लेखक परिचय

उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। संपर्क: द्वारा जयप्रकाश, दूसरा तल, एफ-23 ए, निकट शिवमंदिर कटवारिया सराय, नई दिल्ली – 110016

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उमेश चतुर्वेदी

दिल्ली विश्वविद्यालय में चारों प्रमुख सीटों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जीत हाल के दिनों में विधानसभा चुनावों में बुरी तरह मात खा चुकी भारतीय जनता पार्टी के लिए राहत भरी खबर है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा बीजेपी के लिए जेएनयू में एक ही सीट का ज्यादा प्रतीकात्मक महत्व है। जिस विश्वविद्यालय में एक दौर में मुरली मनोहर जोशी के कार्यक्रम का तब विरोध हो रहा हो, जब वे मानव संसाधन विकास मंत्री थे, संस्कृत विभाग की स्थापना के वक्त ही उसका विरोध हो रहा हो, उस विश्वविद्यालय के छात्रसंघ में एबीवीपी की जीत कहीं ज्यादा बड़ी है। भगवा खेमे के लिए यह जीत क्यों बड़ी है और इसके क्या प्रतीकात्मक महत्व हैं, इस पर विचार करने से पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों की बदलती प्रवृत्तियां और विश्वविद्यालय के बाहर जाते ही विचारधारा के प्रति आ रहे बदलावों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

दिल्ली जैसे कास्मोपोलिटन शहर में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सही मायने में कास्मोपोलिटन संस्कृति का प्रतीक है। इस विश्वविद्यालय में देश के कोने-कोने के अलावा दुनिया के तमाम देशों के भी छात्र पढ़ते हैं। जाहिर है कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में मार्क्सवाद की पूछ और परख लगातार कम होती जा रही है। उदारीकरण की आंधी ने मार्क्सवादी विचार को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई है। इसके बावजूद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय मार्क्सवादी विचारधारा का गढ़ रहा है। इसकी स्थापन से ही यहां की छात्र राजनीति पर वर्षों से लगातार मार्क्सवादी विचारधारा के दलों के छात्र संगठनों का कब्जा रहा है। अतीत में मशहूर समाजवादी विचारक और कार्यकर्ता आनंद कुमार और पूर्व रेल राज्य मंत्री स्वर्गीय दिग्विजय सिंह जैसे समाजवादियों और कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ यानी एनएसयूआई को छोड़ दें तो यहां की छात्र राजनीति में वामपंथी विचारधारा का दबदबा रहा है। नब्बे के दशक में भारतीय जनता पार्टी के उभार के बाद इस विश्वविद्यालय में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा वाले छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिशें तेज तो की, लेकिन उसे सिर्फ एक बार 2000 में संदीप महापात्रा के तौर पर महज एक वोटों से अध्यक्ष पद पर जीत हासिल हुई थी। लेकिन एबीवीपी को बाद में इस लाल दुर्ग में इतना समर्थन हासिल नहीं हुआ कि वह संदीप महापात्रा की जीत जैसा इतिहास दुहरा सके। इन अर्थों में देखें तो 2015 के छात्र संघ चुनावों में एबीवीपी के सौरभ कुमार शर्मा की संयुक्त सचिव पद पर 28 वोटों से जीत भगवा खेमे की धमाकेदार जीत के तौर पर ही मानी जाएगी।

