लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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saarcडॉ. मयंक चतुर्वेदी

एशिया के आठ देशों का आर्थिक और राजनीतिक संगठन दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) इसीलिए बनाया गया था ताकि यह सभी देश निरंतर एक दूसरे का सहयोग करें।  अंतर्राष्ट्रीय अन्य संगठनों के सामने वैश्विक स्तर पर अपनी सशक्त भूमिका का निर्वहन कर सकें। लेकिन यथार्थ में हो क्या रहा है, इनमें से अधि‍कांश देश परस्पर सहयोग तो दूर की बात है आपस में छोटी-छोटी बातों पर भी एक मत नहीं हो पा रहे हैं। यदि आगे कुछ वर्षों तक यही हाल रहे तो कहना होगा कि 29 साल की उम्र पार चुके इस संगठन का भविष्य अंधकारमय है।

8 दिसम्बर 1985 को भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और भूटान ने  मिलकर जब इसकी स्थापना की थी। तब सभी ने संयुक्त रूप से यही सोचा था कि संगठन के सदस्य देशों की जनसंख्या को देखते हुए यह किसी भी अन्य क्षेत्रीय संगठन की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली होगा। आगे इससे अफ़ग़ानिस्तान भी जुड़ गया।  कालांतर में इन सभी देशों की सोच सही भी निकली, क्यों कि यही वह अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, जो दुनिया में पर्यावरण विविधता, मानव संसाधन से लेकर तमाम चीजों में अपनी विशि‍ष्ट पहचान बनाए हुए है। वस्तुत: इसके बाद भी यह संगठन आज दिनोंदिन अपनी गरिमा खोते जा रहा है। जिसे लेकर कहना होगा कि यह न केवल भारत के पक्ष में है बल्कि किसी दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन से जुड़े अन्य देश के लिए ही अच्छी स्थि‍ति मानी जा सकती है।

सबसे ज्यादा इस संगठन से जुड़े देशों के आपसी हित आज आपस में टकरा रहे हैं । भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी टीम और भारतीय विदेश नीति का आचरण हांलाकि सभी की एकजुटता के लिए प्रयत्नशील है, लेकिन क्या अकेले किसी एक के प्रयासों से परस्पर सामंजस्य बनाया जाना संभव है ? जबकि अन्य देश अपना-अपना राग अलाप रहे हों। वर्तमान का यक्ष प्रश्न यह है कि यदि यह सभी देश आपस में सहयोग नहीं करेंगे तो कैसे एशि‍या महाद्वीप में शांति की स्थापना की जा सकती है ? यहां एक देश भी किसी दूसरे का सहयोग न दे तो हालात किस तरह खराब हो सकते हैं इसका अंदाजा केवल दो देश भारत-पाकिस्तान के वर्तमान संबंधों को लेकर लगाया जा सकता है।

आज सीमा पर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का असर सार्क जैसे क्षेत्रीय संगठनों पर साफ दिखने लगा है। स्थि‍ति यह है कि पाकिस्तान अब सार्क से भी कन्नी काटता है। सर्वविदित है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभाली तो अपने भव्य आयोजन में सार्क को अहमियत देते हुए सभी सदस्य देशों के प्रमुखों को अपने शपथ ग्रहण में बुलाया था। 27 मई को प्रधानमंत्री मोदी से पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ ने मुलाकात में संबंध सुधार और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के इरादे और वादे किए थे। उस वक्त पाक के प्रधानमंत्री ने कहा कि वे भारत दोस्ती के उन धागों को जोड़ने आए हैं जो 1999 में टूट गए थे। शरीफ यहां तक बोल गए थे कि मैं हमारी दोस्ती को वहां से आगे बढ़ाना चाहता हूं जहां अटल बिहारी वाजपेयी ने छोड़ा था। हमें दोनों देशों की समानताओं को ताकत बनाना होगा।

शपथग्रहण के बाद हुई मुलाकात में व्यक्तिगत स्तर पर दोनों देशों के बीच बर्फ पिघलने लगी थी। मोदी ने शरीफ की मां के लिए शाल भेजा था तो दो जून को शरीफ ने मोदी को एक खत के साथ उनकी मां के लिए साड़ी भेजी थी। पत्र में नवाज शरीफ ने आशा व्यक्त की थी कि दोनों नेता सौहार्द के साथ सभी अनसुलझे मुद्दों को भी सुलझा लेंगे। हमारे प्रधानमंत्री ने भी सकारात्मक और आशावादी पत्र भेजा और कहा कि भारत शांति, सौहार्दपूर्ण और हिंसा मुक्त वातावरण में पाकिस्तान के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है।

