लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह

ऐसे तो धर्म की आड़ में व्यापार हमेशा होता आया है,अतः यह कोई नयी बात नहीं,पर यहाँ तो धर्म की आड़ में जुर्म हुआ है, अतःइसका शीर्षक होना चाहिये था धर्म और जुर्म.आज मेरे सामने दो समाचार हैं. दोनों धर्म की आड़ में जुर्म से संबंधित हैं.

पहला समाचार यों है,

१९८७ में जब ब्रिज बिहारी ८४ वर्ष का था तो उस पर हत्या करने का दौरा पड़ा और उसने अपने सम्बन्धियों के साथ मिल कर बहुत से लोगों की हत्याएं कर दी. कारण केवल यही था की उसको एडी चोटी का जोर लगाने पर भी उस इलाके के जगन्नाथ मन्दिर का महंत नहीं बनाया गया. उस पद को प्राप्त करने के लिए उसनेअपने ढंग से शायद तपस्या भी की थी. मांसाहारी से पूर्ण शाकाहारी बन गया था ८४ वर्ष की उम्र तक पहुचने में उस सपने को साकार करने के लिए उसने न जाने कितने और पापड़ बेले थे. फिर भी उसको महंत के पद पर प्रतिष्ठित होने का अवसर नहीं मिला. वह इसको वर्दास्त नहीं कर सका और तब चला था हत्याओं का दौर.आज वह १०८ वर्ष की उम्र में हवालात से बाहर आया है.यह तो हुई एक साधारण व्यक्ति की कहानी जोअपने ढंग से उच्च पद पर आसीन होना चाहता था और निराशा ने उसे जुर्म की दुनिया में पहुँचा दिया.

अब हम एक नजर दूसरे समाचार पर डालें.

दूसरा समाचार है हमारे ख्याति प्राप्त और चमत्कारी स्वर्गीय सत्य साईँ बाबा के बारे में ,जिनको उनके भक्त ईश्वर का दर्जा देतें हैं.ऐसे तो हमारी परम्परा कहती है कि किसी मृतक की आलोचना उचित नहीं है,पर जब मृत प्राणी ख्याति नामा हो तो उसका सही मूल्यांकन उसके मरणोंप्रांत ही हो सकता है.यह तर्क मेरे विचार से जितना अर्जुन सिंह जैसे नेता के लिए मान्य है उतना ही तथाकथित भगवान् के लिए.

समाचार है कि सत्य साईँ बाबा के निजी कमरे से ९८ किलोग्राम सोना,३०७ किलोग्राम चांदी और ११.५६ रूपये नगद निकले. समाचार के अनुसार इसका कहीं कोई व्योरा उपलब्ध नहीं है.अभी हो सकता है कि ऎसी अन्य छुपाई हुई सम्पतियाँ भी सामने आये. यह सब क्या है?यह भी तो काला धन ही है.अगर कोई कहे कि यह धन तो उनके चमत्कार द्वारा उत्पन्न हुआ है तो उस हालत में भी इस धन को सामने लाना स्वर्गीय सत्य साईँ बाबा का कर्तव्य था. मैं तो खैर ऐसे चमत्कारों पर विश्वास करता ही नहीं

मेरे ख्याल से तो स्वीश या विदेशों के अन्य बैंकों में जमा काले धन और इसमें या इसी तरह देश के किसी भी हिस्से में छिपाए हुए धन में कोई अंतर नहीं है.

ये दोनों कारनामें चूंकि धर्म की आड़ में किये गये हैं अत: इसका महत्व और बढ़ जाता है.

दोष किसको दें?

क्या यह हमारे पूर्ण चरित्र पर एक प्रश्न चिह्न नही बन जाता?

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13 Comments on "धर्म या व्यापार?"

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swamisamvitchaitanya
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धर्म जीवन है व्यापार नहीं जब तक आपके जीवन में धर्म का बहना नहीं होगा तब तक आप कैसे समझ पायेगे आओ धर्म को धारण करके धर्ममय जीवन जिए

आर. सिंह
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श्रीमान तिवारी जी, किसी को तो निडर होकर इनका भंडाफोड़ करने के लिए आगे आना होगा,नहींतो इनके तथाकथित भक्त खुद भी काला धन जमा करते जायेंगे और उसके लाभांश से इन्हें भी लाभान्वित करते जायेंगे.मुश्किल यही है की जहां किसी ने इन ढकोसले बाजों के खिलाफ कुछ कहा की इनके अंध भक्त उसको भी ब्रैंड करना शुरू कर देंगे औरउस पर अनाप शनाप शब्दावलियों की बौछार भी i शुरू हो जायेगी.

श्रीराम तिवारी
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sabhi dharmon ke thekedaron ne akoot sampatti jamaa kar rahki hai.janta or sarkaar dono hee in dharam ke pakhandee babaon se darte hain.ye ganda hai pr dhanda hai.

आर. सिंह
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मैंने अपनी ओर से तो केवल यह लिखा है की “मेरे ख्याल से तो स्वीश या विदेशों के अन्य बैंकों में जमा काले धन और इसमें या इसी तरह देश के किसी भी हिस्से में छिपाए हुए धन में कोई अंतर नहीं है.” मैंने तो कभी नही* कहा की बाबाओं को गरीब होना या गरीब दिखना आवश्यक है?मैं तो केवल यही कहता हूँ^ की यह भी एक व्यापार या पेशा है और इसमें भी पारदर्शिता उतना ही आवश्यक है जितना अन्य व्यापार और पेशों में.मेरे जैसे लोग मानते हैं की इन धार्मिक व्यापारों में बहुत ज्यादा कालाधन मौजूद है ,और… Read more »
एल. आर गान्धी
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चाणक्य ने कहा है की बिना धन के मनुष्य पशु समान है. इस लिए खूब मेहनत से धन अर्जित करना चाहिए और अपनी आवश्यकता से अधिक धन सुपात्र को दान कर देना चाहिए – अनुचित ढंग से धन संचित करना पाप है – यह निर्धन लोगों के मुंह का निवाला छिनने के समान पाप है.

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