लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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दिव्यांशु कुमार

रवींद्र शाह के निधन की खबर सुनकर पहले तो यकीन नहीं हुआ। मेरी उनसे आखिरी बात अगस्त 2010 में हुई थी। दिल्ली से टीवी की नौकरी छोड़कर दैनिक भास्कर में काम करने रांची आ रहा था। उन्हें फोन किया, सर दिल्ली को बाय कह रहा हूं। सारी बात सुनकर बोले, जाओ पर दिल्ली को भूलने में मुश्किल होगी। उसके बाद रवींद्र शाह से बात नहीं कर पाया था। आऊटलुक में उनके जाने की जानकारी मिली। दिल्ली के एक समारोह में दोनों की नजर भी मिली पर बात नहीं हो पाई। रवींद्र शाह से मेरा परिचय नहीं था, रिश्ता था। जनमत टीवी में मेरे जिम्मे एक प्रोग्राम था आपका हक। शेखर सुमन इसकी एंकरिंग करते थे। हरसूद में नर्मदा के बांध और उससे होने वाली परेशानी को लेकर स्टूडियो में शूट कर रहे थे। गेस्ट कॉर्डिनेटर ने पैनल में रवींद्र जी को बुलाया था। यह बात है अक्टूबर 2002 की। यह मेरी उनसे पहली मुलाकात थी। बस इतना जान पाया कि इनकी हरसूद तीस जून के नाम से एक किताब आई है। कुछ दिनों के बाद एसवन चैनल नेशनल फॉमेर्ट में आ रहा था। एसएन विनोद सर से बात हो चुकी थी, अनुरंजन जी वहां ज्वाइन कर चुके थे। मुझे भी दो चार दिन में ज्वाइन करना था। अचानक पता चला कि चैनल हेड के तौर पर रवींद्र शाह नाम के कोई सज्जन आए हैं। एकदम से नाम अपरिचित सा लगा। विनोद सर ने कहा कि अब तो रवींद्र से ही बात करना तुम। मैंने मान लिया नौकरी नहीं मिलेगी।

दो चार दिनों में उमेश चतुर्वेदी जी से कहीं मुलाकात हुई। उनसे ऐसे ही चर्चा में कहा कि एसवन में बात हो गई थी, पर अब निजाम बदल गया है तो बात खत्म हो गई। उन्होंने सलाह दी की एक बार मिल लो। मैने कहा कि मेरा कोई परिचय है नहीं भैया। उनकी सलाह पर एसवन गया, मुझे पहली ही नजर में उनका चेहरा पहचाना सा लगा। इससे पहले कि मैं अपनी यादाश्त को जोर दे पाता, उन्होंने कहा यार जनमत पर क्या प्रोग्राम करते थे तुमलोग। फिर सबकुछ याद आ गया। उन्होंने कहा कि चलो मैं तुम्हें बताता हूं। एक हफ्ता बीत गया। मैं भी इस पूरे मामले को भूलता जा रहा था। एक दिन अपिरिचत नंबर से कई बार फोन आया। कुछ बेवकूफी कुछ अहंकार की वजह से मैंने फोन नहीं उठाया। शाम में उमेश भैया का फोन आया। बोले यार रवींद्र शाह तुमको फोन कर रहा है तुम उठा क्यों नहीं रहे हो। हड़बड़ाते हुए मैंने रवींद्र शाह को फोन किया। सर मैं दिव्यांशु बोल रहा हूं। सुनते ही बोले, सुनो कल सुबह से तुमको ज्वाइन करना है। मैं हैरान, कहा सर जहां काम कर रहा हूं, उसे तो बताना होगा।

कमसे कम दस दिन का समय दीजए। बोले, नहीं कल मतलब कल। अगर तुम्हारी सेलरी का नुकसान होगा तो मैं उसे एडजस्ट कर दूंगा। यूपी के चुनाव होने वाले थे।

मेरी पहली जिम्मेदारी शाह जी ने यूपी चुनाव के कॉर्डिनेसन की तय की। दो ओबी वैन जाना है। रिपोर्टर कौन होगा। सब तय किया। लेकिन इससे पहले की टीम लखनऊ के लिए निकलती, शाह जी ने सुबह बुलाकर कहा कल से तुम इनपुट देखोगे।

