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 कपिल बी. लोमियो

वर्तमान समय के जाने-माने फिल्म निर्देशक प्रकाश झा एक बार फिर से सामाजिक सारोकार से जंुड़ी फिल्म लेकर आए है जिसका नाम है ’’आरक्षण’’। हांलाकि अभी तक इस इस फिल्म रूपी बिजली की चमक ही देखने को मिली है, लेकिन कुछ लोग ये सोचकर भयाक्रांत है कि यह बिजली जब गिरेगी तो कितना नुकसान होगा? प्रकाश झा आजकल के उन चुनिंदा फिल्मकारों में से है जिन्होने अपनी फिल्मों में केवल सामाजिक मुद्दों को ही उठाया है, और उनकी पूर्व की बाकी फिल्मों की तरह उम्मीद है कि यह फिल्म भी एक संतुलित दृष्टिकोण पेश करेगी। हालांकि जिस तरह से सरकारी उपक्रम इस फिल्म को ’’उबालने’’ में लगा हुआ है उससे सम्भव है कि इसका आधा या तिहाई भाग वाष्पित या ’’वैपोराइज़’’ हो जाए और हमें शायद वह सत्व ही मिले जो सरकार हमें पिलाना चाहती है।

बेशक यह एक संवेदनशील मुद्दा है लेकिन जिस प्रकार से इसका प्रयोग विभिन्न सरकारों द्वारा एक वोट-बैंक की तरह किया जा रहा है उससे प्रतीत होता है कि ’’आरक्षण’’ रूपी जो एक सहारा दिया गया है वह अपने उद्देश्य से भटक गया है। शायद राजनीतिक लाभ के अन्तर्गत ही इस कानून का लगातार ’’एक्सटेंशन’’ होता जा रहा है। आज विश्व में शायद भारत ही ऐसा देश है जहाँ न केवल विभिन्न धर्मो में लोग बंटे हुए है अपितु अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, अगडे़-पिछड़े के उप-विभाजनों के साथ शैक्षिक, आर्थिक, भाषाई, क्षेत्रीयता आदि कारणों से भी विभाजित है।

खैर हमारे देश में समस्याऐं तो काफी है जिस पर शायद एक किताब भी कम पड़ जाए लेकिन हम ’’आरक्षण’’ के विषय पर वापस आते है। दरअसल हमारे संविधान निर्माताओं नें सदियों से शोषित और वंचित रहे लोगों को न्याय और बराबरी का दर्जा दिलवाने के लिए जो आरक्षण के रूप में जो हथियार दिया था उसने वाकई में शोषित वर्ग के उत्थान, विशेषकर आर्थिक रूप सक्षम करने में एक का्रंतिकारी परिवर्तन किया है, लेकिन इसके पीछे जो असली सोच थी वह थी कि उँची जाति के लोगों द्वारा नीची जाति के लोगो का सम्मान करना, उनको अपने जैसे समझना और मानना आदि जिसे पाने में ’’आरक्षण’’ अभी तक असफल रहा है।

आज स्थिति यह है कि आरक्षण के अन्तर्गत मिलने वालो लाभों से प्रलोभित हो वे लोग भी आरक्षण की माँग कर रहे है जिनके पूर्वजों ने वही शोषित वर्ग की बेड़ियों से आज़ाद होकर नये धर्म को स्वीकार किया था। ये कहना तो गलत होगा कि सभी उच्च जाति के लोगों में नीची जाति के लोगों के प्रति नफरत है लेकिन यह भी सत्य है कि न केवल हिन्दू धर्म बल्कि हिन्दू धर्म से परिवर्तित होकर दूसरे धर्मो मे गए लोगों में भी जाति भावना प्रबल है। स्पष्ट है कि आरक्षण ने भले ही आर्थिक रूप से शोषित वगै को सक्षम कर दिया हो, लेकिन वह उच्च लोगों की मानसिकता को अभी तक बदल नही पाया है। समाज में हमें आज भी ऐसे उदाहरण देखने मिल जाऐंगे जब किसी निच्च जाति के व्यक्ति द्वारा छोटा या बड़ा अपराध करने पर या उसके द्वारा किसी काम का अधूरा रह जाने पर उसे ही नही बल्कि उसकी पुश्तों के नाम पर उसे गालियाँ मिल जाती हो, भले ही वही काम किसी उच्च जाति के व्यक्ति द्वारा बार-बार किया जाता रहा हो। इस सन्दर्भ में एक कहानी याद आती है कि एक शेर मेमने को खाने के मकसद से उस पर इल्जाम लगाता है कि ’’तेरे पुरखों ने यह पानी जूठा किया था, इसलिए तुझे इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी’’। कहने का आशय है कि जब तक हम यह मानसिकता नही बदलेंगे तब तक इन आरक्षणों से कोई आमूल परिवर्तन नही होने वाला।

