लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनुष्य का जन्म क्यों होता है? हर प्रश्न के उत्तर की तरह इसका भी कोई उत्तर तो अवश्य होगा ही। इस प्रश्न के उत्तर पर विचार करने पर जन्म का साक्षात् कारण तो माता-पिता का होना प्रत्यक्ष दिखाई देता है। माता-पिता में कुछ प्राकृतिक वासनायें वा इच्छायें होती हैं जो सन्तान के रूप में परिणत होती है। महाभारत में श्री कृष्ण व उनकी एकमात्र धर्मपत्नी माता रूक्मणी में संवाद आता है कि श्री कृष्ण ने उनसे पूछा कि विवाह क्यों किया जाता है? इसका उत्तर उन्होंने दिया कि सन्तान की प्राप्ति की कामना या इच्छा से विवाह किया जाता है। स्वाभाविक है कि विवाह न हो तो सन्तान नहीं होगी और यदि सभी मनुष्य विवाह न करने का निश्चय कर लें तो आगामी 50 से लेकर 125 वर्षों में यह सारा संसार मनुष्यों से विहीन हो जायेगा। सन्तान माता-पिता से उत्पन्न तो अवश्य होती है परन्तु माता के गर्भ में सन्तान का निर्माण माता-पिता नहीं करते, वह कुछ प्राकृतिक नियमों के अनुसार होता है। यह सिद्ध नियम है कि कोई भी रचना या निर्माण किसी रचयिता या निर्माता के द्वारा ही होता है। रचनाकार व निर्माता हमेशा एक चेतन तत्व होता है। मनुष्य का आत्मा भी एक चेतन तत्व है। यदि वह है तो मनुष्य है और यदि शरीर में आत्मा न हो अर्थात् शरीर से निकल जाये तो शरीर का कुछ मूल्य नहीं होता। चेतन जीवात्मा ही शरीर को साधन के रूप में प्रयोग वा उपयोग करके नाना प्रकार के कर्म व क्रियायें कर रचना व निर्माण के कार्य करता है। कुछ रचनायें मनुष्य कर सकता है और कुछ नहीं। मनुष्य मिट्टी व पत्थर तथा आज उपलब्ध भवन सामग्री का उपयोग करके स्वयं वा अन्यों के सहयोग से अपने लिए इच्छित आवास बना सकता है। यह पौरूषेय रचना है। मनुष्यों के लिए जो कार्य करने सम्भव हैं वह सभी पौरूषेय रचनायें कही जाती हैं। वैज्ञानिकों ने कम्प्यूटर, मोबाईल, हवाई जहाज, रेल आदि उपयोगी यन्त्रों आदि का निर्माण किया है, अतः यह सभी पौरूषेय रचनायें हैं। हम सूर्य, चन्द्र, पृथिवी व आकाश में तारागण समूह को देखते हैं। कोई मनुष्य या देश इनको बनाने का दावा नहीं करता और न ही भविष्य के लिए कोई योजना है। यह रचनायें अपौरूषेय रचनायें है जिन्हें एक सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान व चेतन सत्ता ही करती है। यह बात अलग है कि अतिसूक्ष्म, सर्वव्यापक व निराकार होने के कारण वह हमें आंखों से दिखाई न देती हो। वही चेतन तत्व, ईश्वर, परमात्मा, जगदीश्वर, स्रष्टा वा सृष्टिकत्र्ता आदि अनेक नामों से जाना जाता है। उसी ईश्वर ने माता-पिता में सन्तान उत्पन्न करने की भावना या वासना उत्पन्न की हुई है। इसी से यह सन्तान को जन्म देते हैं परन्तु सन्तान के शरीर व उसके सभी अवयवों को बनाता परमात्मा ही है।

 

