लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’ 

4.jpgप्रवक्ता डॉट काम हिंदी वेब पोर्टल के पांच वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में आयोजित सम्मान समारोह में देश विदेश से आये 16 सम्मानित लेखकों सहित अन्य देश के वरिष्ठ मीडियाकर्मियो से मिलने का अवसर भाई संजीव सिन्हा जी के प्रयास के कारण हासिल हुआ।

कार्यक्रम में जिस प्रकार से देश विदेश से सैकड़ों की तादात में आये लेखकों की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी रही कार्यक्रम को पूर्ण रूप सफल कहा जा सकता है। किन्तु ‘न्यू मीडिया और जनसंवाद’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी को मैं पूरी तरह सफल नहीं कह सकता क्योंकि वक्ताओं ने पूरी ईमानदारी से इस विषय पर जिस प्रकार से अपने विचार प्रकट किये वो कम से कम मेरे गले नहीं उतर पाये। क्योकि कहीं से कही तक भी सम्मानित वक्ताओं ने न्यू मीडिया और जन संवाद के अर्थ और इस के प्रथम पहलू छूआ और न ही उपस्थित श्रोताओ को अपने तर्क से सहमत किया। मसलन श्री राहुल देव जी ने जिस मां के दूध और अफ्रीका के कुपोषित बच्चों का जिक्र किया वो विषय न्यू मीडिया का नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये तब की बात थी जब न्यू मीडिया का जब जन्म ही भी नही हुआ था।

एन.के.सिंह जी ने कोशिश की विषय को छूने की किन्तु वो भी राखी सावंत और सचिन के चक्कर में ठीक उसी तरह उलझ गये जिस तरह आजकल हमारे न्यूज चैनलों को और कोई काम नहीं है। जयदीप कार्णिक तो पूरा का पूरा विषय लैपटॉप में लेकर छात्रों को जैसे समझाते हैं, वैसे समझाने लगे। दरअसल होना ये था कि आज न्यू मीडिया के गिरते स्तर पर चर्चा के साथ मीडिया से दूर होते आम विषय और देश का आम आदमी ’’न्यू मीडिया और जन संवाद’’ विषय का चर्चा का मुद्दा होना चाहिये था। और इलैक्टोनिक्स और प्रिंट मीडिया के उन व्यापारियों पर चर्चा होनी चाहिये थी जिन लोगो के कारण आज का मीडिया एक प्रकार से आम आदमी के दुख दर्द को सरकार और जनप्रतिनिधियों के कानों तक पहुचाने के बजाए एक नंगी तहजीब को व्यापार के नाम पर हमारे बेड रूम तक ले आया है इस विषय को भी विचार गोष्ठी का विषय बनाया जा सकता था कि आज किस प्रकार हमारे देश के बडे बडे चैनलों ने बाबाओं, राजनेताओं, सिगरेट, शराब, मफियाओं से लाखों-करोड़ों के विज्ञापन लेकर किस प्रकार से देश की गरीब जनता को बेवकूफ बना कर ये लोग चंद ही सालों में एक मामूली आदमी से आज 500 सौ करोड़ और उस से भी अधिक संपत्ति के मालिक बने बैठे है। क्या ये लोग न्यू मीडिया के लिये खतरा नहीं है। क्या खतरा सिर्फ इस बात से है कि आज हम लोग खेत में लोटा लेकर जाते हैं तो हमारे हाथ में एक बडा मोबाईल होता है। या ये सब से बडा खतरा है कि कोई दुबई में बैठ कर आसानी से नेट पर कोई एक पिक्चर या फोटो डालकर हिंदुस्तान में झगड़ा करा सकता है। नहीं बिल्कुल नहीं बल्कि बदलते समय और बदलती सोच और पैसे की चकाचैध के कारण आज पत्रकारिता के क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन गिरावट आ रही है देष के लोकतंत्र का मजबूत चैथा स्तम्भ कहा जाने वाला पत्रकारिता का क्षेत्र भी अब इस भ्रष्टाचार से अछूता नही रहा। आज पैसे की चमक ने पत्रकारिता के मिषन को व्यवसाय बना दिया। ये ही कारण है कि आज देष में भ्रष्टाचार के कारण हाकाहार मचा है। महंगाई आसमान छू रही है। राजनेता, अफसर देश को लूटने में लगे है और गुण्डे मवाली, सफेद खद्दर में संसद भवन में पिकनिक मना रहे है। आम आदमी की समस्या और उस की आवाज को पूंजीपतियों, राजनेताओं, अफसरों के बडे बडे विज्ञापनों ने पैसे के बल पर मीडिया के जरिये उठने वाली आवाज को दबा कर रख दिया गया है। आखिर न्यू मीडिया और जन संवाद का ये विषय क्यों नही हो सकता? आज यदि देश के न्यू मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नज़र डाली जाये तो मालूम होता है कि बडे स्तर पर तथाकथित रूप से प्रेस से जुडकर कुछ पूंजीपतियों ने अपने नापाक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये देश के सब से शक्तिशाली संसाधन माडिया को कारपोरेट मीडिया का दर्जा दिला दिया। कारपोरेट मीडिया से मेरी मुराद है मीडिया प्रोड़क्शन, मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन, मीडिया प्रोपट्री। इन लोगो द्वारा मीडिया में पूंजीनिवेश कर एक ऐसी व्यवस्था बना दी गई है जिस में मल्टीनेशनल औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा व्यापारिक घरानों का होल्ड होता चला गया। इस व्यवस्था में पूंजीनिवेशको, शेयर होल्डरों और विज्ञापनदाताओं के हितों की रक्षा तथा अधिक से अधिक धन बटोरने के सिद्धांतों पर तेजी से चला जाने लगा और मीडिया के असल मकसद जनहित और राष्ट्रहित को पीछे छोड दिया गया। मीडिया में प्रवेष करते ही इन पूंजीपतियों ने प्रेस की विचारधारा बदलने के साथ ही लोगों की सोच भी बदल दी। माहौल को अपनी इच्छापूर्वक बनाने के अलावा व्यापार, उद्योग, धर्म, राजनीति, संस्कृति, सभ्यता आज जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा जिसमें मीडिया का प्रयोग वैध या अवैध रूप से न किया जा रहा हो। आज समाचार पत्रों पर विज्ञापनों का प्रभाव इस सीमा तक बढ गया है कि कई समाचार पत्रो में संपादक को समाचार पत्र में विज्ञापन और मालिक के दबाव में अपना संपादकीय तक हटाना पड जाता है। वही संपादक लेख और समाचारो का चयन पाठक की रूची के अनुसार नही बल्कि विज्ञापन पर उनके प्रभाव के अनुसार करता है।

