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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-दीपक तिवारी-
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‘यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमंते देवता:” अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का निवास होता है। कहने को तो यह भारतीय संस्कृति की एक प्रगाढ़ मान्यता है, लेकिन वर्तमान समय में संस्कृत के इस श्लोक का चरितार्थ होता नहीं दिख रहा है। वरन् ठीक इसके विपरित आज भारतीय समाज में महिलाओं की उपेक्षा की जा रही है। हमारा आज का सभ्य समाज नारी को बोझ समान मानता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, कन्या भ्रूण हत्या का तेजी से बढ़ता हुआ ग्राफ।

इससे पहले कि हम आगे बढ़े आइए नजर डालते हैं- नारी के अस्तित्व पर। नारी के ऐसे अनेकों रूप हैं। वह मां है और बेटी भी वह दोस्त भी है और पत्नी भी। नारी के ऐसे अनेकों रूप हैं। लेकिन नारी का सबसे पवित्र स्वरूप होता है मां का। एक मां लाखों नहीं बल्कि करोड़ों दुखों को सहन करके भी हर परिस्थिति में अपने संतान के सुख की कामना करती है। पौराणिक काल से चाहे वह कृष्णलीला हो या रामायण मां की ममता का बखूबी वर्णन देखने को मिलता है। माँ देवकी, माँ यशोदा, माँ कौशल्या और माँ पार्वती की ममता के बारे में कौन नहीं जानता। एक सुप्रसिद्ध गाने की चंद पंक्तियां याद आती है कि ‘पूत कपूत सूना है लेकिन माता नहीं कुमाता” अर्थात बेटा नालायक हो सकता है, लेकिन मां कभी कुमाता नहीं हो सकती।
मित्रों, कहने का तात्पर्य बस इतना है कि यदि समाज में नारी का इतना महत्व है तो आज के वर्तमान समय में उसे इतना उपेक्षित क्यों माना जा रहा है? आखिर क्या वजह है कि आज समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार का ग्राफ लगातार ब$ढता ही जा रहा है? आखिर वह कौन सा कारण है जिसकी वजह से आज नारी मात्र ‘भोगने” का साधन भर बन कर रह गई है? चाहे वह दामिनीकांड हो या बदायूंकांड, आखिर वह क्या वजह है कि पूजन तुल्य नारी पर आज लगातार अत्याचार किया जा रहा है। उसे कभी दहेज के नाम पर तो कभी बेटा पैदा करने के नाम पर प्रताड़ित किया जा रहा है। क्या यही है हमारा सभ्य समाज ?

आज हर क्षेत्र में महिलाएं न केवल पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं बल्कि उनसे आगे भी निकल रही है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, या चिकित्सा का। चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो या कोई अन्य क्षेत्र महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले बाजी मार रही हैं। ऐसे में समाज द्वारा महिलाओं पर अत्याचार करना कहां तक उचित है? क्या कभी वह दिन आ पाएगा जब एक अकेली महिला रात के २ या ३ बजे भी अपने घर से बेफिक्र होकर बाहर निकले? शायद हां, लेकिन उसके लिए हमें हमारी मानसिकता बदलनी होगी और नारी को हवस पूर्ति का साधन न मानते हुए उसे हमारे समाज का एक मजबूत कड़ी समाज का एक अभिन्न एवं महत्वपूर्ण हिस्सा मानना होगा। दोस्तों हम सबके घर में बहन-बेटी तो है हीं ऐसे में यदि हम ये चाहते हैं कि उन पर किसी की बुरी नजर ना पड़े, वह किसी हवसखोर का शिकार न बनें तो सबसे पहले हमें महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। क्योंकि बदलाव की शुरुआत खुद से होती है। दोस्तों मैं हमेशा से यही कहते आया हूं कि सोच बदलो, देश बदलेगा और तभी जाकर सही मायने में’ यत्र पूज्यते नार्यस्तु तत्र रमने देवता:” का सही मायने में चरितार्थ हो पाएगा।

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