लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

यह मार्क्सवाद की ओर लौटने की बेला है। जो लोग नव्य उदारतावाद के साथ साम्यवाद पर हमलावर हुए थे वे अपने हाथों अपने पेट में छुरा भोंक चुके हैं। हम भारतवासी सच को देखें और आंखें खोलें। आर्थिकमंदी ने अमेरिका की जनता की कमर तोड़ दी है। उन सभी लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है जो पूंजीवादी चेपियों और थेगडियों के जरिए नव्य-उदार आर्थिक संकट के निबट जाने की कल्पना कर रहे थे। सभी रंगत के पूंजीवादी अर्थशास्त्री और राजनेता प्रतिदिन भावी सुनहरे समय का सपना दिखा रहे थे और आश्वासन पर आश्वासन दे रहे थे उनके लिए आर्थिकमंदी ने पराभव का मुँह दिखाया है। मंदीजनित संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह मार्क्सवाद सही और नव्य-उदारतावाद गलत का साफ संदेश है।

दुनिया में कोई देश नहीं है जिसको मंदी ने प्रभावित न किया हो। इसकी चपेट में अमेरिका से लेकर भारत,चीन से चिली तक सभी देश शामिल हैं। नव्य उदारतावाद और भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजी की ग्लोबल लूट और गरीबी को वैधता प्रदान की गयी। अमेरिका में विगत वर्ष हुए राष्ट्रपति चुनाव में मंदीजनित संकट एक बड़ा सवाल था जिस पर राष्ट्रपति ओबामा को बड़ी जीत मिली थी। ओबामा ने वायदे के अनुसार कुछ उदार कदम भी उठाए हैं और उद्योग जगत को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया। इस पैकेज में दिए गए सभी संसाधनों का अभी तक कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया है। अमेरिका में मंदी के कारण पैदा हुई बेकारी कम होने का नाम नहीं ले रही है।

अमेरिका के श्रम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वहां बेकारी की दर 9.6 प्रतिशत थी जो मंदी के पैकेज की घोषणा के बाद कम होने की बजाय बढ़ी है और आज 16.7 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। अमेरिका में बेकारी खत्म करने के लिए नए 22 मिलियन रोजगारों की जरूरत होगी। अमेरिका में ऐसा शासन और समाज चल रहा है जिसका कमाने से ज्यादा खर्च करने पर जोर है। वहां लोग जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। घर के लिए कर्ज से लेकर एटीएम से कर्ज लेने वालों की संख्या करोड़ों में है।

आश्चर्य की बात है कि मंदी के बाबजूद अमीरों की मुनाफाखोरी, फिजूलखर्ची और घूसखोरी बंद नहीं हुई है। मंदी के दो प्रधान कारण हैं पहला है भ्रष्टाचार, जिसे सभी लोग इन दिनों ‘क्लिप्टोक्रेसी’ के नाम से जानते हैं। भ्रष्टाचार के नाम पर जनता का निर्मम शोषण हो रहा और जमकर घूसखोरी हो रही है। यह काम सरकारों और नौकरशाही के द्वारा खुलेआम हो रहा है। भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का महिमामंड़न चल रहा है। इन लोगों ने निजी और सार्वजनिक सभी स्थानों पर अपना कब्जा जमा लिया है।

यह अचानक नहीं है कि जो जितना बड़ा भ्रष्ट है वह उतना ही महान है। हमारे हिन्दी शिक्षण के पेशे से लेकर विज्ञान तक,अफसरों से लेकर जजों तक,मंत्रियों से लेकर पंचायत सदस्यों तक भ्रष्ट व्यक्ति की तूती बोल रही है। ये लोग बड़े ही बर्बर ढ़ंग से शोषण कर रहे हैं। इन लोगों को सत्ता,मुनाफा और पैसा की असीमित भूख है। इसके कारण साधारण आदमी के लिए सामान्यतौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ शासन और कामकाज के अवसरों में तेजी से कमी आई है। दूसरी ओर आम जनता की क्रयशक्ति घटी है, आमदनी में कम आई है। मंहगाई,बैंक कर्जों और असमान प्रतिस्पर्धा ने आम आदमी की जिंदगी की तकलीफों में इजाफा किया है। इससे चौतरफा सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना है।

