लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य

एक दिन में सिमट आए हैं सारे रिश्ते

फिर साल भर पा लो संबंधों से मुक्ति

युगों-युगों से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति के लिए यह समय कितना दुर्दिनों भरा आ गया है जहाँ आदमी के मन से लेकर पूरे परिवेश तक संवेदनाआंे के लिहाज से शून्य का माहौल है।

मानवीयता के भयंकर ह्रास होते चले जाने के वर्तमान दौर में मानवीय संवेदनाओं की कल्पना भी करना बेमानी होता जा रहा है। जड़ वस्तुओं के साथ जितनी संवेदनाओं के भाव मुखरित हो रहे हैं उतने चेतन के साथ नहीं। व्यक्ति, परिवार, समाज और क्षेत्र की यह जड़ता हमें आखिर कहाँ ले जाएगी ? इसका किसी को कोई अंदाजा नहीं है।

एक-दूसरे को सहयोग तथा सहकार के भावों की बात हो या सामूहिक विकास की, हर कहीं हमारी क्षुद्र ऐषणाएं बाधक बनी हुई मानवीय मूल्यों का निरन्तर भक्षण कर रही हैं। पुरातन मूल्यों और आदर्शों की बलि चढ़ने लगी है और ऐसे में रिश्तों की बुनियाद इस कदर हिलती नज़र आ रही है जैसे कोई आधुनिकता का कोई भूकंप सर उठा रहा हो।

रिश्ते इस तेजी से साथ गिरते जा रहे हैं कि हम उन संबंधों की भी कद्र करना भूल गए हैं जिनकी हमारे जीवन के लिए अन्यतम अहमियत है। रिश्ते या चाहे मन के हों, तन के हों या खून के। हर क्षेत्र में गिरावट आती जा रही है।

पाश्चात्य चकाचौंध की रोशनी में हम पूरी तरह अँधे होते जा रहे हैं। इस मामले में हम सभी हदों को पार कर चुके हैं। जिन लोगों का हमारी पूरी जिन्दगी में सर्वोच्च स्थान है उनसे लेकर हम उन सभी को हाशिये पर लाते जा रहे हैं जिनके बगैर हमारे अस्तित्व की कोई कल्पना तक नहीं की जा सकती।

माता-पिता या गुरु हों अथवा और कोई अपना आत्मीयजन। इन सबके प्रति हमारी पारंपरिक श्रद्धा और आस्थाएं डगमगा गई हैं क्योंकि हमारे जीवन का ध्येय मानवीयता से पलट कर अब मुद्रार्चन और स्वार्थ सिद्धि मात्र रह गया है। जो काम चोर-उचक्कों और तस्करों के लिए था वह हम अपनाते जा रहे हैं।

उल्लू परंपरा की जड़ें अब इतनी गहरी हो चली हैं कि हमें पैसों और अपने मतलब के सिवा कुछ और सूझता ही नहीं है। इस लक्ष्य के सामने हमें अपने माता-पिता और गुरु, भाई-बंधु आदि स्वजन या पुरजन दिखते ही नहीं, इनसे आत्मीय व्यवहार की बात तो दूर है।

ये सारे रिश्ते हम अब सिर्फ औपचारिकता निर्वाह के लिए करने के आदी हो गए हैं। औपचारिकताओं को निर्वाह भी हो जाए, किसी को बुरा भी नहीं लगे और बोझिल संबंधों में खटास भी न आए, इसके लिए अब हमने अपने लोगों को अलग-अलग दिनों में एक-एक दिन के लिए बांध दिया है ताकि उस दिन उनके लिए जो थोड़ा-बहुत करना चाहिए, कर लिया जाए फिर साल भर उनसे एकदम मुक्ति।

हमने अपने आपको पैसे कमाने की मशीन और घर भरने वाले मजूर के रूप में स्थापित कर दिया है। आत्मकेन्द्रित स्वार्थ की इस अंधी दौड़ में हम पूरी जिन्दगी संवेदनहीनता और पशुता भरे कामों में लगा कर उस मानवीय संस्कृति को भी धिक्कारने लगे हैं जिसकी कल्पना सृष्टि से रचयिता ने कभी की थी।

कहाँ तो आदमी के बाद आदमी का सृजन होता रहा, और कहाँ हम धनसंग्रह के कोठारों में ढलते जा रहे हैं। आदमी की जो कल्पना सदियों से चली आ रही है वह आज कितनी सही है? इसके सारे पैमाने ध्वस्त हो चले हैं।

पश्चिम के रास्तों पर चलते हुए हम अंधों और वज्रमूर्खों ने इसीलिए फादर्स डे, मदर्स डे, टीचर्स डे आदि को अपना लिया है। जिन लोगों को जीवन में हर क्षण आदर और सम्मान देना चाहिए, उन सभी को रोजाना सम्मान के झंझट से मुक्ति पाने का इससे बढ़िया रास्ता कोई और हो भी नहीं सकता था।