मैंने थोड़ी हिचक के साथ कहा, सर मुझे आऊटपुट पर रखते तो बेहतर होता। बोले, नहीं इनपुट पर ही काम करोगे। मात्र सोलह दिन आए हुए थे और मैं एसवन के इनपुट का इंचार्ज हो गया। इसबीच एसवन में जो पुराने लोग थे वो रवींद्र शाह के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। मालित विजय दीक्षित को उनके खिलाफ ज्ञापन तक दिए जा रहे थे। मेरे ऊपर रवींद्र शाह का आदमी होने का लेबल लग चुका था। सुबह से देर शाम तक वह आदमी ऑफिस में काम करता रहता। शाम को केबिन में बैठकर बिस्किट और मिक्सचर खाते वक्त वो मुझे आवाज लगाते। यही वो वक्त होता था जब मैं उनसे अनौपचारिक चर्चा करता था। आम धारणा के विपरीत कभी भी उन्होंने मुझसे किसी की शिकायत नहीं की। लोगों के झगड़े हों या साजिश, रवींद्र शाह ने कभी भी मुझसे किसी के खिलाफ कोई बात नहीं की। हमेशा कहते, देखो यह टीवी की कल्चर है। लोगों पर काम का प्रेशर इतना है कि इस तरह से विहेव करते हैं। पटना के ब्यूरो चीफ ने काम करना बंद कर दिया था। कैमरा लौटा नहीं रहे थे। रवींद्र शाह ने मुझे बुलाया, कहा सुबह की फ्लाइट से पटना जाओ। उस आदमी की जो भी डिमांड है उसे निगोशियेट करके मामला सलटाओ। पर देखना उसे नुकसान नहीं होना चाहिए। मैं जानता हूं कितने लोगों ने उनसे झूठ बोले। उनके खिलाफ साजिश की। जब भी मैं उनसे बात करता, कहते करने दो कोई फर्क नहीं पड़ता। रवींद्र शाह ने मुझे काम करने की पूरी आजादी दी। झारखंड में डायन समस्या हो या कल्पना चावला के अंतरिक्ष में जाने का मामला। एसवन चैनल एक राष्ट्रीय चैनल का स्वरुप ले रहा था। इसका पूरी श्रेय रवींद्र सर को है। मैं दिनभर खबरों की प्लानिंग करता, शाम को स्टूडियो से लाइव में खड़ा हो जाता। फिर एक दिन मुझे अपने केबिन में बुलाया, कहा कल से प्राइम टाइम पर तुम्हें एंकरिंग करनी पड़ सकती है।

एमडी साहब आज मिलेंगे। अगले दिन करीब बारह बजे। मेरे ऑफिस वाले फोन पर रवींद्र शाह बात कर रहे थे। शाम की प्लानिंग समझा रहे थे। मेरे पास उसवक्त कोई कोट नहीं था। कह रहे थे कि खरीद लो, ऑफिस से एडवांस ले लो।

मेरे दूसरे फोन पर राकेश कायस्थ जी की घंटी बजी। कहा, आज शाम आजतक जाकर राणा यशवंत से मिल लो। मेरे सामने दो रास्ते थे। एसवन में एंकरिंग करूं या आजतक जाऊं। मैंने रवींद्र शाह से कहा सर, आज भर छोड़ दीजए। कल संडे है परसों से आन स्क्रीन होउंगा। यह उनका एतबार था कि बोले कोई बात नहीं पर कोट आज ही खरीद लो। शाम को मैं आजतक के दफ्तर पहुंचा। नकवी जी से मुलाकात हुई। सोमवार से ही ज्वाइन करने का फरमान मिल गया। मैं समझ नहीं पा रहा था कि रवींद्र जी को क्या कहूंगा। संडे को मेरा वीकली ऑफ होता था। सोमवार की सुबह मैं देर से ऑफिस पहुंचा। इसबीच उनका फोन आया तो रिसीव नहीं किया।

फिर फोन स्विच ऑफ कर दिया। मुझे देखते ही भड़क गए, क्या कर रहे हो। फोन क्यों बंद कर दिया। मैंने सर झुका कर कहा, सर मैं इस्तीफा देने आया हूं।

पूछा कहां जा रहे हो। आजतक सुनते ही हाथ आगे बढ़ा दिया। चाय मंगाई। कहा इस्तीफा देने से पहले वहां ज्वाइन कर लो। चार महीने के दौरान मैं तुम्हें जान गया हूं। मैंने कहा सर आप ये मत समिझयेगा कि मैंने आपको धोखा दिया है। जो कुछ हुआ अचानक हुआ है। बोले, छोड़ो यार। इंज्वॉय करो। फिर कहने लगे, टीवी में काम करना हो तो आदमी को शादी नहीं करनी चाहिए। मैंने कहा कि सर आज से ही ज्वाइन करना है तो बोले ठीक है रात में घर पर आओ। मैं ग्यारह बजे रात उनके घर पर पहुंचा, उस वक्त रवींद्र जी अपने कपड़े साफ कर रहे थे। खाना बनाने का उन्हें शौक था। सब्जी और रोटी बनाई, मैं बीच बीच में मदद के लिए जाता तो डांट देते। कहते किसी दिन तुम्हारे घर पर आऊंगा तब काम करना। रात में सर ने अपनी और पत्नी के संबंधों को लेकर बातें बताई। इसके बाद महीने के अंतराल पर बातें होती रही, फिर साल हो गया। कहीं मुलाकात होती तो कहते, कहां बिजी रहते हो, कभी घर पर आओ। मैं हमेशा कहता कि सर किसी दिन आपसे नौकरी मांगने आऊंगा। आज रवींद्र सर होते तो कहते मैं तो फुर्सत में हूं तुम बताओ कब आ रहे हो।

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