मंदी ने अमेरिका की बुरी गत बनायी है। 15 मिलियन से ज्यादा लोग बेकार हो गए हैं। कुछ शहरों का आलम यह है कि वहां आधी आबादी गृहविहीन है। 38 मिलियन लोगों को खाने के कूपन दिए जा रहे हैं। इतने बड़े अभाव को अमरीकी समाज ने विगत 50 सालों में कभी नहीं देखा था। अमेरिका में गरीबों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत में भी स्थिति बेहतर नहीं है। गरीबी यहां भी बढ़ी है। भारत और अमेरिका में गरीबी का बढ़ना इस बात का संकेत है कि नव्य उदारतावाद का नारा पिट गया है।

आज हमारा समूचा परिवेश मुक्तव्यापार, मुक्तबाजार और अबाधित सूचना प्रवाह में कैद है। इससे निकलने के लिए जिस तरह की सांगठनिक संरचनाओं और वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है उसके संवाहक दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं,इसने आम आदमी को हताश,असहाय, और दिशाहारा बनाया है।

‘क्लिप्टोक्रैसी’ के कारण बिहार से लेकर असम तक, कॉमनवेल्थ खेलों से लेकर संचार मंत्रालय तक अरबों रूपये के घोटाले हो रहे हैं लेकिन न कोई आंदोलन है और न कोई भारतबंद है। प्रतिवाद को शासकवर्ग के लोगों ने मीडिया बाइट्स में तब्दील कर दिया है।

देश की सुरक्षा के नाम पर जितना धन इन दिनों खर्च किया जा रहा है उतना पहले कभी खर्च नहीं किया गया। सुरक्षा पर जिस गति से खर्चा हो रहा है उस अनुपात में सामान्य सुरक्षा वातावरण तैयार करने और आम लोगों का दिल जीतने में शासकों को मदद नहीं मिली है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व सुरक्षाबलों की असफलता का आदर्श उदाहरण हैं।

‘क्लिप्टोक्रैसी’ की लूट में रूचि होती है आम लोगों का दिल जीतने में रूचि नहीं होती। इसके कारण अमीर और ज्यादा अमीर हुए हैं। गरीब और ज्यादा गरीब हुआ है। संपदा संचय चंद घरानों के हाथों में सिमटकर रह गया है। ये लोग एक प्रतिशत से भी कम हैं और संपदा का बहुत बड़ा हिस्सा इनके पास है।

भारत में ‘क्लिप्टोक्रैसी’ का आधार है सरकार द्वारा सार्वजनिक विकास के नाम किया जाने वाला खर्चा। विकास योजनाएं मूलतः लूट योजनाएं बन गयी है। लूट का दूसरा बड़ा स्रोत है घूसखोरी। लूट का तीसरा बड़ा क्षेत्र है किसानों और आदिवासियों की जमीन और संसाधन। इस लूट की व्यवस्था में सभी लोग समान हैं। लोकतंत्र में अमीर और गरीब के बीच में समानता त्रासदी है। समान अवसरों की बात उपहास है। हर आदमी अपने लिए कमाने में लगा है,उसके पास इतना समय नहीं है कि वह दूसरों के बारे में सोच सके।

हमारे देश में अमेरिका के बारे में तरह-तरह के भ्रम पैदा किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा भ्रम तो यही पैदा किया जा रहा है कि अमेरिका हमारा स्वाभाविक दोस्त है। बड़े कौशल के साथ यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका कोई साम्राज्यवादी देश नहीं है। बहुराष्ट्रीय निगमों के बारे में बताया जा रहा है कि वे हमारे देश में सिर्फ विकास के लिए आ रही हैं। शोषण और उत्पीड़न से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे तो हमारी मदद के लिए आ रही हैं। वे हमें आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि हमें अपने यहां विकास का चरमोत्कर्ष हासिल करना है तो अमेरिकी मॉडल का अनुकरण करें। अमेरिकी मॉडल का इस्तेमाल करते हुए हम अपनी भौतिक संपदा और आम लोगों की जीवनशैली में जबर्दस्त उछाल पैदा कर सकते हैं। प्रति व्यक्ति भौतिक उपभोग को उच्चतम स्तर तक ले जा सकते हैं।

अमरीकी आर्थिक मॉडल कितना सार्थक है इसके लिए आज किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है अमेरिकी अर्थव्यवस्था चरमराकर गिर गयी है। आज अमेरिका में चारों ओर दुख ही दुख है। नव्य उदारतावाद का ग्लैमर, मीडिया और संचार क्राति का जादू अपना असर खो चुका है। विगत 25 सालों में अमेरिकी जनता के जीवन में दुखों में इजाफा हुआ है। अमेरिकी जनता के जीवन में दुख बढ़े हैं और सुख घटे हैं।