विदेशियों की तर्ज पर इन फला-फला डे मनाने का जो रास्ता हमने इख़्तियार कर लिया है उसने हमारी विकृत और शूद्र मानसिकता को अच्छी तरह प्रकटा दिया है। हम उन सभी संस्कारों को तिलांजलि दे चुके हैं जो युगों से हमारे गोत्र, वंश और सम्प्रदाय-समुदाय में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे हैं और इन संस्कारों ने ही हमें अपनी संस्कृति, मातृभूमि और वंशवृक्ष से जोड़े रखा है अन्यथा फिर हममें और पशुओं में क्या अन्तर बचा रह गया है? इससे तो अच्छा होता हम लंकाधिपति के राज में पैदा होते जहां सब कुछ था। और वह भी उन्मुक्त, स्वच्छन्द। हर प्रकार की स्वेच्छाचारिता का खुला खेल खेलने को हम स्वतंत्र होते। आज हम अपने क्षेत्र को लंका के रूप में देखने का दुस्साहस करने लगे हैं।

जिन माता-पिता के रक्त से हमारा निर्माण हुआ, उन्हें जीवनपर्यन्त पूज्य भाव से आदर देने की बजाय एक दिन फादर्स डे और एक दिन मदर्स डे रखकर हम कितने खुश हो रहे हैं। मनुष्य की इस दुर्भाग्यशाली वर्तमान दशा पर न हँसी आ सकती है न रोना। जिन गुरुओं ने हमें पढ़ा-लिखा कर पशु से इंसान के साँचे में ढाला, उनके लिए एक दिन का टीचर्स डे मनाकर हम कहाँ का अहसान चुका रहे हैं? इससे हमारी गुरु पूर्णिमा क्या कम है? आधे आसमाँ के रूप में प्रसिद्ध स्त्री जिसे माता सहित विभिन्न किरदारों में आदर-सम्मान प्राप्त है उसे हमने वूमन डे में सिमटा कर रख दिया है। इसी प्रकार फ्रैण्ड्सशिप डे ही वह दिन है जब हम मित्रों को खुश रखने के सारे प्रयास कर देते हैं, फिर साल भर के लिए राम-राम।

प्रेम, मोहब्बत और प्यार मनुष्य की रग-रग में बसा होना चाहिए तभी वह संसार भर के प्रति मैत्री, करुणा और प्यार का बर्ताव कर सकता है। लेकिन अब यह उतना प्रगाढ़ रहा नहीं कि साल भर इसकी आपूर्त्ति होती रहे, इसके लिए अब हमने वेलेन्टाईन डे मनाना आरंभ कर दिया है। अलौकिक त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज की वाणी है – ‘प्रेम तु ही ने प्रेम स्वामी, प्रेम त्यां परमेश्वरो।’ पर अब वो निश्छल प्रेम है कहाँ? अब प्यार उसी से रहता है जो कुछ दे सकता है या जिससे हमारा कोई स्वार्थ पूरा होता है।

यही नहीं तो हमने प्रकृति और परिवेश से जुड़े तमाम कारकों को भी एक-एक दिन में बांध लिया है। पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष और गर्भ से लेकर मृत्यु तक मनुष्य के जिन-जिन से संबंध होते हैं उन सभी को हमने एक-एक दिन दे डाला है ।

हमारे पास फुर्सत ही कहाँ है जो साल भर आदर-सम्मान दे सकें या उनके बारे में चर्चा कर सकें जिनसे हमारा परोक्ष या अपरोक्ष वास्ता है। यही कारण है कि हमने सारे संबंधों को एक-एक दिन की अवधि में समेट कर रख दिया है जैसे बौनसाई, चाहे फिर वह रिश्ता कुटुम्ब या आत्मीयजनों से हो अथवा प्रकृति और परिवेश से।

संबंधों के महासागर से अंधे कूओं की ओर बढ़ रहे हमारे डग कहाँ जाकर रुकेंगे और आत्मचिन्तन या मनन करेंगे, यह तो भविष्य की बात है लेकिन इतना जरूर है कि हमने अपने मानवीय गुणों और सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ों से कट कर वह स्थिति तो ला ही दी है कि जहाँ हमारा अपना कहने को कोई नहीं बचा है। संबंधों को भले ही हम ढोते चले जाएं और दिवस मनाने का आडम्बर कर लें।

अभी भी हम नहीं सुधरे तो हो सकता है सामाजिक क्रांति का शंखनाद हो, और तब हमारी आने वाली पीढ़ी भी हमें इतिहास की बजाय एक दिन या एक-दो घण्टों में सिमटा कर रख देगी। और तब होगा नालायक डैडी डे, दुष्ट मॉम डे, टयूशनखोर टीचर अवर, ब्लेकमेल मैन्स डे, वेलेन्टाइन अवर, नेताजी डे, आफिसर्स डे, करमचारी डे, बाबू डे, हरामखोर डे, नुगरा डे, नाकारा डे, निकम्मा डे, ब्लेकमेलिंग डे, चोर-उचक्का-डकैत डे, भ्रष्टाचार डे, रिश्वत डे, बकवास डे, आवारा डे, तस्करी डे, माफिया डे ….. आदि आदि।

और तब हमारे अपने कुकर्मों का जिस हिसाब से प्रशस्तिगान उस दिन होगा, तब नरक के किसी कोने में पड़े हुए या दुनिया में कहीं न कहीं पशु योनि में विचरण करते हुए हमें अपने मनुष्य जीवन की याद जरूर आएगी जो हमें अपने कुकर्मों से शायद ही फिर कभी नसीब हो पाए। तभी कहा गया है – समंदर से नाता तोड़ लिया था जिस दिन तुमने, तभी हमने समझ लिया था अँधा कूआ हो गए हो।

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