लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-   congress

आरक्षण राजनीतिक दलों के सियासी खेल का दांव बनकर उभर रहा है। इस लिहाज से कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी का जातिगत आरक्षण खत्म करके आर्थिक आधार पर आरक्षण देने संबंधी बयान चुनावी हथकंडे से ज्यादा कुछ नहीं है। वैसे भी सोनिया गांधी ने यथास्थिति में आरक्षण जारी रखने का बयान देकर, एक तरह से द्विवेदी के बयान का खंडन कर दिया है। लेकिन द्विवेदी कांग्रेस के बेहद गंभीर नेता होने के साथ तार्किक और न्यायसंगत बात करने वाले नेताओं में से एक हैं। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि द्विवेदी का बयान कांग्रेस की अंदरूनी चाल का ही हिस्सा रहा होगा ? बात का बतंगड़ बनते देख सोनिया ने मुद्दे को बेवजह बहस का हिस्सा बनने से जरूर बचा लिया है, लेकिन अब यह विचार भी जरूरी है कि जातिगत आरक्षण की स्थिति कब तक बहाल रहेगी ? इस मुद्दे पर तर्कसंगत बहस की गुंजाइश जरूर उत्पन्न हुई है ? लिहाजा फिलहाल आर्थिक आधार पर आरक्षण की पहल भले ही न हो, लेकिन अब इतना बदलाब लाना तो जरूरी है कि जिस व्यक्ति को एक बार जाति आधारित आरक्षण की सुविधा हासिल हो चुकी है, उसकी संतान को आरक्षण न मिले ? और क्रीमीलेयर के दायरे में आने वाले लोगों के आरक्षण की पात्रता खत्म हो ? ऐसे उपायों से वास्तविक जरूरतमंदों को आरक्षण का लाभ मिलेगा, जो आर्थिक समानता का आधार बनेगा।
जनार्दन द्विवेदी का बायान इसलिए राजनीतिक शिगूफा माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने इस अतिसंवेदनशील मुद्दे को ऐन उस वक्त उठाया है, जब लोकसभा का अंतिम सत्र चल रहा है और चुनाव की अधिसूचना जारी होने को एक माह का समय भी नहीं बचा है। वैसे भी जातिगत आरक्षण की जड़ें इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि सरकार केंद्र में किसी भी राजनीतिक दल की क्यों न हो, इसे एकाएक खत्म करना आसान नहीं है। गठबंधन सरकारों के दौर में यह इसलिए भी कठिन है, क्योंकि कई क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक वर्चस्व ही जाति आधारित राजनीति पर टिका है। लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, अजीतसिंह और मायावती के दलों का अस्तित्व ऐसी ही राजनीति की वैसाखियों पर ही टिका है। इसलिए देश की जातिगत पहचान, राजनीतिक पहचान बन गई है। कई राजनेता तो बाकायदा जातिगत राजनीति की प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं। यहां तक की आर्थिक रूप से संपन्न जातियों में भी खुद को पिछड़ी जाति घोशित कराने की होड़ लगी हुई है। गोया उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो प्रदेश विधानसभा चुनाव के ठीक पहले आर्थिक रूप से कमजोर ब्राह्मणों को भी आरक्षण देने का सियासी दांव चल दिया था। इस दांव का दायरा व्यापक करते हुए बाद में मायावती ने आर्थिक रूप से कमजोर सभी सवणों को आरक्षण देने की चिट्ठी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लिखी थी। जाहिर है, आरक्षण की ऐसी कोशिशें शिगूफेबाजी से आगे नहीं जातीं, सो गईं भी नहीं ? इसी तरह जाट गुर्जर और मीणाओं को राजस्थान में आरक्षण देने की राजनीति गरमाई थी, लेकिन नतीजा शून्य ही रहा था। अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण देने की राजनीति भी आखिरकार अब तक किसी मुकाम पर नहीं पहुंची है। लेकिन सरकारी नौकरियों में लाभ की आकांक्षा के चलते जाति आधारित समुदाय जरूर संगठन के स्तर पर मजबूत हो रहे हैं।