अमेरिकी मॉडल जनोन्मुख है या जनविरोधी है इसका आधार है शांति और तनावमुक्त जीवनशैली। अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर चल रही है तो आम जनता के जीवन में शांति, सुरक्षा, विश्वास और आनंद का विकास होना चाहिए, लेकिन परिणाम इसके एकदम विपरीत आए हैं अमेरिकी जीवन में अशांति,असुरक्षा और सामाजिक और व्यक्तिगत तनाव में इजाफा हुआ है। हताशा बढ़ी है। सामान्य अमेरिकी नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि उनके जीवन में इतनी व्यापक अशांति,असुरक्षा और तनाव कैसे आ गया। समाज के एक बड़े हिस्से की जीवनशैली का तानाबाना तहस-नहस हो गया है।

सामाजिक-आर्थिक स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि कमाऊ और मौज उडाऊ के बीच में वैषम्य घटा नहीं है बल्कि बढ़ा है। सन् 1968 में जनरल मोटर्स के सीईओ को इसी कंपनी के कर्मचारी की तुलना में 66 गुना ज्यादा पगार मिलती थी। यह वैषम्य घटने की बजाय बढ़ा है आज वालमार्ट कंपनी के सीईओ की पगार इसी कंपनी के एक कर्मचारी की पगार की तुलना में 900गुना ज्यादा है। अकेले वालमार्ट परिवार के पास 90 बिलियन डॉलर की संपदा है जबकि इतनी संपदा अमेरिकी की 40 फीसदी आबादी के पास है।

संपदा के निजी इजारेदारियों के हाथों में केन्द्रीकरण ने भयानक आर्थिक वैषम्य पैदा किया है। अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार ‘नेशन’ के अनुसार अमेरिका के अति समृद्धों का आर्थिकमंदी में कुछ नहीं बिगाड़ा है लेकिन मझोले अमीरों पर इसकी मार पड़ी है। न्यूयार्क टाइम्स ने अगस्त 2009 में लिखा था कि अमेरिका में जिन लोगों के पास 30 मिलियन डॉलर की संपत्ति है ऐसे लोगों की संपदा घटी है।

अमेरिका में रहने वाले अफ्रीकी-अमेरिकन,कम कौशल का काम करने वाले कर्मचारियों की आय में गिरावट आयी है। ‘नेशन’ ने लिखा ‘‘Although they differ in theme and emphasis, the essays here, commissioned in conjunction with the Next Social Contract Initiative of the New America Foundation, are united by a belief that deep, persistent inequality doesn’t merely affect less privileged Americans. It affects everyone, rending the social fabric, distorting our politics and preventing America from fulfilling its promise as a nation that offers a measure of equality and opportunity to all. Inequality is also a bipartisan phenomenon, exacerbated by the neglect of both political parties and by a society whose chattering classes have grown oblivious to wealth and income disparities that no other advanced democracy tolerates.’’।

अमेरिका की वास्तविकता पर पर्दा डालकर जो लोग भारत में अमेरिकी मॉडल का जयगान कर रहे हैं और अमेरिका जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि अमेरिकी मॉडल खुद अमेरिका में धराशायी हो चुका है।

अमेरिका में व्याप्त आर्थिक असुरक्षा के बारे में रॉकफेलर फाउण्डेशन की रिपोर्ट में जो कहा गया है वह हमारी आंखे खोलने के लिए काफी है। यह संस्थान घनघोर प्रतिक्रियावादी विचारकों का अड्डा है। इस रिपोर्ट को येल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेकब हेकर ने तैयार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 25 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों की आय में गिरावट आयी है। इन परिवारों की आय में अचानक से आई गिरावट का किसी को पहले से आभास तक नहीं था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1985 में आर्थिक असुरक्षा से अमेरिका में 12.2 प्रतिशत परिवार प्रभावित थे। जिनकी संख्या सन् 2000 में बढ़कर 17 प्रतिशत हो गयी। सन् 2007 को सुंदर आर्थिक साल माना जाता है इस साल आर्थिक असुरक्षा 1985 के स्तर से ज्यादा थी। यानी 13.7 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के दायरे में थे।