आरक्षण के इतने सालों से विद्यमान रहने के बाद भी सारे शोषित वर्ग ने अच्छी स्थिति को प्राप्त कर लिया हो ऐसा भी नही है। ’’आरक्षण’’ के नाम पर कुछ ही लोगों ने मलाई खाई है और राजनीतिज्ञों ने अपनी रोटी सेंकी है, वंचित अभी भी मौजूद है, शोषित अभी भी मौजूद है भले ही शारीरिक रूप से कम को लेकिन सामाजिक तथा मानसिक रूप से तो है ही। देखा जाए तो आरक्षण ने जहाँ एक ओर शोषित वर्ग को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कि है वही दूसरी ओर उँची और नीची जाति के लोगों में बनी खाई को और चौड़ा करने का भी काम किया है। कई जगहों पर हम देखते है कि आरक्षण का लाभ लेकर कई ऐसे अक्षम लोगों ने सक्षमों को पीछे ढकेल दिया (यहाँ अर्थ शैक्षिक और तकनीकी अक्षमता से है।) इससे न केवल सक्षम लोगों का उन आरक्षित लोगों के प्रति आक्रोश बढ़ रहा है बल्कि ऐसे अक्षम लोगों का उन पदों या लोकहितकारी परियोजनाओं में सीधी संलिप्तता देश के लिए समग्र विकास में भी घातक साबित हो रही है।

आज जरूरत है समग्र विकास की जिससे वाकई में उपेक्षित और वंचित लोगों को इसका लाभ मिल सके फिर चाहे वह अगड़े समाज का प्रतिनिधि हो या पिछड़े समाज का, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक समाज का। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ’’आरक्षण’’, ’’अल्पसंख्यक’’ , ’’जाति’’, ’’धर्म’’ आदि से ऊपर उठकर सभी लोगों को इस हद तक सक्षम बनाने की कि वह न केवल अपना बल्कि देश के विकास में भी सहायता दे सकें। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी वंचित, शोषित को यह हक कब तक मिलना चाहिए, क्योंकि हम इसे आजीवन चालू नही रख सकते, कभी न कभी हमें उनके पैरों को सशक्त करके उन्हे चलने देने के लिए छोड़ना होगा।

आखिर में फिल्म के बारे में। यूं तो ’’आरक्षण’’ फिल्म आज ही रिलीज हुई है जिस वजह से इसके बारे में कुछ कहना सही न होगा, लेकिन फिर भी इसके छोटे-छोटे विज्ञापन देखकर तथा उसकी यूनिट के बारे में जानकर कहा जा सकता है कि कुछ हद तक इस फिल्म ने ’’आरक्षण’’ से सम्बन्धित सभी वर्गो को न्याय देने की कोशिश की होगी। बड़े खेद और हास्य का विषय है की संवाद और कहानी के स्तर पर गिरी हुई फिल्में तो सेंसर बोर्ड और विभिन्न उच्च सरकारी संस्थानों द्वारा पास कर दी जाती है लेकिन यथार्थ से अवगत कराने वाली फिल्मों पर कैंची चला दी जाती है। उम्मीद है कि हमें एक ’’शुद्ध’’ फिल्म देखने को मिले जिसे सभी लोग खुले विचारों से देखें, समझें और सोचें।

 

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