आरक्षण के टोटके जातिगत हों अथवा आर्थिक, राजनीतिक दलों को इतना तो गौर करने की जरूरत है कि आरक्षण की मौजूदा प्रणाली बदलाव की मांग कर रही है ? बदलाव भी इसमें तार्किक ढंग से लाना जरूरी है जिससे जातिगत आरक्षण भी एकाएक खत्म न हो और नए पात्रों को लाभ भी मिलने लगे ? एक समय आरक्षण का सामाजिक न्याय से वास्ता जरूर था, लेकिन सभी जाति व वर्गों के लोगों द्वारा शिक्षा हासिल कर लेने के बाद जिस तरह से देश में शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई है, उसका कारगर उपाय आरक्षण जैसे चुक चुके औजार से संभव नहीं है ? लिहाजा सत्तारूढ़ दल अब सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों के समाधान आरक्षण के हथियार से खोजने की बजाय रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर निकालेंगे तो बेहतर होगा ? क्योंकि यदि वोट की राजनीति से परे अब तक दिए गए आरक्षण के लाभ का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए तो साबित हो जाएगा कि यह लाभ जिन जातियों को मिला है, उनका समग्र तो क्या आंशिक कायाकल्प भी नहीं हो पाया ? भूमण्डलीकरण के दौर में खाद्य सामग्री की उपलब्धता से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास संबंधी जितने भी ठोस मानवीय सरोकार हैं, उन्हें हासिल करना इसलिए और कठिन हो गया है, क्योंकि अब इन्हें केवल पूंजी और अंग्रेजी शिक्षा से ही हासिल किया जा सकता है ? ऐसे में आरक्षण लाभ के जो वास्तविक हकदार हैं, वे जरूरी योग्यता और अंग्रेजी ज्ञान हासिल न कर पाने के कारण हाशिये पर ही उपेक्षित पड़े हैं। अलबत्ता आरक्षण का सारा लाभ वे लोग बटोरे ले जा रहे हैं जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक व षैक्षिक हैसियत हासिल कर चुके हैं। लिहाजा आदिवासी, दलित व पिछड़ी जातियों में जो भी जरूरतमंद है, यदि उन्हें लाभ देना है तो क्रीमीलेयर को रेखांकित करके इस दायरे में आने वाले लोगों को आरक्षण लाभ से वंचित करना जरूरी है ? अन्यथा यह लाभ चंद परिवारों में सिमटकर रह जाएगा। मसलन सामाजिक न्याय की अवधारणा एकांगी होती चली जाएगी ? फिलहाल इसकी शुरूआत आरक्षण कोटे से प्रशासनिक पदों पर बैठे आधिकारियों की संततियों को लाभ से वंचित करके की जा सकती है ?
मौजूदा आरक्षण प्रणाली में समावेशी उपायों के अंतर्गत राजनीतिक दलों में यदि इच्छाशक्ति है तो वह यह भी कर सकते हैं कि राज्य स्तर पर केवल सरकारी पाठषालाओं में मातृभाशा के माध्यम से पढ़े छात्र ही सरकारी नौकरी के पात्र हों ? इस उपाय से देशहित में दो बातें एक साथ कारगर सिद्ध होंगी। एक, सरकारी षिक्षा व्यवस्था में उम्मीद से कहीं ज्यादा सुधार आएगा। दूसरे, आरक्षण का लाभ गरीब से गरीब व्यक्ति के द्वार तक पहुंच जाएगा ? जाहिर है, धनवान और अंग्रेजी माध्यम से षिक्षित लोग आरक्षण के दायरे से आप से बाहर होते जाएंगे। चूंकि वे अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित हैं। इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशों में नौकरी के द्वार उनके लिए खुले ही रहेंगे। भारतीय प्रशासनिक, पुलिस, वन और विदेश सेवा के अवसर भी इनके पास सुरक्षित रहेंगे।
जातीय कुचक्र को तोड़ना है तो केंद्र सरकार ठोस कदम उठाने की दृष्टि से अंतरजातीय विवाहों को आरक्षण लाभ से जोड़ देना चाहिए ? जिससे जन्म के आधार पर बहिष्कृत जिंदगी जी रहे लोगों को सम्मान से जीने का अधिकार प्राप्त हो ? राजनीतिक दल यदि ऐसा कानून बनाने की इच्छाशक्ति जताते हैं तो उन्हें कानून के प्रारूप में यह प्रावधान भी रखने की जरूरत है कि आरक्षण का यह लाभ सवर्ण और पिछड़ी तथा अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के युवक युवतियों के बीच विवाह संबंध बनाने पर ही मिले। तलाक की स्थिति निर्मित होने पर नौकरी से बर्खास्तगी का प्रावधान भी जरूरी है ?