अब यह देखना है कि परमात्मा को यह संसार बनाने व मनुष्य आदि प्राणियों को जन्म देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका उत्तर है कि परमात्मा का स्वयं तो अस्तित्व है ही, इसके साथ ही एक इतर चेतन तत्व जीवात्मा जिनकी संख्या मनुष्य के ज्ञान में अनन्त हैं, का भी अस्तित्व ब्रह्माण्ड में है। इन दो तत्वों के अतिरिक्त एक जड़ तत्व प्रकृति भी सदा से ब्रह्माण्ड में विद्यमान है। यह तीनों अनादि तत्व परस्पर इस अनन्त परिमाण वाले ब्रह्माण्ड में विद्यमान है। ईश्वर अनुत्पन्न, अनादि, अजन्मा, नित्य, अवनिाशी, अमर, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान चेतन सत्ता है। जीवात्मा चेतन तत्व, अणु मात्र, अत्यन्त सूक्ष्म, अजन्मा, अनुत्पन्न, अविनाशी, अमर, नित्य, कर्मो का कर्ता व फलों का भोग करने वाली सत्ता है। यह सर्वज्ञ न होकर अल्पज्ञ, ससीम, एकदेशी है और कर्म करने में स्वतन्त्र तथा फल भोगने में ईश्वर के वश में है अथवा परतन्त्र है। चेतन तत्व में ज्ञान ग्रहण करने के साथ कर्म व क्रिया करने का गुण भी होता है। प्रकृति जड़ तत्व है जिससे जड़ पदार्थ यथा सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, तारा समूह सहित अग्नि, जल, वायु, आकाश का सृजन हो सकता है। जीवात्मा अपनी चिन्मय अवस्था में कोई कार्य नहीं कर सकता। प्रकृति भी जड़ होने से ईश्वर के आश्रित है। ईश्वर का स्वरूप ऐसा है कि वह  अनादि काल से सृष्टि की रचना करता आया है। उसने इस सृष्टि से पूर्व असंख्य या अनन्त बार इसी प्रकार की सृष्टि की रचना कर उसका सफलता पूर्वक संचालन किया है। अपने उसी स्वभाव व अन्य गुणों व सामर्थ्य के कारण उसने इस कल्प में भी इस सृष्टि को रचा है तथा उसका पालन व संचालन कर रहा है। जीवात्मा अकेले सब मिलकर भी स्वयं सृष्टि की रचना संचालन नहीं कर सकते और स्वयं इच्छानुसार जन्म ले सकते हैं। ईश्वर के सामने जीवात्मायें एवं प्रकृति है। जीवात्माओं को पूर्व जन्मों में किये गये संचित व अभुक्त कर्मों के अनुसार फल देना है। अतः उसे सभी जीवों को उनके प्रारब्ध, अभुक्त वा संचित कर्मों के अनुसार सुख व दुःख के उपभोग के लिए उन्हें जन्म देना होता है। जीवों का यही प्रारब्ध ही सभी मनुष्यों अन्य प्राणियों के जन्म का कारण हुआ करता है। अतः ईश्वर मनुष्य व प्राणियों के वृद्ध होने एवं पूर्व प्रारब्ध का कुछ व अधिकांश भाग भोग लेने पर नियमों के अनुसार प्रत्येक योनि में रहने वाले जीवात्माओं को मृत्यु प्रदान करता है। मृत्यु के पश्चात पुनः उनके प्रारब्ध के अनुसार उन्हें अनेकानेक जीव-योनियों में से उनकी पात्रता के अनुसार निष्पक्ष व न्यायकारी राजा के रूप में सुख व दुःखों का उपभोग करने के लिए किसी एक योनि में जन्म देता है। इस प्रकार हमें मनुष्य का जन्म क्यों होता है? इसका उत्तर मिल गया है। यही सत्य है और यही इस प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर है। नान्यः पन्था विद्यते अयनाय।

 

अब मनुष्य जीवन के उद्देश्य पर विचार करते हैं। पहला उद्देश्य तो प्रारब्ध का भोग है। इसके अतिरिक्त मनुष्य योनि, कर्म व फल भोग योनि, उभय योनि है जो हमारे लिए प्रत्यक्ष है। हमारे पास धन है। एक जरूरतमन्द व्यक्ति हमारे सामने धन की याचना करता है। हमें भी इच्छा होती है कि उसकी सहायता करनी चाहिये। हमारे मन में अनेक प्रकार के विचार आते हैं। लोभ की प्रवृत्ति हमें उसकी सहायता करने से रोकती है। परमार्थ के बारे में सोचते हैं तो दान का फल सुख-शान्ति व जीवन की उन्नति होता है। अब हम सोच विचार कर निर्णय करते हैं। कुछ व्यक्ति जिनकी संख्या आजकल कम है, परमार्थ को महत्व देते हैं और अधिकांश लोभ के वशीभूत होकर उस व्यक्ति को सहायता करने में असमर्थता व्यक्त करते हैं। इस प्रकार से हम शुभ व अशुभ कर्म करते हैं। इन कर्मों का फल ईश्वर से मिलता है। यदि हम निःस्वार्थ भाव से परमार्थ के काम करते हैं तो हमारे पुण्य एकत्रित होते रहते है। जीवन में आने वाले कष्टों को अपने पूर्व कर्मों का भोग मानकर यदि हम प्रसन्नता पूर्वक सहते हैं तो इससे हमारे पूर्व के अशुभ कर्मों का भोग हो जाता है। इस प्रकार से हमारे पुण्य कर्मों का खाता बढ़ता है और अशुभ या पाप कर्मों का खाता घटता है। इससे हमारा प्रारब्ध बनता है और इस जन्म व परजन्म में उन्नति अर्थात् उच्च योनि में जन्म का प्राप्त होना निश्चित होता है।

