आरक्षण, धर्मनिरपेक्षता एवं अल्पसंख्यकों का विरोध असंवैधानिक / डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ |
सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि हमारे देश के विभाजन के समय हमारे तत्कालीन नेतृत्व ने सभी धर्मावलम्बियों तथा आदिवासियों एवं दलितों को आश्वस्त किया था कि वे भारत में रहना चाहें तो अवश्य रहें। उन्हें और उनकी धार्मिक आस्थाओं को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुँचने दी जायेगी। इसी विश्वास पर भरोसा करके दलित-आदिवासियों सहित; मुस्लिमों और कुछ क्रिश्चन परिवारों ने भारत को ही अपना राष्ट्र माना और हमारे पूर्वजों ने अपनी वचनबद्धता पर खरे उतरते हुए, भारत को धर्मरिनपेक्ष राष्ट्र घोषित किया।
आज के समय में अनेक लोगों को ज्ञात ही नहीं है कि दलित, आदिवासी, पिछडों द्वारा भी अलग राष्ट्र की मांग की गयी थी, जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री, मोहनदास कर्मचन्द गाँधी एवं मोहम्मद अली जिन्ना के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करने के बाद यह तय हुआ कि डॉ. अम्बेडकर अलग राष्ट्र की मांग छोड देंगे और इसके बदले में भारत के मूल निवासी आदिवासियों, दलितों और पिछडों को सत्ता में संवैधानिक तौर पर हिस्सेदारी दी जायेगी। इसे सुनिश्चित करने के लिये तत्कालीन ब्रिटिश सरकार सहित सभी पक्षों ने आदिवासी एवं दलितों के लिये सेपरेट इल्क्ट्रोल की संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करने को सर्व-सम्मति से स्वीकृति दी। इन दोनों वचनबद्धताओं पर विश्वास करके इस देश में अल्पसंख्यक एवं आदिवासी व दलित साथ-साथ भारत में रहने को राजी हुए। लेकिन मोहनदास कर्मचन्द गाँधी, जिन्हें कुछ लोग भ्रमवश या अन्धभक्ति के चलते या अज्ञानतावश सत्य का पुजारी एवं राष्ट्रपिता कहने की गलती करते आ रहे हैं, उसने ब्रिटेन से भारत लौटते ही डॉ. अम्बेडकर के साथ हुए समझौते को इकतरफा नकार दिया एवं सैपरेट इलेक्ट्रोल के अधिकार को छोडने के लिये डॉ. अम्बेडकर दबाव बनाने के लिये भूख हडताल शुरू कर दी। जो लोग ऐसा मानते हैं, कि गाँधी इंसाफ के लिये उपवास या अनशन करते थे, वे यह जान लें कि सदियों से शोषित एवं अपमानित आदिवासी एवं दलितों के हकों को छीनने के लिये भी गाँधी ने उपवास शुरू कर दिया और मरने को तैयार हो गये। जिसका तत्कालीन गाँधीवादी मीडिया ने खुलकर समर्थन किया और अन्नतः डॉ. अम्बेडकर से गाँधी सेपरेट इलेक्ट्रोल का हक देने से पूर्व ही छीन लिया और जबरन आरक्षण का झुनझुना डॉ. अम्बेडकर के हाथ में थमा दिया। जबकि आरक्षण आदिवासी एवं दलितों कभी भी मांग का हिस्सा या ऐजेण्डा नहीं था। ऐसे में गाँधी के धोखे एवं कुटिल चलाकियों में फंसकर देश की करीब 30 प्रतिशत आदिवासी एवं दलित आबादी इस देश की ही नागरिक तो बनी रही, लेकिन इस विश्वास के साथ कि उन्हें शिक्षण संस्थाओं में एवं सरकारी सेवाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण प्राप्त होता रहेगा। जिसके लिये संविधान में अनेक उपबन्ध एवं अनुच्छेद जोडे गये। इसी प्रकार से संवैधानिक तौर पर भारत आज भी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और हर व्यक्ति को यहाँ पर धार्मिक आजादी है। लेकिन हिन्दूवादी कट्टरपंथियों और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को बढावा देने वाले राजनैतिक दलों ने धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप को विकृत कर दिया है।