दरअसल, हमारे यहां जातिगत आरक्षण की षुरूआत 1950 से हुई थी। अनुसूचित जाति को 15 और अनुसूचित जनजाति को 7.5 फीसदी पद आरक्षित किए गए थे। 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपनी सरकार बचाने के लिए ठंडे बस्ते में पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को संविधान में संशोधन कराकर लागू कर दिया। इन सिफारिशों के तहत पिछड़े वर्ग से जुड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत पद सुरक्षित कर दिए गए। 1991 में पीवी नरसिंह राव सरकार ने सवर्ण जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 फीसदी आरक्षण देने के प्रयास किए थे, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रयास को संविधान की भावना के विरूद्ध मानते हुए खारिज कर दिया था। वर्तमान मनमोहन सिंह सरकार ने भी अल्पसंख्यक समुदायों को 15 फीसदी आरक्षण देने की बहुत कोशिशें कीं, लेकिन संवैधानिक रोड़े के चलते वे किसी निश्चित मुकाम पर नहीं पहुंच पाई। हालांकि कई राज्य सरकारों ने पिछड़े वर्ग के कोटे में मुस्लिम अल्पसंख्यकों को आरक्षण दिया हुआ है। केरल में 12, पश्चिम बंगाल में 10, तमिलनाडू में 3.5, कर्नाटक में 4, बिहार में 3 और आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा 4 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मुस्लिमों को दिया जा रहा है। बहरहाल आरक्षण की मौजूदा सरंचना को तो एकाएक बदलना किसी भी सत्ताधारी राजनीतिक दल के लिए मुमकिन नहीं है, लेकिन आरक्षण को समावेशी बनाए जाने और जातीय जड़ता तोड़ने के नजरिए से मौजूदा आरक्षण प्रणाली में बदलाव का सिलसिला तो शुरू होना ही चाहिए, जिससे इसके महत्व की व्यापकता परिलक्षित हो और कमजोर जाति व वर्गों के नए-नए लोग इससे लाभान्वित हों ?

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1 Comment on "आरक्षण: कांग्रेस की सियासी चाल"

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mahendra gupta
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यह तो कांग्रेस का सियासी पांसा था.पिछड़ी, अनुसूचित, व जनजातियों के खिसकते जनाधार को वापिस लेन बनाये रखने की चाल थी.उसे पता था कि यह सम्भव नही,आखिर उसका ही बोया यह बीज है.विरोधी दल भी व छुटभैये ,थैला ब्रांड दल भी इसको बनाये रखने के पक्ष में. क्योंकि उनकी दूकान तो इसी पर चल रही है.एक बार जनार्दन से यह बयां दिलवाकर,ब्राह्मिन व अन्य सवर्ण जातियों को भी अपने पक्ष में बनाने का दिखावा है, ताकि उन्हें भा ज पा की और जाने से रोक सकेदिखने के लिए सोनिए का तत्काल बयां आ गया, जो कभी इतनी जल्दी बयान देने… Read more »
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