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आनंद सुब्रमण्यम शास्त्री

धर्म, मनुष्य को अपने विचारों के प्रति निष्ठावान रहते हुए सबके विचारों को महत्व एवं आदर देने का उपदेश देता है। धर्म मनुष्य को सम्बन्धों के सम्यक निर्वाह के लिए नैतिक मूल्यों की रक्षा का आदेश देता है। धर्म मनुष्य को सम्यक् आचरण के पालन के लिए कर्म को कर्त्तव्य समझकर करने का संदेश देता है।

अधिकार’ का सम्बन्ध ‘सिद्धांत’ की रक्षा से, दायित्व का सम्बन्ध ‘रिश्तों’ के सम्यक निर्वाह से और कर्त्तव्य का सम्बन्ध सत्ता के सम्यक आचरण से जुड़ा है।

जिससे अंत सिद्ध हो उसे सिद्धांत कहते हैं। इस सम्पूर्ण चराचर सृष्टि का अंत ‘सत्य’ से और ‘सत्य’ में सिद्ध हुआ है। इसलिए ‘सिद्धांत’ की रक्षा कहने का अर्थ है, ‘सत्य की रक्षा।’

‘धर्म’ ने मनुष्य को सिद्धांत की रक्षा अर्थात् ‘सत्य’ की रक्षा का अधिकार प्रदान किया है।

हालांकि ‘सत्य’ एक है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप उसके स्वरूप को कहता है और समझता है। हर व्यक्ति को अपने विचारों के अनुरूप ‘सत्य’ को कहने और समझने का अधिकार है। विचारों के अनुरूप ‘सत्य’ को कहने और समझने के अधिकार को ‘वैचारिक स्वतंत्रता’ कहते हैं। धर्म ने मनुष्य को वैचारिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है जो इस सम्पूर्ण सृष्टि में किसी अन्य साकार सत्ता को प्राप्त नहीं है।

धर्म द्वारा प्रदत्त, प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त, वैचारिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हनन अन्याय कहलाता है। इस प्रकार का अन्याय आज धार्मिक क्षेत्र में सक्रिय मठाधीशों तथा तथा उनके अनुयायियों का स्वभाव बन गया है।

हर व्यक्ति का अपने विचारों के अनुरूप सत्य को कहने और समझने का मौलिक अधिकार उसी क्षण खंडित होता है, जब वह अपने विचारों की प्रतिष्ठा के दुराग्रह में दूसरों के विचारों का हनन करने लगता है। ‘स्वंय’ को ठीक कहने और समझने का अधिकार सबको है। पर किसी को गलत कहने का अधिकार और समझने का अधिकार किसी को नहीं है। जैसे ही हम किसी को गलत कहते और समझते हैं, तुरंत हम स्वयं ‘गलत’ हो जाते हैं। ऐसी ‘गलती’ आज हममें से अधिकांश कर रहे हैं।

धर्म द्वारा प्रदत्त और प्रतिष्ठित वैचारिक स्वतंत्रता का सर्वाधिक हनन साम्यवादी विचार धारा ने किया है। साम्यवादी विचारधारा के अंतर्गत व्यक्तिगत विचारों का न कोई मूल्य है और न कोई महत्व। लेकिन यह भी सच है कि वैचारिक स्वतंत्रता को खोकर मनुष्य या तो पशु बन जाता है या यंत्र।

विचारयुक्त, किंतु संवेदनहीन सत्ता को ‘यंत्र’ कहते हैं। संवेदनशील, किंतु विचारहीन सत्ता को पशु कहते हैं। आज वैचारिक स्वतंत्रता के अधिकार को खोकर अधिकांश मनुष्य या तो यंत्र बन रहे हैं या पशु।

धर्म ने जहां एक ओर मनुष्य को वैचारिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया है वहीं दूसरी ओर नैतिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व भी उसको सौंपा है।

दायित्व का संबंध रिश्तों के सम्यक निर्वाह से जुड़ा हुआ है। रिश्तों के सम्यक निर्वाह के लिए, नैतिक मूल्यों की रक्षा आवश्यक है।