 

मनुष्य योनि में हमारे सामने एक विकल्प और भी है। वह है कि हम सृष्टि व सृष्टिकर्ता को जानकर ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना मे भी पर्याप्त समय व्यतीत करें। साथ ही साथ ईश्वर ज्ञान वेद और वैदिक साहित्य का स्वाध्याय व अध्ययन करें। ईश्वर की उपासना वा ध्यान का कार्य यदि ज्ञान, बुद्धि व वेदसम्मत हो तो इससे भी हमारा प्रारब्ध बनता है। इससे ईश्वर से मित्रता व निकटता हो जाती है। जीवात्मा के गुण, कर्म व स्वभाव का सुधार होता है। निरन्तर स्तुति, प्रार्थना, उपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र का अनुष्ठान व अन्य सभी वैदिक कर्तव्यों व कर्मों को करके हम आत्मा की उन्नति को प्राप्त होते जाते हैं। उपासना का परिणाम ईश्वर के ज्ञान में निरन्तर वृद्धि से ईश्वर की निकटता बढ़ती जाती है। उपासना का परिणाम समाधि होता है और असम्प्रज्ञात समाधि उपासना की सर्वोत्कृष्ट अन्तिम स्थिति है जिसमें ईश्वर का साक्षात्कार होता है। इस अवस्था में ईश्वर अपने स्वरूप का यथार्थ व वास्तविक स्वरूप उपासक के सम्मुख प्रस्तुत करता है जिससे जीवात्मा व उपासक कृत्य-कृत्य हो जाता है। शास्त्रों में उदाहरण मिलते हैं कि एक पतिव्रता स्त्री जिस प्रकार अपने स्वरूप को अपने पति पर प्रकाशित करती है वैसा ही ईश्वर अपने उपासक पर असम्प्रज्ञात समाधि में अपने स्वरूप का प्रकाश कर निभ्र्रान्त ज्ञान करता है। इस अवस्था को प्राप्त होने के बाद उस उपासक वा जीवात्मा को कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। इस अवस्था का परिणाम मोक्ष की प्राप्ति है। इसका अर्थ है कि भावी समय में मृत्यु होने के पश्चात मनुष्य जन्म व मरण के चक्र से छूट कर मोक्ष को प्राप्त होता है। यह मोक्ष 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों की अवधि का है जिसमें जीवात्मा बिना किसी योनि में जन्म लिए ईश्वर के सान्निध्य में रहकर असीम सुखों का भोग करता है। इसका विस्तृत विवरण सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थों में देखा जा सकता है जो सभी मनुष्य के लिए अवश्यमेव पठनीय है। इससे मनुष्य जन्म का उद्देश्य वैदिक कर्मों को करके मुक्ति प्राप्त करना भी सिद्ध होता है।

 

लेख को विराम देने से पूर्व कुछ चर्चा धर्म की भी कर लेते हैं। धर्म क्या है? धर्म उन कर्तव्यों के पालन करने का नाम है जिससे यह जीवन अभ्युदय या उन्नति को प्राप्त हो और मृत्यु होने पर जीवात्मा को मोक्ष प्राप्त हो। क्या इन कर्तव्यों का बोध कराने वाला संसार में कोई ग्रन्थ है? इसका उत्तर है कि चार वेद और इसके अनुकूल वैदिक साहित्य जिसमें 11 उपनिषद्, 6 दर्शन, प्रक्षेप रहित मनुस्मृति, सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रन्थ हैं, को पढ़कर धर्म अर्थात् मनुष्यों के कर्तव्यों को जाना जा सकता है एवं जीवन के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ ही इस लेख को विराम देते हैं।

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