सन् 2009 से आर्थिक तबाही का जो सिलसिला आरंभ हुआ है उसके कारण स्थिति और भी भयावह बनी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 1996 और 2006 के बीच में तकरीबन 60 प्रतिशत अमेरिकी आर्थिक असुरक्षा के घेरे में आ चुके हैं। आम अमेरिकी नागरिक की पगार स्थिर है या कम हुई है। जबकि अनिवार्य खर्चे बढ़े हैं। ज्यादातर अमेरिकी नागरिकों के पास किसी भी किस्म की बचत नहीं हो पाती। बैंकों में उनके नाम से एक भी पैसा बचत खातों में नहीं है। वे जितना कमाते हैं उससे ज्यादा के उनके पास खर्चे हैं।

पहले अमेरिका में बेकार नागरिकों को थोड़े अंतराल के बाद काम मिल जाता था लेकिन विगत कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि बेरोजगारों को काम के लिए बहुत ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ता है। बेकारी का समय लंबा होने से आर्थिक असुरक्षा ने एक नया आयाम हासिल कर लिया है। अब बेकार और मध्यवर्ग के लोग 35 साल की उम्र में ही बूढ़ापे का अनुभव करने लगे हैं।

अमेरिका के फिलिप्स सेण्टर फॉर हेल्थ एंड वेल-बिंग का ताजा रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक संकट और बेकारी के कारण मध्यवर्ग के अमरीकी नागरिक 35 साल की उम्र में ही बूढ़ा महसूस करने लगे हैं। 75 पर्तिशत लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से घिरे हुए हैं। बूढ़ापा और बीमारियां 30 साल की उम्र में एक अमेरिकी युवा को घेर रही हैं।

डेनिस पाराडिनिज ने अपनी किताब ‘‘Quality of Life’’ में लिखा “Feeling there is a possibility of losing your job and not being able to afford to pay your child’s school fees, or having to cancel that trip you planned a long time ago, certainly causes worry and anxiety”. एक मनोशास्त्री ने कहा है “And of course this begins to affect other areas of quality of life, causing insomnia, anxiety and even depression”. इस सबका उनके मोटापे, शरीर और उम्र पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।

आम अमेरिकी की इन दिनों पूरी जीवनशैली बदल गयी है। एक जमाना अमेरिकी स्वस्थ माने जाते थे आज मोटे हो गए हैं। आजकल फ्रेंच लोगों से ज्यादा अमेरिकी लोग सोने और खाने पर समय खर्च करते हैं। सवाल उठता है क्या हम इसके बावजूद अमेरिकी मॉडल पर चलना पसंद करेंगे?

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3 Comments on "अमेरिका का भयावह यथार्थ और मार्क्सवाद की वापसी"

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आर. सिंह
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चतुर्वेदीजी आपको नहीं लगता की आप बहकी बहकी बातें कर रहे हैं कभी आप अमेरिका की बात करते हैं तो कभी भारत में बढ़ते भरष्टाचार की.मेरा विचार है आप एक बार अमेरिका भरमन कर आइये,तभी आपको वास्तविकता का पता चलेगा.हमारे यहाँ एक कहावत है की हाथी मरा भी तो नौलाख का. अमेरिका वही है,और अभी तो वह मरा भी नहीं है और न उसके मरने की आशा है.आप जैसे सज्जन जो व्यक्तिगत आजादी का मूल्य ही नहीं समझते वे अमेरिका को क्या समझेंगे?रही साम्यवाद के लौटने के पना देखने की बात तो सपना देखने में कोई हर्ज नहीं है,पर सबसे… Read more »
nand kashyap
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विकसित पूंजीवादी राष्ट्र अपने उपनिवेश फिर खोज रहे हैं और हमारी सर्कार उनसे सहयोग कर रही है उनके जीवन शैली का महिमामंडन हो रहा है .हमारे अपने देश में सत्ताधारी वर्ग विकास के नाम पर व्यापक जन को अपने उपनिवेश की तरह ही तो उपयोग कर रहा है .आज मार्क्सवाद ही है जो शोषित मानवता को मुक्ति के रस्ते ले जायेगा .

श्रीराम तिवारी
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bahut steek or lajabaab chitran kiya hai aapne …yh aaklan sbhi ko vidit hai kintu sbk seekhne ko burjua varg khas taur se bharat ka nav dhanaady varg taiyaar nahin …yh apne sankat ka bhar desh ki aam janta pr laadkar vyvastha men paivand lagaane ka upkrm kar raha hai.UScrisus ko gambheerta se nahin lene ki bhari keemat aglee peedhee ko nahin isi peedhee ko chukani hogi …

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