आगे लिखने से पूर्व साफ कर दूँ कि मैं मुस्लिम या इस्लाम या अन्य किसी भी धर्म के प्रति तनिक भी पूर्वाग्रही या दुराग्रही नहीं हूं। मैं पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष, मानवतावादी एवं इंसाफ पसन्द व्यक्ति हूं। सारी दुनिया जानती है कि भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्त पर खडा है। जब तक भारत में यह संविधान लागू है, इस देश में किसी को भी संविधान से खिलवाड करने का हक नहीं है। बल्कि संविधान का पालन करना हर व्यक्ति का संवैधानिक एवं कानूनी दायित्व है। इस देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को धर्मनिरपेक्षता को मानना और लागू करना ही होगा, जिसका तात्पर्य है कि-किसी भी धर्म के साथ सरकार, जन प्रतिनिधियों और लोक सेवकों को किसी भी प्रकार का कोई सरोकार नहीं होना चाहिये। यहाँ तक कि हज के लिये सब्सीडी तो दी ही नहीं जानी चाहिये, लेकिन साथ ही साथ किसी भी सरकारी इमारत की आधारशिला रखते समय गणेश पूजा या नारियल तोडने का कार्य भी इनके द्वारा नहीं करना चाहिये। राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मन्त्री, मुख्यमन्त्री और लोक सेवक की कुर्सी संभालते समय मन्त्रोचार या कुरआन की आयतों या बाईबल का पठन भी नहीं किया जाना चाहिये, जैसा कि वसुन्धरा राजे एवं उमा भारती ने मुख्यमन्त्री पद संभालते समय किया था। इन दोनों राजनेत्रियों ने मुख्यमन्त्रियों के रूप में संविधान के पालन और सुरक्षा की शपथ ग्रहण करते ही संविधान की धज्जियाँ उडाते हुए हिन्दू धर्म के कथित सन्तों के चरणों में वन्दना करके संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को तहस नहस कर दिया।
इस देश में केवल हिन्दू-मुसलमान ही नहीं, बल्कि सभी दिशाओं में असंवैधानिक काम चल रहे हैं। यही नहीं सरकारी कार्यालयों में कार्यालयीन समय में गणेश, शिवजी, हनुमानजी, दुर्गा आदि की मूर्तियाँ या चित्र स्थापित हैं, जिनकी लोक सेवकों द्वारा वाकायदा प्रतिदिन पूजा की जाती है और प्रसाद भी वितरित किया जाता है। सबसे दुःखद तो यह है कि गणेश, शिवजी, हनुमानजी, दुर्गा के आदर्शों या जीवन से प्रेरणा लेकर जनता की या देश की सेवा करने वाला इनमें एक भी लोक सेवक नहीं हैं। सबके सब अपने कुकर्मों से मुक्ति पाने के लिये प्रतिदिन पूजा-आरती का नाटक करते हैं। जिसके लिये मुनवादी व्यवस्था जिम्मेदार है, जो पाप करे, पाप से प्रायश्चित करने के पूजा-आरती रूपी समाधान सुझाती रही है। यह सब असंवैधानिक और गैर कानूनी तो है ही, साथ ही साथ लोक सेवक के रूप में पद ग्रहण करने से पूर्व ली जाने वाली शपथ का भी खुलेआम उल्लंघन है। जबकि एक भी सरकारी कार्यालय में मक्का-मदीना, प्रभु यीशू, बुद्ध या महावीर का चित्र नहीं मिलेगा! केवल ब्राह्मणवादी एवं मुनवादी धर्म को ही हिन्दू धर्म का दर्जा दिया गया है, जबकि गहराई में जाकर देखें तो इस देश में ब्राह्मणों सहित आर्य उद्गत वाली कोई भी नस्ल हिन्दू है ही नहीं, लेकिन इन्हीं के द्वारा कथित हिन्दू धर्म पर जबरिया कब्जा किया हुआ है। दूसरी ओर इस देश की निकम्मी जनता जागकर भी सोई हुई है। अतः यह सब कुछ गैर-कानूनी और असंवैधानिक दुष्कृत्य हजारों वर्षों से चलता आ रहा है और आगे भी लगातार चलता ही रहेगा। लोगों को अपने साथ होने वाले अत्याचार, व्यभिचार, शोषण, जातिगत, वर्गगत और बौद्धिक व्यभिचार तक की तो परवाह नहीं है। ऐसे में वे उस हिन्दू धर्म की क्या परवाह करेंगे, जिसका उल्लेख किसी भी प्रमाणिक धार्मिक ग्रंथ (चारों वेदों) में तक नहीं किया गया है।
इसके अलावा यह भी स्पष्ट करना कहना चाहँूगा कि कथित हिन्दू धर्म के प्रवर्तक एवं संरक्षकों द्वारा 20 प्रतिशत हिन्दुओं को मन्दिरों में प्रवेश तक नहीं करने दिया जाता है। मन्दिरों में प्रवेश करने से मुसलमान नहीं रोकते, बल्कि ब्राह्मण एवं मनुवादी मानसिकता का अन्धानुकरण करने वाले हिन्दू ही रोकते हैं। मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले में आदिवासियों का शोषण मुसलमान नहीं करते, बल्कि मनुवादी हिन्दू ही करते हैं। ऐसे में हिन्दूवाद को बढावा देने वाले दलित-आदिवासियों से अपने पक्ष में खडे रहने की उम्मीद किस नैतिकता के आधार पर कर सकते हैं। अजा एवं अजजा की देश में करीब 30 प्रतिशत आबादी है, लेकिन इन वर्गों के हितों पर हमेशा कुठाराघात उच्चपदों पर आसीन सवर्ण हिन्दुओं द्वारा किया जाता है। यदि कोई भी व्यक्ति वास्तव में निष्पक्ष और न्यायप्रिय है तो यह जानकर आश्चर्य होना चाहिये कि हाई कोर्ट में सडसठ प्रतिशत पदों पर जजों की सीधी नियुक्ति की जाती है, लेकिन राजस्थान में आजादी के बाद से आज तक एक भी अजा एवं अजजा वर्ग में ऐसा व्यक्ति (वकील) नियुक्ति करने वाले सवर्ण हिन्दुओं को योग्य नहीं मिला, जिसे हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया जा सकता। ऐसे में हिन्दु एकता की बात करना एक पक्षीय उच्च वर्गीय हिन्दुओं की रुग्ण मानसिकता का अव्यवहारिक पैमाना है। जो कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता और इसीलिये ऐसे लोगों को इन घोर अपमानकारी, घृणित वेदनाओं को केवल सामाजिक बुराई कहकर नहीं छोड दिया जाना चाहिये, बल्कि इस प्रकार के लोगों को कठोर दण्ड से दण्डित किये जाने की भी जरूरत है।
अल्पसंख्यकों, धर्मनिरपेक्षता एवं आरक्षण का विरोध करने वालों से मेरा विनम्र आग्रह है कि वे इस देश और समाज का माहौल खराब नहीं करें तथा अपने पूर्वजों द्वारा किये गये वायदों का निर्वाह करके अपने नैतिक एवं संवैधानिक दायित्वों को पूर्ण करें।? इस देश में हिन्दू-मुसलमानों को आडवाणी की १९८० की रथयात्रा से पूर्व की भांति और आदिवासियों तथा दलितों को आर्यों के आगमन से पूर्व की भांति शान्ति से रहने देने के लिये सुहृदयतापूर्वक अवसर प्रदान करें, जिससे देश और समाज का विकास हो सके। देश में शान्ति कायम हो और देश का सम्मान बढे।
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
आपको यह भी पसंद आयेंगे: |













इस आलेख पर कोई टिप्पणी करने में नितांत असमर्थ हूँ.किन्तु आज १४ अप्रैल को परम आदरणीय बाबा साहेब आंबेडकर जी के जन्म दिन पर उन सभी बंधुओं,लेखकों और चिंतकों को बाबा साहेब के व्यक्तित्व और कृतित्व के सम्मानार्थ अपने-अपने विचारों और प्रतिबद्धताओं में उदारता की उम्मीद अवश्य करूँगा. जय भीम ..
