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-प्रवीन कुमार भट्ट

तीन सौ सालों की राजशाही और लगभग एक दशक के हिंसक माओवादी संघर्ष के बाद अब नेपाल लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। माओवादियों द्वारा राजशाही को अपदस्थ करने के बाद मई 2008 में नेपाल को फेडरल डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ नेपाल घोषित किया गया। 3 करोड़ की आबादी वाला यह देश दुनिया का यह सबसे युवा लोकतंत्र है. उत्तर में चीन और बाकी दिशाओं में भारत से घिरे नेपाल का क्षेत्रफल 1,47,181 वर्ग किमी है।

चीन के रास्ते नेपाल पहुँचे सफल माओवादी आंदोलन के बाद अब नेपाल में निर्वाचित संविधान सभा, संविधान निर्माण के काम में लगी हुई है। इस दौरान नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना करते हुए माओवादी नेता पुष्प कुमार दहल ‘प्रंचड’ ने सरकार बनाई लेकिन अन्य दलों से अंर्तविरोधों के कारण उनकी सरकार टिकाऊ नहीं रही। अब उदारवादी वामपंथी माधाव कुमार नेपाल प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे हैं। लोकतंत्र की स्थापना के साथ ही नेपाल में लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की मांग भी जोर पकड़ रही है।

एक लोकतांत्रिक इकाई के रूप में नेपाल 14 अंचलों (मंडल) और 75 जिलों में बंटा हुआ है। देश में इन इकाईयों का गठन राजशाही के समय में ही किया गया था। अब लोकतंत्र समर्थक यहां और अधिक राजनैतिक विकेन्द्रीकरण की मांग कर रहे हैं। जिस प्रकार भारत एक राष्ट्र के बाद 28 राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों में बंटा है। फिर इन राज्यों के भीतर मंडल, जिले और अन्य इकाईयां बनाई गयी हैं। जबकि नेपाल राष्ट्र के भीतर एक भी राज्य नहीं है जबकि देश को 14 अंचल (मंडल) और 75 जिलों में बांटा गया है। अब धीरे-धीरे नेपाल के भीतर अलग-अलग स्थानों से राज्य बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। इसी के अनुरूप राजनैतिक दल भी अपने -अपने फायदे के हिसाब से राज्य गठन की पैरवी कर रहे हैं। एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ने नेपाल में 13 राज्य बनाने का प्रस्ताव किया है। इसी तरह नेपाली कांग्रेस चाहती है कि देश में 14 राज्यों को गठन किया जाय. प्रजातंत्र राप्रपा की मांग है कि नेपाल में 4 राज्य बनाये जायें जबकि मघेसी जन अधिकार फोरम केवल मघेस राज्य के निर्माण के पक्ष में है।

नेपाल में लोकतंत्र की बयार के बाद देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी राज्य गठन की मांग हो रही है इसी कढ़ी में उत्ताराखंड की सीमा से लगे नेपाल के सीमांत पश्चिमी भाग के लोग भी दो अंचलों सेती और महाकाली को मिलाकर पश्चिमांचल राज्य बनाने की माँग कर रहे हैं। नेपाल के कुछ प्रवासी और स्थानीय संगठनों ने सुदूर पश्चिमांचल राज्य बनाने की मांग बुलंद कर दी है। अंतराष्ट्रीय एकता मंच, सुदूर पश्चिमांचल जागरण मंच, सुदूर प्रवासी पश्चिमांचल संपर्क मंच और सुदूर पश्चिमांचल एकता मंच मिलकर देश के अंदर और बाहर पश्चिमांचल राज्य के पक्ष में जनमत जुटाने में लग गये हैं।

अंतर्राष्ट्रीय एकता मंच के संयोजक महेश बराल कहते हैं, ”माओवादियों ने सरकार बनाने के बाद सेती और महाकाली अंचल को मिलाकर पश्चिमांचल राज्य बनाने की बात कही थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद माओवादियों ने इस दिशा में काम नहीं किया।” नेपाल को 13 राज्यों में बांटने के माओवादियों के प्रस्ताव से महेश बराल सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि भले ही माओवादी आंदोलन जातिवाद और क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर चलाया गया हो लेकिन राज्य गठन के लिए तैयार किये गये मसौदे में माओवादी अपने सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करने में चूक गये हैं। माओवादियों ने 13 राज्यों के गठन का प्रस्ताव तैयार किया है लेकिन ये प्रस्ताव देश को जाति, धार्म और क्षेत्रवाद के आधार पर बाँटने वाला है।