dusuवाम विचारधारा के प्रति अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कई छात्र जाने जाते हैं। भारतीय वामपंथी राजनीति के शीर्ष पुरूष प्रकाश करात और सीताराम येचुरी के साथ ही नेपाल के पूर्व राष्ट्रपति बाबूराम भट्टराई वाम विचारधारा के जीवंत प्रतिनिधि हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह रही कि अब भारतीय जनता पार्टी से जुड़े छात्र संगठन को भी भी वाम खेमे के इस अभेद्य समझे जाने वाले दुर्ग में भी समर्थन हासिल होने लगा है। इसे समझने के लिए यहां के छात्रों की विश्वविद्यालय में रहते वक्त की गतिविधियों और यूनिवर्सिटी से बाहर निकलने के बाद की उनकी महत्वाकांक्षाओं की तरफ ध्यान देना होगा। वाम विचारधारा के समर्थन में विश्वविद्यालय में पढ़ते वक्त तक गला फाड़-फाड़कर और ढोल-मजीरे बजा-बजाकर समर्थन करने वाले छात्रों को विश्वविद्यालय से बाहर निकलते ही वामधारा के ठीक विपरीत विचारधारा वाले जीवन दर्शन को आत्मसात करने में कोई परहेज नहीं रहा। भारतीय राजनीति में कहा भी जाता है कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पोषित वाम विचारधारा की छात्र राजनीतिक का आखिरी लक्ष्य कांग्रेक की राजनीति है। कांग्रेस की राजनीति में कई ऐसे चेहरे आपको मिल जाएंगे, जिन्होंने अपनी छात्रावस्था में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वाम विचारधारा की छात्र राजनीति की थी। इन अर्थों में आप कह सकते हैं कि जेएनयू की वामपंथी छात्र राजनीति कांग्रेसी राजनीति की नर्सरी रही है। लेकिन जब भी यहां भगवा खेमे की सभा-प्रदर्शन की बात की जाती रही, समूचा छात्र वर्ग इसके विरोध में उठ खड़ा होता रहा। जेएनयू में एक और चलन था, अगर कोई छात्र भगवा खेमे के खिलाफ खड़ा नहीं होता तो उसे गैर प्रगतिशील और सांप्रदायिक मान लिया जाता। लेकिन जब यहां के छात्रों को यह समझ में आने लगा कि भले ही विश्वविद्यालय की सीमाओं के अंदर लोग प्रगतिशील बनते हों और बात-बात में मार्क्स को दुहाई देते हों, लेकिन जिंदगी की दौइ में जब असली पटरी पर आते हैं तो उनका कदम दूसरी तरफ ही बढ़ता नजर आता है तो छात्रों की आंखों पर प्रगतिशीलता का मजबूरीवश लगा चश्मा धीरे-धीरे उतरना शुरू हो गया। उसका ही नतीजा है कि इस बार सौरभ शर्मा को जीत हासिल हुई हौ  अध्यक्ष पद के प्रत्याशी को भी 928 वोट हासिल हुए हैं। और तो और, वामपंथियों के गढ़ स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में काउंसलर के पद पर भी एबीवीपी ने जीत हासिल की है।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मजाक में एक कहावत कही जाती है, या तो अमेरिका या फिर मुनिरका। यहां यह बता देना जरूरी है कि जेएनयू का मुख्य दरवाजा ठीक मुनिरका के सामने ही खुलता है। कहने का मतलब यह है कि जेएनयू की पढ़ाई का मकसद अमेरिका या यूरोप की अच्छी नौकरियां हासिल करना है। अगर कामयाबी नहीं मिली तो फिर मुनिरका में रहना और शाम को जेएनयू के मशहूर गंगा ढाबे पर जुटना और चाय पर देश की समस्याओं पर शास्त्रार्थ करना ही यहां के छात्रों का काम रह जाता है। हालांकि सुनील भाई जैसे लोग भी इसी विश्वविद्यालय से निकले, जिन्होंने इटारसी के पास मछुआरों के बीच काम किया और वहीं समाजवादी जिंदगी गुजारते हुए अपने प्राण त्याग दिए। लेकिन ऐसे उदाहरण कम मिलेंगे। फिर सवाल यह है कि इस विश्वविद्यालय को यूटोपीयन केंद्र की तरह ही बनाकर क्यों रखा जाय। अकादमी शोध और गहन अध्ययन के लिए इस विश्वविद्यालय की मान्यता रही है। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि करदाताओं की गाढ़ी कमाई का जितना हिस्सा इस विश्वविद्यालय पर खर्च होता है, देश के शायद ही किसी दूसरे विश्वविद्यालय पर खर्च होता हो। कुछ साल पहले जब कपिल सिब्बल मानव संसाधन विकास मंत्री थे तो दिल्ली की ही जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में देशभर के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक हुई थी। उस वक्त सिब्बल ने सभी कुलपतियों से अपने विश्वविद्यालयों को जेएनयू की तरह बनाने की अपील की थी। तब माखन लाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने सवाल उठा दिया था कि क्या बाकी विश्वविद्यालयों को उतने ही पैसे और सहूलियतें मिलेंगी, जितनी जेएनयू को मिलती है। जाहिर है कि इस सवाल का जवाब सिब्बल के पास नहीं था। जाहिर है कि जितना जेएनयू पर खर्च होता है, उसका फायदा देश को सही मायने में नहीं मिल पाता है। इसे अब छात्र भी समझने लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वामपंथी छात्र राजनीति का छद्म अब सामने लगा है और यह सामने आना ही अब जेएनयू में बदलाव का जरिया बन रहा है। इसीलिए वामपंथी समर्थन छीज रहा है और एबीवीपी की तरफ समर्थन बढ़ रहा है। इन अर्थों में देखें तो जेएनयू में बदलाव अवश्यंभावी है। लेकिन सवाल बड़ा है कि क्या इसके लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इस बदलाव का फायदा उठाने के लिए कितना तैयार है।

 

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