बाकी भ्रष्टाचार तो देर सबेर ख़त्म हो सकते है पर आरक्षण रुपी सामाजिक भ्रष्टचार ख़त्म होने की कोई सम्भावना नजर नहीं आती इन लोगों को शर्म भी नहीं आती वो आ भी नहीं सकती क्योंकि मुफ्त का मॉल कोंन छोड़ना चाहेगा वैसे भी मीणा जैसे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेते रहे है और लेते रहेंगे जरा इनको उन दलित बस्तिओं में जाने को बोलो मनुष्य और पशु एक जैसे रहते है साडी मलाई तो इन जैसों ने हड़प ली है वे तो वैसे के वैसे ही रह गए क्या यही अम्बेडकर का सपना था मेरे ख्याल से बिलकुल नहीं इंसानी तबियत ही ऐसी होती है की वह अपने स्वार्थ के आगे नहीं देखता ये नव्य ब्रह्मण किसी भी भाति शोषण करने में किसी से पीछे नहीं है हा बाते बनाने में इनका कोई जोड़ नहीं है किसी ने थोडा सवाल उठा दिया फिर देखिये इनका शोरोगुल आरक्षण ने साबित किया है कि वह पद भले ही दिला दे पर वह उस समाज की
जड़ें नहीं मजबूत कर सकता अंततः देश भी विकलांग हो कर चलेगा मै अपने अनुभव से कह रहा हूँ ,मै जहाँ काम करता हूँ वहां कुछ आरक्षण के द्वारा प्रोन्नति पा कर अधिकारी बन गए है उनकी स्थिति इस प्रकार की है की इंग्लिश को कौन पूछे हिंदी भी लिख्नना कठिन होता है अब इन्हें बताने की भी जिम्मेवारी मेरी बन जाती है ,न करो तो सारा काम बिगड़ जाता है एक दो दिन की बात हो तो कोई बात नहीं यहाँ तो रोज का सिलसिला चलता है मीणा जी क्या इस पर गौर फरमाएंगे ?
बिपिन कुमार सिन्हा
आपने हम सभी उच्च वर्ग के जुबान की बात कही है लेकिन हमारा सरकारी तंत्र अपने वोट बैंक के लिए ना तो योग्यता की परवाह करता है ना ही देश के भविष्य की
सत्तासीन अपने सत्ता के मोह में जाति और धर्म के नाजायज मुद्दों पर अपनी राजनेतिक रोटिया सेकती रहती है अब देश की नहिया है राम के भरोसे, अपनी ही नहिया तू पर तू लगा जा !!!!!
यह तथाकथित लेखक “डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ ” मुझे कुछ कुंठाग्रस्त लगते हैं. में नहीं जनता की ये दलित परिवार से हैं या नहीं पर इनका लेख बताता हैं शायद, इन्हें कुंठा है अपने आप का जन्म दलित परिवार में होने की! ऐसे में व्यक्ति बिना तथ्यों की बाते करता है| हम इनसे पूछना चाहेंगे कौन से साहित्य में इन्होने आंबेडकर के अलग राष्ट्र की मांग का उल्लेख देखा है|
आरक्षण आज ऐसे है जैसे बिना काम किये कुछ प्राप्त करना और मेरी नज़रों में मैं इसको भिक्षा से ज्यादा कुछ नहीं मानता| यह हक़ हैं उन मेहनती बच्चों और युवाओं का जो नाकाबिल लोगो को भीख में दे दिया जाता हैं कुछ इतिहास में किये वादों को निभाने के लिए और उनके प्रति वचनबद्धता दिखने के लिए. और भीख में कुछ भी दिया जाये तो उसके लिए शुक्रगुजार होंना चाहिए नतमस्तक होना चाहिए. वैसे मैं इतना कटु और निष्ठुर नहीं पर जब कोई लाभ लेने के बाद भी उस लाभ लेने को को न माने, बातें बनाये, तो वों नक्सली नज़र आता है… भगवन का शुक्र करो हर समय एक सा नहीं रेता पता नहीं ये आरक्षण की बहार कब तक है… और मेरे अंधेर नगरी के चौपट राजा…
यहां पश्चिममें खास तौर पर स्पर्धा Competition का आधार ग्यान को और क्षमता को ही माना जाता है। कंपनियां भी इसी आधार पर तरक्की करती है। इसी कारण कुछ भारतीय भी तरक्की कर पाते हैं, और उसीके कारण कंपनियां भी। {क्षमता बिना गोरों को} आरक्षण से तो हम, कब के बेकार हो जाते, और कंपनियां भी बंद पड जाती। एक्ज़ाम की तैय्यारी में, विषय को समझने में आप आरक्षण दे सकते हैं। पर कम नंबरों को ऊपर की नौकरी और ज्यादा नंबर वाले को नीचा ग्रेड नहीं दिया जाता।