आज न्यू मीडिया में फैले भ्रष्टाचार से पत्रकारिता के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन बडी तादात में अशिक्षित और अप्रशिक्षित संवाददाओ की एक बडी दिशाहीन सेना का होना भी इस विषय में शामिल किया जा सकता था वही इस विचार गोष्ठी में उपस्थित लेखकों, पत्रकारों, साहित्यकारों को यदि हमारे वक्ता न्यू मीडिया के मुकाबले उस पत्रकारिता के बारे में बताते जब पत्रकारिता और पत्रकारो की देश में एक अहम भूमिका हुआ करती थी। भ्रष्टाचार के विरूद्ध देशवासियों को जागरूक करने में देश के समाचार पत्रों की भूमिका निर्णायक होती थी। उस समय प्रकाशित समाचार पत्र किसी निजी या विदेशी कंपनी के पहले नही होते थे बल्कि उन सिरफिरे लोगो के होते थे जिन के सर पर समाज सेवा और आम आदमी का दर्द रात रात भर उन्हे सोने नहीं देता था ये लोग आज से बीस पच्चीस साल पहले समाचार पत्र या पत्रिका का प्रकाशन देशहित में करते थे। यह उनका देशप्रेम होता था जो आम आदमी को पीडित होते देख खुद पीडा से कांप उठते था और उन की कलम एक जुनून का रूप धारण कर लेती थी। इस काल के पत्रकार, लेखक, शायर, कवि बेहद सादा गरीबी रेखा से नीचे का जीवन व्यतीत करता था। उस की समाज में विशेष छवि हुआ करती थी। दिन भर मेहनत मजदूरी करने के बाद शाम को लालटेन की रोशनी में टाटल के कलम और रोशनाई में अपना खून पसीना मिलाकर अपने कलम के जौहर दिखाता था। शायद ही आज देश के किसी कोने में इस तरह के पत्रकार अपनी जीविकोपार्जित करने के बाद पत्रकारिता कर रहे हो।

आज का न्यू मीडिया और न्यू मीडियाकर्मी किस कदर भ्रष्ट हो गये है इस गोष्ठी का विषय बनते तो यकीनन इस कार्यक्रम की गूंज काफी दिनो तक देश में सुनाई देती पर क्या किया जाये अपने घरों में अपने हाथों से आग नही लगाई जा सकती शायद ये बात हमारे वक्ता बहुत अच्छी तरह जानते थे।

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3 Comments on "प्रवक्ता डॉट कॉम के सफल समारोह में असफल विचार गोष्ठी"

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शादाब जाफर 'शादाब'
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भाई मीणा जी आप के विचारो में न्यू मीडिया क्या हैै क्या न्यू मीडिया प्रवक्ता की गोष्ठी का मुद्दा नही था। जो विचार वहा वक्ताओ ने रखे क्या आप उन से सहमत है और हो सकते है हो पर में सहमत नही हॅू। मुझे लगता है न्यू मीडिया और जनसंवाद में न्यू मीडिया खासकर इलैक्टोनिक्स मीडिया ही पूरी गोष्ठी का मुद्दा रही तो फिर भ्रष्टाचार का मुद्दा क्यो अलग रखा गया और छुपाया गया।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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भाई सादाब जी, बेवाक लेखन के लिए बधाई और साथ में प्रवक्ता को भी इस लेख को लिखने के लिए साधुवाद! भाई सादाब जी, आपने जो कुछ लिखा है उसे पढने के बाद क्षमा चाहते हुए मैं ये लिखने को विवश हूँ कि मुझे ऐसा आभास होता है कि आपने न्यू मीडिया, जिसे मेरी समझ के अनुसार सोशल या वेब मीडिया कहा जाता है को और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को गड्ड-मड्ड कर दिया है। जब चर्चा का विषय “न्यू मीडिया और जन संवाद” था तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर चर्चा की अपेक्षा क्यों की जा रही है या क्यों की गयी? ये… Read more »
बिपिन किशोर सिन्हा
Guest

आपकी बातों से अंशतः सहमत हूँ . प्रिंट मिडिया और इलेक्ट्रानिक मिडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार को न्यू मिडिया ही समाप्त कर सकता है. सारे विषयों पर एक बार में एक ही मंच से २-३ घंटों में विस्तार से चर्चा संभव नहीं है. इसके लिए अलग से भी परिचर्या आयोजित की जा सकती है. प्रवक्ता का आयोजन सफल था और गोष्ठी भी अपनी समय सीमा के अन्दर सफल थी. आप आपने स्तर से चर्चा को आगे बढाने के लिए प्रयास कर सकते हैं. मैं अपने सहयोग की गारंटी देता हूँ.

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