असल में माओवादियों ने पश्चिमांचल राज्य के लिए जो प्रस्ताव तैयार किया है उसके अनुसार सेती अंचल से कैलाली और महकाली अंचल से कंचनपुर जिलों को हटाकर थारूआन राज्य में मिलाया जायेगा। माओवादियों का प्रस्ताव है कि पांच मैदानी जिलों को मिलाकर थारूआन राज्य का गठन किया जायेगा। अंतर्राष्ट्रीय एकता मंच के केन्द्रीय कमेटी सदस्य दुर्गा दत्ता बड़ो कहते हैं, ”कंचनपुर और कैलाली को हटाकर अगर पश्चिमांचल राज्य का गठन किया गया तो वह एक अपंग राज्य होगा।” बड़ो कहते हैं अलग राज्य के नाम पर जिस तरह से पहाड़ और मैदान को लड़ाने की कोशिशें हो रही हैं इससे अंतत: नुकसान तो नेपाली जनमानस का ही होगा। जिस तरह माओवादी सेती अंचल के कंचनपुर जिलों के साथ तीन अन्य जिलों को जोड़कर थारूआन राज्य बनाने की बात कर रहे हैं। इससे तो जातीय आधार पर राज्यों की लड़ाई और तेज हो जायेगी। जबकि राज्य गठन के पीछे मुख्य मांग पश्चिमांचल क्षेत्र का पिछड़ापन है। ऐसा नहीं है कि कंचनपुर और कैलाली में थारू बहुतायत से रहते हैं। कंचनपुर में केवल 20 और कैलाली में 40 प्रतिशत थारू रहते हैं ऐसे में अलग थारू प्रदेश के नाम पर इन जिलों को पश्चिमांचल से अलग करने का क्या तुक है। कैलाली और कंचनपुर पश्चिमांचल क्षेत्रा के तराई जिले हैं। यहां खाद्यान्न बड़ी मात्रा में पैदा होता है। जबकि सेती और महाकाली अंचलों के शेष 7 जिले पहाड़ी हैं।

काठमांडू से बेतड़ी और दार्चुला तक नेपाल के विभिन्न हिस्सों में घूम-घूमकर पश्चिमांचल राज्य के लिए आंदोलन तैयार कर रहे सुदूर पश्चिमांचल जागरण मंच के संयोजक पुष्कर राज जोशी कहते हैं, ”पश्चिमांचल राज्य का गठन दो अंचलों सेती और महाकाली के 9 जिलों को ही मिलाकर किया जाना चाहिए। इसमें से दो जिलों कंचनपुर और कैलाली को हटाकर पश्चिमांचल की कल्पना नहीं की जा सकती।”

सुदूर प्रवासी पश्चिमांचल संपर्क मंच दिल्ली के संयोजक बीर बहादुर बोरा का कहना है, ”पश्चिमांचल को राज्य बनाने की मांग के पीछे हमारा तर्क यह है कि यह क्षेत्रा सीमावर्ती होने के साथ ही दुर्गम भी है। राजधानी से दूर होने के साथ ही राजनैतिक दलों और प्रशासन की दृष्टि भी इस क्षेत्रा पर नहीं पड़ी है।” सेती और महाकाली अंचल नेपाल के सीमावर्ती अंचल हैं। भारत और चीन की सीमा से लगे इस पहाड़ी भाग में शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधााओं का नितांत अभाव है.

दो अंचल, नौ जिलों से घिरे 19, 845 वर्ग किमी क्षेत्रफल के सुदूर पश्चिमांचल क्षेत्र की आबादी 26 लाख है। पश्चिमांचल राज्य का गठन कर यहां बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया जाय तो रोजगार और उत्पादन की असीमित संभावनाएं हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां फलोत्पादन, जड़ी-बूटी विकास और जलविद्युत परियोजनाओं के रूप में अनंत संभावनाएं हैं। साथ ही अगर सरकार सार्वजनिक संपत्तियों सड़क, विद्यालय, अस्पताल, दूरसंचार सुविधाओं आदि का विस्तार करती है तो इससे भी रोजगार सृजित होगा। सीमावर्ती और दुर्गम होने के कारण यह क्षेत्र बुनियादी विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ है और रोजगार के लिए पलायन यहां की मुख्य समस्या है। इस क्षेत्र से प्रतिवर्ष लाखों मजदूर मौसमी बेरोजगारी के कारण देश के तराई व उत्तार भारत के विभिन्न भागों में पलायन करते हैं। अगर इस क्षेत्र से पलायन करने वाले इन मजदूरों को स्थानीय स्तर पर ही बुनियादी विकास के काम में लगाया जाय तो पश्चिमांचल की तस्वीर बदल सकती है। राज्य गठन की मांग कर रहे संगठनों का कहना है पश्चिमांचल को सिर्फ राज्य बनाने से यहां का विकास नहीं होगा इसे दुर्गम और विशेष राज्य का दर्जा दिया जाय। पश्चिमांचल के अंतर्गत आने वाले 9 में से सात जिले पहाड़ी हैं और विकास की दृष्टि से पिछड़े हुए हैं। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण सामरिक दृष्टि से भी नेपाल का यह भूभाग संवेदनशील है। संगठनों की मांग है कि इस क्षेत्र को विशेष आर्थिक पैकेज दिया जाय ताकि यहां बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करने के साथ ही पलायन को रोका जा सके। पश्चिमांचल राज्य के सवाल दिल्ली से काठमांडू तक एकजुट हो रहे आंदोलनकारियों ने राज्य गठन को लेकर देश के अंदर व बाहर एक साथ आंदोलन चलाने का मन बनाया है।