उस समय मीडिया से शरीफ ने यहां तक कहा कि ” हम दोनों का मानना है कि शांति, मित्रता और सहयोग पर आधारित संबंध भारत-पाकिस्तान के युवाओं के लिए अवसरों और उम्मीदों का नया आकाश तैयार करेगा और पूरे क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी। संघर्ष और हिंसा से मुक्त वातावरण में हम मिलकर द्विपक्षीय संबंधों का नया युग शुरू करेंगे” इस पर भारत में प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच मधुर रिश्तों को बनाने से वह पीछे नहीं हटेंगे। शर्त सिर्फ शांति और हिंसा मुक्त वातावरण है। लेकिन, यह क्या ?  चंद महीने ही अभी गुजरे थे सीमा पर बिना कारण पाक सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी। अपने पड़ोसी को संयम की चेतावनी देने के साथ ही भारत ने भी इस अनायास दूसरी ओर से हो रही गोलीबारी का जोरदार जवाब दिया। भारत की जवाबी कार्रवाई को लेकर पाक की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिकायतें की गईं किंतु उसे कहीं से कोई खास समर्थन हासिल नहीं हुआ। आज इस बात का परिणाम यह है कि देखते ही देखते दोनों देशों के बीच सहयोग के इरादे तार-तार हो गए हैं।

पहले से ही दोनों देशों के बीच वाणिज्य-व्यापार, जल संसाधन के साथ आतंकवाद के मुद्दों पर लम्बे समय से वार्ताओं की कवायद लंबित है। सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन के कारण बढ़ी तल्खी और मुंबई आतंकी हमले के गुनहगारों को सजा के मोर्चे पर पाकिस्तान की सुस्ती भारत की खीझ बढ़ाती रही है। उस पर बेवजह पाकिस्तान की भारतीय सीमाओं पर गोलीबारी करने की हरकत ने स्पष्ट कर दिया कि मिया शरीफ का भारत आना सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने एक दिखावटी कूटनीति थी ताकि यह संदेश दिया जा सके कि पा‍क भी शांति का पक्षधर है। लेकिन आज विश्व समुदाय भारत का पक्ष ले रहा है। सार्क के सदस्य देशों में अधि‍कांश भारत के साथ संबंध सुधारों को लेकर पाकिस्तान की नीयत में खोट देखते हैं और हिन्दुस्थान के समर्थन में हैं। जिसके कारण पाकिस्तान अब धीरे-धीरे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन से कटने लगा है।

पिछले दो महीनों में भारत में हुई सार्क के ऊर्जा मंत्रियों और शिक्षा मंत्रियों की बैठकों में भाग लेने के लिए पाकिस्तान ने अपने मंत्रियों को नहीं भेजा। नवंबर के अंत में काठमांडू में सार्क का शिखर सम्मेलन होना है । पाकिस्तान का वर्तमान आचरण देखकर लग रहा है कि सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ काठमांडू ना जाएं और जाएं भी तो दोनों के बीच तल्खि‍यां बनी रहेंगी, इसलिए कि वहां भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे। यदि इसी तरह पाक अपने आचरण को बनाए रखता है तो कहना होगा कि आने वाले वक्त में सार्क का भविष्य अंधकारमय है।

 वस्तुत: भारत-पाकिस्तान यह दोनों ही देश दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन के अहम सदस्य हैं, इस तरह यदि इन देशों का आगे भी मनमुटाव बना रहा तो न केवल यह इन दोनों देशों के भविष्य के लिए अहितकर है बल्कि कहा जा सकता है कि यह पूरी दुनिया के लिए भी अशांति का कारण बना रहेगा। पाकिस्तान के इस तरह सार्क से दूरिया बढ़ाने को अन्य देशों को मिलकर रोकना चाहिए। यही आगे दक्षिण एशियाई क्षेत्र तथा शांति के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के हित में होगा।

 

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