मनुष्य से ‘पशु या यंत्र’ बनते ही उससे अनायास ही नैतिक मूल्यों की हत्या होने लगती है। वैचारिक स्वतंत्रता में खोए हुए आधुनिक मनुष्य के जीवन में नैतिक मूल्यों की रक्षा का कोई महत्व नहीं है। इस प्रकार आज मनुष्य अधिकारहीन होने के साथ ही दायित्वहीन भी हो रहा है।

कर्त्तव्य का संबंध सत्ता के सम्यक आचरण से जुड़ा हुआ है। सम्यक आचरण उस आचरण को कहते हैं, ‘जिससे सिद्धांत की रक्षा हो।’ सिद्धांत की रक्षा कहने का अर्थ है, ‘सत्य की रक्षा।’ सत्य की रक्षा के लिए कर्म को ‘कर्त्तव्य’ कहते हैं।

सत्य की रक्षा के ध्येय से किया गया प्रत्येक कर्म कर्त्तव्य बन जाता है।

आज अधिकांश मनुष्य प्रत्येक कर्म, परिणाम प्राप्ति के ध्येय से कर रहे हैं। परिणाम के लिए किया गया कर्म, ‘व्यापार’ कहलाता है। व्यापार में सौदा किया जाता है। सौदे में लाभ-हानि का ध्यान रखना पड़ता है। अर्थात् कर्म के व्यापार बनते ही लाभ-हानि का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। जब मनुष्य का कर्म, लाभ-हानि के चक्कर में पड़ जाता है तो सत्य की रक्षा गौण हो जाती है। मनुष्य के जीवन में सत्य की रक्षा गौण होते ही कर्त्तव्यहीनता की स्थिति पैदा हो जाती है।

धर्म ने मनुष्य को वैचारिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया, नैतिक मूल्यों की रक्षा का दायित्व साैंपा और कर्म को ‘कर्त्तव्य’ समझकर करने की प्रेरणा दी।

आज कर्म की सम्यक अवधारणा के कुंठित हो जाने के कारण, मतांतरों के उलझन में फंसकर मनुष्य वैचारिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को खोकर, मूल्यों की रक्षा के दायित्व से मुक्त होकर कर्त्तव्यहीन जीवन जी रहा है। ऐसी स्थिति से त्राण पाने का एकमात्र उपाय यह है कि देश के बुद्धिजीवी, मनुष्य को प्राप्त वैचारिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को पहचाने, नैतिक मूल्यों की रक्षा के दायित्व को समझें और कर्म को कर्त्तव्य को समझकर करने का प्रयास करें।

धर्म, मनुष्य को अपने विचारों के प्रति निष्ठावान रहते हुए सबके विचारों को महत्व एवं आदर देने का उपदेश देता है। धर्म मनुष्य को सम्बन्धों के सम्यक निर्वाह के लिए नैतिक मूल्यों की रक्षा का आदेश देता है। धर्म मनुष्य को सम्यक् आचरण के पालन के लिए कर्म को कर्त्तव्य समझकर करने का संदेश देता है।

आज प्रत्येक भारतीय का कर्त्तव्य है कि वह धर्म के उपदेश, आदेश और संदेश पर ध्यान दे।

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1 Comment on "धर्म का अधिकार, दायित्व एवं कर्त्तव्य"

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B K Sinha
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शास्त्री जी धन्यवाद आपके इस लेख के लिए . आप जिस धर्म की बात कर रहे हे वह व्यवहारिक धर्म है जब क़ि धर्म से जिस बात का बोध होता है वह यह नहीं है जहाँ तक विचारणा का सम्बन्ध है वह तो जगी आँखों का स्वप्न मात्र है जब हम विचार करते है तो सजग नहीं रहते हम किसी सिधांत या नियम से परिचालित हो कर एसा करते है सिधांत तो समय सापेक्ष है जो बार बार अपने को शोधित करता है और उसे ऐसा करना भी चाहिए आपकी बात एक हद तक तो ठीक है क़ि विचार करने… Read more »
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