लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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शरीर पर महज आधी धोती लपेटने वाले मोहनदास करमचंद गांधी जिसकी सादगी, साफगोई, अहिंसा के आगे वह ब्रितानी सरकार नतमस्तक हुई थी, जिसके बारे में कहा जाता था कि अंग्रेजों की सल्तनत में कभी सूरज नहीं डूबता। विडम्बना से कम नहीं है कि उसकी सादगी का सरेआम माखौल उड़ाते हुए एक फिरंगी कंपनी ने 11 लाख 39 हजार रूपए के सोने के फाउंटेन पेन (स्याही वाला पेन) बाजार में उतार दिया है।

यह निंदनीय है कि बापू के जन्मदिवस के एक दिन पहले लांच किए गए इस पेन को महात्मा गांधी की डांडी यात्रा से जोड़ दिया गया है। कंपनी ने लगभग साढ़े ग्यारह लाख के 241 पेन को ”महात्मा गांधी लिमिटेड एडीशन – 241” एवं सस्ती दरों वाले एक लाख 67 हजार के 3000 पेन भी बाजार में उतारे हैं।

देश को आजाद कराने में अपनी महती भूमिका अदा करने वाले साबरमती के संत के नाम का भौंड़ा प्रदर्शन देश में अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के गवाह बने ताज होटल में किया गया, जिसमें उनके प्रपोत्र तुषार गांधी को बुलाकर इस आयोजन को प्रासंगिक बनाने का कुत्सित प्रयास किया गया।

तुषार गांधी इस आयोजन में क्यों गए इस बात को वे ही बेहतर जानते होंगे, हमारे मतानुसार सादगी की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी के नाम पर इस तरह विलासिता का बाजार लगाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। लग तो यही रहा है कि उक्त कंपनी ने बापू के नाम पर इस पेन को बेचने के लिए उनके वारिसान का इस्तेमाल किया है, जो अनुचित ही है।

यह बात उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात, कि बापू ने आज के राजनेताओं की तरह सादगी का प्रहसन नहीं किया था। बापू ने सादगी दिखावे के लिए नहीं अपनाई थी। बापू जब वायसराय लार्ड इरविन से मिले थे तब उनकी एक लंगोटी को देखकर चर्चिल ने उन्हें ”अधनंगा फकीर” की उपाधि तक दे डाली थी। इन सब तानों से बापू कभी व्यथित नहीं हुए।

आज बापू किसी परिवार विशेष की संपत्ति नहीं हैं। मोहन दास करमचंद गांधी को समूचा देश राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित करता है। देश की मुद्रा पर भी बापू की ही मुस्कुराती तस्वीर है। आम भारतीय बापू का नाम बड़ी ही श्रद्धा के साथ लेता है। भारत सरकार को चाहिए कि इस कदम का विरोध कर भारत में बापू के नाम पर लाखों के पेन की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाए।

बापू को ब्रांडनेम के तौर पर इस्तेमाल करना हमारे लिए असहनीय ही है। वैसे तो अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, रानी मुखर्जी, काजोल अपने आप में एक ब्रेंडनेम बन चुके हैं। इन चेहरों का व्यवसायिक इस्तेमाल कर उत्पादक अपने उत्पदों को अधिक से अधिक बेचकर ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना चाहता है।

किन्तु जब बात बापू की आती है तो बापू के नाम का व्यवसायिक उपयोग आसानी से पचाने वाली बात नहीं है। बापू के नाम को देश के कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की नियत से खादी ग्रामोद्योग भंडार, गांधी आश्रम, हस्तशिल्प आदि में सरकारी तौर पर बापू के नाम का उपयोग किया जाना समझ में आता है, पर जब बात डेढ़ लाख से साढ़े ग्यारह लाख के स्याही वाले पेन की हो तब तो विचार करना अत्यावश्यक ही है।

ग्राम स्वराज का नारा बुलंद करने के साथ ही बापू ने विदेशी वस्तुओं का परित्याग कर स्वदेशी अपनाने की मुहिम चलाई थी। बापू खुद ही सूत कातकर कपड़ा बुनना जानते थे। बापू की सादगी का आलम यह था कि वे अपना संडास भी खुद ही साफ करने में विश्वास रखते थे।

इस मामले में केंद्र सरकार से कुछ उम्मीद करना बेमानी ही होगा क्योंकि जिस बापू ने कहा था राष्ट्रभाषा हिन्दी ही समूचे देश को एक सूत्र में पिरो सकती है, उसी केंद्र सरकार के महिला बाल विकास विभाग द्वारा ”हिंसा रहित भारत अन्याय रहित जिंदगी” शीर्षक से जारी विज्ञापन में सत्तर फीसदी इबारत अंग्रेजी भाषा में ही लिखी हुई है। गौरतलब होगा बापू के जन्म दिन पर यह विज्ञापन जारी किया गया है, बापू को समूचा विश्व इतना सम्मान देता है कि उनकी याद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 02 अक्टूबर को अहिंसा दिवस मनाया जाने लगा है।

सादगी और संयम की मिसाल बन चुके महात्मा गांधी आज अगर जिंदा होते तो क्या वे इस सोने के पेन से लिखने का उपक्रम करते, जाहिर है नहीं। फिर भारत सरकार किसी विदेशी कंपनी को लाखों की कीमत वाले पेन के व्यवसायिक उपयोग के लिए बापू को ब्रांड एम्बेसेडर बनाने के अधिकार परोक्ष तौर पर जाने अनजाने कैसे दे सकती है?

-लिमटी खरे

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