों ने जो बनवाया, उसे क्या कहा जाएगा? एलुरा जैसी महान हिन्दू धरोहर के ठीक सिर पर औरंगजेब ने क्या बनवा डाला है? उन्हें देख कर स्वयं तुलना कर लें। पर इस संकीर्ण और उधार की विदेशी-मुगल देन को भारत की पहचान बना देने में हमारे नेता और बौद्धिक लगे रहे हैं। जबकि एक से एक अनूठी सांस्कृतिक धरोहरों की केवल इसलिए हेठी की जाती है, क्योंकि वह हिन्दू भारत की धरोहर हैं।

इस ताजमहल को ही लें। जिसे आज भारत की सर्वप्रमुख कलाकृति समझा, बताया जाता है उस का नाम भी बड़ी हाल की चीज है। ब्रिटिश काल तक यह ‘मुमताज बीबी का मकबरा’ के सामान्य नाम से पुकारा जाता था। इस का इतना ही मामूली महत्व था कि लॉर्ड विलियम बेंटिक ने इसे तोड़कर इसका पत्थर बेच लेने का निश्चय कर लिया था। यह सन् 1827-35 के बीच की बात है। बेचने का काम आरंभ हो गया था। वह कार्य संपन्न केवल इसलिए न हो सका कि उतने ढेर सारे पत्थर के खरीदार सामने नहीं आए। यह उल्लेख स्वयं बड़े ब्रिटिश इतिहासकारों ने किया है। स्पष्ट है, कि तब ताज बीबी के मकबरे का कोई मजहबी, सांस्कृतिक या राष्ट्रीय मूल्य न लोगों के लिए था, न सत्ताधारियों के लिए।

ताज मकबरे के विपरीत प्राचीन भारत के महान शैक्षिक-सांस्कृतिक केंद्रो – नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला, आदि, तथा वाराणसी, बोधगया, कोणार्क, मदुराई, उज्जैन, कुरुक्षेत्र जैसे अनगिन हिन्दू स्थलों का वैश्विक महत्व इतना अधिक रहा है कि उन के ऐतिहासिक शोध-अध्ययन में कई देशी-विदेशी विद्वानों ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। किंतु ऐसी अनुपम विरासत के महत्व को स्वतंत्र भारत के उच्च वर्गीय लोग दो कौड़ी का समझते हैं। तभी तो ताजमहल की तुलना में उन्हें कहीं नहीं गिनते!

इसीलिए आज भारत के नौनिहालों को जो इतिहास भी पढ़ाया जाता है, वह मुख्यतः मुगलकालीन भारत का। यह अनायास नहीं है। तीन दशक पहले बाकायदा एक आधिकारिक “गाइडलाइंस फॉर हिस्टरी टेक्स्टबुक्स”, जारी करके इतिहास शिक्षण के लिए निर्देश देकर यह किया गया। इस निर्देश को पढ़कर लगता है मानो भारत का इतिहास ही तब शुरू होता है, जब मुगल पधारे! हमारे देश के प्रगतिशील इतिहासकार मुगल वंश के संस्थापक को हमलावर भी नहीं कहना चाहते, उसे ‘आगंतुक’ बताते हैं। हरबंस मुखिया से पूछ कर तसदीक कर लीजिए!

किन लोगों ने इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों को विकृत करने का ऐसा निर्देश दिया था, यह प्रश्न अब निरर्थक है। ध्यान देने की बात यह है कि इसे ‘राष्ट्रीय एकता’ के नाम पर किया गया। अर्थात् इस छलावे भरी एकता के लिए भारत को अपनी पहचान, अपना हिन्दुत्व छोड़ देना चाहिए! इस घोषित-अघोषित तर्क के अनुसार भारतीय धरोहर या हमारे राष्ट्रीय प्रतीक वही चीजें हो सकती हैं जिन में मुस्लिम योगदान हो। भीरू और बीमार मानसिकता का यह तर्क लगभग नब्बे वर्ष पहले अवतरित हुआ, जो स्वतंत्र भारत में नेहरूवाद की सत्ता और छल-छद्म से सत्ताधारी तर्क बन गया।

इसीलिए, हमारी नई पीढियाँ ताजमहल को देश की संस्कृति समझती हैं, चारो धाम को नहीं। वह संदिग्ध सूफियों के गीत गाती हैं, शंकराचार्य, सूरदास या तुलसी को नहीं। उसे सूरदास के पदों के अनिर्वचनीय रस से वंचित किया जा चुका है। केवल उर्दू शायरी के सस्ते, छिछोरे उपमानों को ही वह रसिक प्रतिमान समझती है। हमारा संपूर्ण उच्च-वर्ग मुगलई खाने को ही भारतीय समझता है, छपप्न-भोग को मात्र एक काल्पनिक मुहावरा।