सुदूर पश्चिमांचल जागरण मंच के संयोजक पुष्कर राज जोशी जहां काठमांडू से दार्चुला तक घूम-घूमकर जनमत जुटा रहे हैं, वहीं दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में इस सवाल पर जागरूकता की जिम्मेदारी सुदूर प्रवासी पश्चिमांचल संपर्क मंच दिल्ली के हाथों में है। यह संगठन दिल्ली से इस मांग को लेकर आंदोलन चला रहा है। कैलाली स्थित सुदूर पश्चिमांचल एकता मंच के संयोजक गंगा दत्ता ओझा कैलाली के तराई भागों में राज्य आंदोलन का मोर्चा संभाल रहे हैं। नेपाल की सीमा से लगे पिथौरागढ़ जिले से आंदोलन की कमान अंतर्राष्ट्रीय एकता मंच के हाथों में है। यह संगठन नेपाल और भारत की सीमा से लेकर दिल्ली और काठमांडू तक लोगों को आंदोलन से जोड़ने का काम कर रहा है। संगठन के संयोजक महेश बराल कहते हैं, ”राज्य का निर्माण उसकी अवधारणा के अनुरूप ही होना चाहिए इसके लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जायेगा। संगठन ने आगामी माह में धारचूला से कंचनपुर तक रथयात्रा का कार्यक्रम घोषित किया है।”

सुदूर पश्चिमांचल एकता मंच के संयोजक गंगा दत्ता ओझा का कहना है, ” इस क्षेत्र के बुनियादी विकास के लिए बेरोजगारी पर रोक लगाना और पलायन को रोकने के लिए सुविधाओं का विस्तार करना बेहद जरूरी है।” बुनियादी सुविधाओं से वंचित पश्चिमांचल का यह भूभाग संभावनाओं से भरा हुआ है।

नेपाल और भारत में फल फूल रहे सुदूर पष्चिमांचल राज्य के इस आंदोलन का भविष्य क्या होगा यह कहना अभी जल्दबाजी है लेकिन नेपाल की सीमा से लगे क्षेत्रों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा। उत्तर भारत के उत्ताराखंड, हिमाचल, उत्तार प्रदेष जैसे राज्यों में जहां अनेक निर्माण और कृषि कार्यों में नेपाल से आये मजदूर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। उत्ताराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले छोटे-छोटे विकास कार्य हों या यहां बनने वाली बड़ी-बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं, या फिर हिमांचल के सेब बागानों का काम, इसी तरह उत्तार प्रदेष की औद्योगिक इकाईयों और खेतों में भी नेपाल से आये मजदूर बहुतायत से काम करते हैं। ऐसे में यदि सुदूर पष्चिमांचल राज्य का गठन होता है तो उत्तार भारत की आर्थिकी निष्चित ही प्रभावित होगी। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत और नेपाल की सीमा में प्रस्तावित पंचेष्वर बांधा का निर्माण भी सुदूर पष्चिमांचल की सीमा में ही होना है। ऐसे में सुदूर पष्चिमांचल राज्य की मांग कर रहे संगठनों का कहना है कि पंचेष्वर बांधा के निर्माण के सभी पहलूओं पर धयान दिया जाना चाहिए। इतनी बड़ी परियोजना के निर्माण में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए। सुदूर पष्चिमांचल के लिए निकाली जा रही यात्राओं में राज्य गठन के साथ ही पंचेष्वर भी अहम सवाल है।

अब जबकि नेपाल में लोकतंत्र के अंकुरित होते ही उसकी जड़ें गहरी होने लगी है। अलग- अलग स्थानों से उठ रही राज्यों के गठन की मांग इसकी बानगी भर है। लेकिन राजशाही के पतन के बाद वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच चल रहा संघर्ष देश को किस दिशा में ले जायेगा नेपाल में लोकत्रंत का भविष्य भी इसी बात से तय होगा।

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