अक्षमता को बढावा देना भी भ्रष्टाचार ही है। ऐसे छोटे छोटे भ्रष्टाचार अंतमें देश को ही भ्रष्ट कर डालेंगे। यदि अक्षमता को प्रोत्साहित करते रहें, तो क्या भारत विश्व शक्ति बन पाएगा? ===> सारे नागरिकों की उपलब्धियोंका जोड (योग, Sum Total ) भारत की कुल उन्नति कही जाएगी।वह कैसे होगी? <==
शिव लिंग पर दूध के अभिषेक के बदले क्या आप पानी का अभिषेक करना चाहेंगे? और फिर भ्रष्टाचार के विरोध में क्यों आवाज़ उठाते हो? आरक्षण भी तो मौलिक भ्रष्टाचार ही है। हां आर्थिक आधार पर सहायता की जाए। पुस्तकें, स्कॉलरशिप, साधन इत्यादि की सहायता दी जाए। पर अक्षमता को प्रोत्साहित ना करें। यदि मेरी कहीं भूल हो रही हो, तो आप दिखाइए, मैं अपना मत बदलने के लिए बाध्य हूं। देशको डुबोनेका यह आरक्षण एक षड यंत्र है। तरक्की काबिलियत पर हो, "किसी के द्वेष" पर नहीं।कल मुझे कोई कहेगा, कि सारे A ग्रेड वालों को B ग्रेड दे दो। और B को A, तो फिर सभी को A ही दे दीजिए ना! फिर ग्रेड की क्या कीमत रहेगी? मानता हूं, कि फिर हमारी डिग्री की कीमत इसी लिए घट गई है। एक पूछूं? फिर कालेज, स्कूल की भी क्या ज़रूरत? जिनको डिगी चाहिए, उन्हें बुलाकर डिग्रियां बांट दो। बजट बचाओ।
इसका भी उपयोग एक "वोट बॅन्क" की भांति, करो। वोट पाओ, कुरसी पाओ, स्विस बॅन्क भरो।देश जाए (क्ष) में। {"(क्ष)"=कटु शब्द, क्षमा कीजिए}
बंधु मीणा जी, आप कहते हैं, कि ===>”आज के समय में अनेक लोगों को ज्ञात ही नहीं है कि दलित, आदिवासी, पिछडों द्वारा भी अलग राष्ट्र की मांग की गयी थी, जिसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में ब्रिटिश प्रधानमन्त्री, मोहनदास कर्मचन्द गाँधी एवं मोहम्मद अली जिन्ना के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करने के बाद यह तय हुआ कि डॉ. अम्बेडकर अलग राष्ट्र की मांग छोड देंगे|”
< ===
(१)
क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं, कि दलित स्थान के लिए "विचारार्थ प्रस्तुत किए गए" कौनसे प्रदेश थे?
(२)
पाकीस्तान में भी तो दलित थे ही ना? वहां के "दलित स्थान" के बारे में भी आप चिंतित होंगे ना? मोहम्मद अली जिन्ना ने क्या उत्तर दिया था। यह तो उन्हींके क्षेत्र में आता है।
(३)
यही प्रश्न "बंगला देश" के बारे में भी पूछा जा सकता है।मोहम्मद अली जिन्ना ने क्या उत्तर दिया था। यह तो उन्हींके क्षेत्र में आता है।
विशेष बिनती: अन्य बिंदुओं को बीच में लाना न मैं चाहता हूं, न आप से अपेक्षा है।इतने ही उत्तर चाहता हूं। कुछ संदर्भ दे पाए तो अच्छा होगा।
डा. मीना जी अनेक बार दुहाई दे चुके हैं कि प्रवक्ता पर कटु व असभ्य भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना कहिये. हमारे इन मित्र को यह समझ नहीं आता कि इतनी कटु , विषभरी व देश-समाज को तोड़ने वाली भाषा का प्रयोग शायद आज तक किसी ने प्रवक्ता पर नहीं किया होगा जितना यह करते हैं.. इन बेचारों का वश चले तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की दुहाई देते-देते अपने सभी विरोधी टिप्पणीकारों को दरकिनार कर दें, जैसे कि वर्तमान ईसाई मीडिया ने किया हुआ है …. प्रवक्ता जैसी पत्रिकाओं का गला घोंटने की तैयारी सोनिया जी की एन.ए.सी. ने कर ली है. विरोध को सहने की इनकी परम्परा है ही नहीं. स्वतंत्र संवाद का तो ये केवल नाटक करते हैं. ….डा.मीना जी भारत को समाप्त करने वाली नीतियों के अनुसरण कर्ता व प्रचारक अनजाने में हैं या जानबूझकर : इसका निर्णय पाठक स्व विवेक से करें.