क्या यह दुःख और लज्जा की बात नहीं है कि पाकिस्तानी मेहमान भारत आते हैं तो सींक-कबाब, मुर्ग-मुसल्लम से उनकी खातिर होती है। फिर जब भारतीय महानुभाव पाकिस्तान जाते हैं, तब वहाँ भी ठीक इन्हीं चीजों का दस्तरखान सजता है। भारत के पुए-पकवान, दोसे या मिष्टान्नों का कहीं नाम नहीं लिया जाता। जबकि मात्र एक मगध प्रदेश (बिहार) में केवल एक अन्न – चना – से बीसियों अदभुत व्यंजन बनते हैं। लालू प्रसाद और महेन्द्र सिंह धोनी ने तो केवल एक को चर्चित किया। इसी तरह, कर्नाटक में चावल के दर्जनों व्यंजन एक ही सह-भोज में परोसे जाते हैं, जिनमें सब का अपना विशिष्ट रस होता है। भारतीय व्यंजन के रूप में इन की महत्ता सरकारी आयोजनों में क्यों नहीं दिखाई देती?

क्योंकि, जैसा कवि अज्ञेय ने लिखा था, “स्वतंत्र भारत के लोकतंत्री सत्ताधारियों ने हमें और दुनिया को यही संदेश दिया है कि मुगलों से पहले इस देश में लोगों को खाना बनाना संभवतः नहीं आता था! किसी सरकारी होटल में चले जाइए। वहाँ यूरोपीय और चीनी भोजन तो मिल जाएगा, थाई, रूसी, आदि भी मिल सकते हैं, किंतु ‘इंडियन डिशेज’ में केवल मुगलई खाने की सूची रहेगी। मान लिया गया है कि मुगलों के आने से पहले भारत के लोग कंद-मूल कुछ खाते रहे होंगे। एकाध मिठाइयाँ भी शायद।” अतएव, भारतीय खाने को मुगलई के रूप में प्रसिद्धि मिलने को कदापि संयोग न समझें। यह खाने में सेक्यूलर आग्रह है!

इसीलिए कट्टर सेक्यूलरपंथी और प्रखर बुद्धिजीवी, कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर ने गर्व एवं आग्रह पूर्वक रेखांकित किया था, कि “मेरे सेक्यूलर होने का यह भी प्रमाण है कि मैं गो-मांस खाता हूँ।” क्या वे अपने दल और नेहरूवाद के सैद्धांतिक विश्वास को ही व्यक्त कर रहे थे? चाहे कुछ अधिक उत्साह में। पर मणि साहब कुछ गलत नहीं कह रहे थे। सोवियत लेनिनवाद की तरह, भारतीय राजनीति का सेक्यूलरवाद भी एक सर्वव्यापक सिद्धांत है, जो जीवन के किसी पक्ष को नहीं छोड़ता।

इसीलिए पुस्तकों के मामले में आधिकारिक तौर पर किसी पुस्तक को भारतीय धरोहर रूप में लहराया नहीं जाता। क्योंकि मुगल ‘आगंतुकों’ ने चाहे जितने मकबरे, बगीचे या पेंटिंगे बनवाई हों – उनके जमाने में कोई किताब ऐसी नहीं लिखी गई जिसे मुगलिया इल्म का नमूना बताया जा सके। लिहाजा, भारतीय धरोहर में किसी पुस्तक का जिक्र नहीं होता! क्योंकि वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, अष्टाध्यायी से लेकर गीतांजलि, सावित्री तक, सबकी सब महान पुस्तकें हिन्दुओं की हैं। भारतीय धरोहर के इस क्षेत्र में लोदियों, खिलजियों, मुगलों यहाँ तक कि हाल के सर सैयदों, जिन्नाओं तक का कहीं कोई योगदान नहीं बताया जा सका है। यदि गालिब और मीर हैं भी, तो उन की विचार-दृष्टि हिन्दुत्व प्रभावित थी – “कस्का खैंचा, दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया”। इसलिए इन्हें भी दिखाने लायक नहीं समझा जाता।

अतः चाहे भवन हों, चाहे स्थल, चाहे पुल या पुस्तकालय, कोई चीज ‘इंडियन कल्चर’ की धरोहर तभी हो सकती है जब उसमें मुस्लिम योगदान हो। अन्यथा वह इंडियन नहीं हुई। यह सब केवल एक कृत्रिम रूढ़ि को स्थापित करने के लिए कि भारत की संस्कृति ‘मिश्रित’ है, हिन्दू नहीं। इसीलिए यदि कोई चीज सिर्फ हिंदू कला, ज्ञान या संस्कृति की प्रतीक दिखती है, तो उसे प्रश्रय नहीं दिया जाएगा। उस की रक्षा तक की चिंता नहीं की जाएगी। जैसे, रामसेतु। तब उसे विश्व-धरोहर तो समझा ही कैसे जा सकता है!

आज के भारत में निजी जीवन से लेकर विदेश नीति तक, सेक्यूलरवाद हमारा दिशा-निर्देशक है। इसका मुख्य तत्व हिन्दू-विरोध या कम से कम हिन्दू-उपेक्षा ही दीख पड़ता है। मोई चीबा इसे नहीं समझ पाईं, इसीलिए उन्हें आश्चर्य हुआ था। किंतु देश के किसी सजग संस्कृति-प्रेमी को यह जान कर अजूबा नहीं लगा होगा कि हमारे अधिकांश सत्ताधारी केवल मुगल इमारतों को ही विश्व-धरोहर बनाने का आग्रह करते हैं। यही राजनीति-अनुकूल, पोलिटिकली करेक्ट है! कम से कम हमारे न्यायिकों को इस रोग से दूर रहना चाहिए।

Leave a Reply

9 Comments on "राष्ट्रीय धरोहर की चिंता : शंकर शरण"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
इंसान
Guest
भारत में सनातन हिंदू धर्म के साथ साथ देश को आदिकाल से बनी एक वैश्विक प्रयोगशाला के रूप में देखता हूँ| मुमताज बीबी के मकबरे के पत्थर ही थे जो नहीं बिके परंतु इस प्रयोगशाला में असंख्य हाड़ मांस के मिट्टी के पुतलों को भिन्न भिन्न ढांचों में ढलते देखा सुना है| विदेश से समाचार अथवा दिल्ली स्थित यूनेस्को की अधिकारी इस वैश्विक प्रयोगशाला का अभिन्न अंग ही तो हैं| दुर्भाग्य तो यह है कि इस वैश्विक प्रयोगशाला में अनुसंधानों से स्वदेशी जनसमूह लगभग अछूता रह अपना आस्तित्व ही खो बैठा है| ऐसे वातावरण में हम राष्ट्रीय धरोहर की व्यर्थ… Read more »
N K
Guest
श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक ( जो ‘पी. एन. ओक’ के नाम से प्रसिद्ध हैं और जो ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस’ की ‘आजाद हिंद फ़ौज’ में रहकर भारत के स्वाधीनता-संग्राम में भाग ले चुके हैं) ने “ताजमहल” के विषय में एक पुस्तक लिखी है जिसमें “ताजमहल” को वैज्ञानिक प्रमाणों द्वारा “भगवान शिव का मन्दिर” सिद्ध किया गया है इसके अलावा भी—– श्री पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अन्य अनेक पुस्तकें भी लिखी हैं | इन सभी पुस्तकों में भी यही सिद्ध किया गया है कि—- भारत देश के प्राय: सभी प्राचीन भवन हिन्दुओं द्वारा बनवाये गये थे और फिर जब बाद में… Read more »
इक़बाल हिंदुस्तानी
Guest

apkee bat ठीक है और इमारतों की भी मरम्मत को ऐसे ही नोतिसे लिया जाना चाहिए.

sunil patel
Guest
बिलकुल सही मुद्दा उठाया है श्री शंकर जी ने. हमारा दुर्भाग्य है की हमें हमारा सही इतिहास पढाया नहीं गया है. जब जो पढ़ा ही नहीं है, पढ़ने वाले ने भी नहीं पढ़ा है तो बताएगा कहाँ से. ऐसे में लोग जानकार कैसे होंगे. अस्वथामा का प्रसंग है की गरीबी में उनके माता पिता उन्हें आते का घोल यह कहकर पिलाते थे की यह दूध है. जब अस्वथामा ने एक बार पडोसी के यहाँ सच में दूध पिया तो उसे दोनों का अंतर पता चला. किन्तु भारत का दुर्भाग्य है की यहाँ तो एक व्यक्ति की पुरनी उम्र गुजर गई… Read more »
आर. सिंह
Guest

सरकार क्या करती है या क्या नहीं करती इस पर चर्चा के पहले मैं यह प्रश्न पूछना चाहता हूँ की हम हिन्दुओं ने अपनी धरोहरों को बचाने के लिए अब तक क्या किया ?

wpDiscuz