पुरुषोत्तम मीना ने राष्ट्रपिता गांधीजी का और हिन्दू धर्म का अपमान किया है…यह व्यक्ति सजा का पात्र है …कानूनन जुर्म है यह …कोई freedom fighters का और किसी भी धर्म का इस तरह अपमान नहीं कर सकता
ऐसे लेखक को समाज से बहिष्कृत करैं यह ____समाज को दूषित करने का असफल प्रयास है यह ….शर्म आनी चाहिए इस लेखक को______
गांधी जी के निधन के बाद वे यूरोपीय ताकतों के लिए पहले से भी कहीं बड़ा खतरा बन चुके हैं. बाजारवादी यूरोपीय ताकतें वैचारिक रूप से चौराहे पर खड़ी हैं. उनके सारे के सारे मॉडल व व्यवस्थाएं लगातार धराशाई होती जा रही हैं. मानवता व प्रकृति विरोधी उनके सिद्धांत लगातार असफल हो रहे हैं. वे केवल षड्यंरों के बल पर अभी तक अपने अस्तित्व को बचाए हुए हैं. ऐसी विकट स्थिति में गांधी द्वारा दिए मॉडल व व्यवस्थाएं भारतीयों का प्रेरणा स्रोत न बन जाएँ, भारत के लोग वर्तमान की निराशाजनक स्थिति से ऊब कर गांधी जी के सिधान्तों पर आधारित रचना के लियी प्रेरित न हो जाए; यही वह सबसे बड़ा खतरा हैं जिस से घबरा कर गांधी विरोधी अभियान कुटिल शक्तियों द्वारा छेड़ा गया है. .. उनके चरित्र हनन के ये अनेकों प्रयास अकारण नहीं. अन्यथा कोई कारण नहीं था की नेहरू जी की रंगीन, रोचक प्रणय कथाओं को दरकिनार करके गांधी जी को कामुक और दलील विरोधी दर्शाने वाले लेख एक के बाद एक लिखे जाते….. गांधी ईसाईयों के चुंगल में नहीं फंसे और उन्हों ने इन पर कठोर टिप्पणियाँ की हैं. धर्मांतरण पर तुरंत प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा भी इन शक्तियों को चौकाने, घबराने वाली थी. … गांधी जी कितने कामुक थे यह बात प्रेरक नहीं, प्रेरक बात तो यह है, वे महान इस लिए हैं की उन्हों ने अपनी अदम्य वासना को कठोर तप व सयं से जीत लिया था. यह प्रेरक जानकारी तो ये बेईमान देते नहीं. .. हिंद स्वराज नामक उनकी छोटी सी पर ऐसी अद्भुत पुस्तक है जो वर्तमान व्यवस्थाओं के सृष्टी, प्रकृति व मानव जाती के अनुकूल मार्ग व व्यवस्थाएं सुझाती है. विश्व के अनेक विद्वान इस पुस्तक की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते है. बस यही ऐसा ख़तरा है जिसे ये गांधी विरोधी समाप्त करना चाहते हैं कि कहीं गांधी के विचार और गांधी भारतीयों के प्रेरणा स्रोत, आदर्श न बन जाए. ज़रा ठीक से याद करें कि आप के साथ क्या हो रहा है ? आपके सारे आदर्शों, प्रेरणा के स्रोतों को धीरे-धीरे, बड़ी चालाकी से समाप्त किया गया हैकी नहीं ? . विश्व के हर देश के पास कोई आदर्श हैं, प्रेरणा पुरुष हैं. आपके पास, आपके साहित्य व पाठ्य पुस्तकों में है कोई बचा हुआ जिससे आप और आपकी संताने प्रेरणा प्राप्त कर सकें ? सब मिटा दिए गए, हटा दियी गए. गांधी विरोध भी उसी की एक कड़ी है… यदि इमानदारी से आलोचना करनी ही है तो उनके चरित्र की एकांगी नहीं, सर्वांगी चर्चा हो. एकांगी चर्चा का अर्थ है की नीयत में खोट है, पूर्वाग्रह काम कर रहे हैं. अतः इन गांधी विरोधी कथनों व लेखों से हम एक ही प्रेरणा ले सकते हैं कि गांधी जी के लेखन को स्वयं पढ़ कर अपना मत बनाएं. और उनसके जीवन के उस आयाम को जानें, उन विचारों को भी पढ़ें जिनके कारण विश्व आज भी उनका दीवाना है. टुच्चे लेखकों के कथनों से गांधी या भारत को नहीं समझा जा सकता. ***************
# आदरणीय प्रो. मधुसुदन जी से मिले प्रोत्साहन हेतु आभार.