लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

Posted On by &filed under विश्ववार्ता.


7 नबम्वर महान अक्टूबर क्रांति पर विशेष-

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

पूंजीवाद स्वभावतः कृतघ्न है और समाजवाद स्वभावतः कृतज्ञ है। समाजवाद ने हमेशा पूंजीवाद की सकारात्मक बातों को माना है। लेकिन पूंजीवादी विचारक और पूंजीपतिवर्ग समाजवाद की सकारात्मक उपलब्धियों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

पूंजीवादी विचारक यह अच्छी तरह जानते हैं कि सन् 1917 की सोवियत अक्टूबर क्रांति की पहली महान उपलब्धि है गरीबों का सत्ता में आना। और सारी दुनिया को यह दिखाना कि मजदूर वर्ग भी शासन संभाल सकता है। फ्रांस की राज्य क्रांति के समय किसी के दिमाग में यह सपना नही आया था कि भविष्य में कभी मजदूरों की सरकार भी आ सकती है।

अक्टूबर क्रांति के पहले तक इतिहास में राजसत्ता को चलाने और संभालने का अनुभव अभिजात्यवर्ग को ही था। पहली बार गैर अभिजात्य वर्गों ने बोल्शेविक पार्टी के झंड़े तले एकत्रित होकर क्रांति की, और सोवियत सत्ता को संभाला। मजदूर और किसान सरकार चला सकते हैं यह बात सिद्ध की। इस धारणा को खंडित किया कि शासन चलाने की शक्ति सिर्फ अभिजनों में होती है।

सामंतों और बुर्जुआजी को सरकार चलाने का अनुभव था। लेकिन कम्युनिस्टों को 1917 की क्रांति के पहले सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। वे सरकार चलाने के मामले में अनुभवहीन थे, नीति बनाने के मामले में अनुभवहीन थे। उन्होंने प्रशासन प्रबंधन को पूंजीवाद से ग्रहण किया और संगठन बनाने की अपनी क्षमता के साथ उसका शानदार रसायन तैयार किया।

अक्टूबर क्रांति की दूसरी महान उपलब्धि है कि उसने मजदूरवर्ग को समाज का नायक बनाया। फ्रांस की राज्य क्रांति ने आधुनिक समाज के मुखिया के रूप में बुर्जुआजी को प्रतिष्ठित किया। लेकिन अक्टूबर क्रांति ने बुर्जुआजी को अपदस्थ करके मजदूरवर्ग को आधुनिकयुग के नायक के पद पर स्थापित किया।

अक्टूबर क्रांति की तीसरी महान उपलब्धि है फ्रांस की राज्य क्रांति के बाद बुर्जुआजी ने जो वादे किए थे वह उन्हें पूरा करने में असफल रहा। उसकी इसी असफलता के रूप में नये पूंजीवादी राज्य का साम्राज्यवाद, बड़ी इजारेदारियों, उपनिवेशवाद आदि में रूपान्तरण हुआ और प्रथम विश्वयुद्ध हुआ जिससे यह सिद्ध हो गया था कि बुर्जुआजी समाज को संतुष्ट रखने, खुशहाल रखने, आजादी देने आदि के मामले में बुरी तरह असफल है।

जबकि अक्टूबर क्रांति ने यह मिथ तोड़ा कि पावर का केन्द्र बुर्जुआजी है। उसने यह मिथ भी तोड़ा कि मजदूर सिर्फ कामगार है, नौकर है। अक्टूबर क्रांति का यह महान योगदान है कि उसने मजदूरवर्ग को पावर के केन्द्र में स्थापित किया। अब मजदूरवर्ग सिर्फ वस्तु बनाने वाला कारीगर मात्र नहीं था। बल्कि उसे पावर के रूप में, सत्ता संघर्ष की सबसे मजबूत कड़ी के रूप में कम्युनिस्टों ने प्रतिष्ठा दिलायी।

आज सारी दुनिया में मजदूरवर्ग ही अकेला ऐसा वर्ग है जो बुर्जुआजी को सीधे चुनौती दे रहा है। बुर्जुआजी को समाज के किसी भी वर्ग से भय नहीं लगता उसे भय लगता है तो एकमात्र मजदूरवर्ग से।

मजदूरवर्ग की शक्तिशाली इमेज बनाने में कम्युनिस्ट आंदोलन और विश्वव्यापी मजदूर आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज सारी दुनिया में कोई भी सरकार मजदूरवर्ग के हितों की अनदेखी करके टिक नहीं सकती। यह अक्टूबर क्रांति की महान उपलब्धि है।

सन् 1917 की अक्टूबर क्रांति का सबसे बड़ा योगदान है इसने विषमता के मिथ को तोड़ा है। यह माना जाता था विषमता तो प्रकृति की देन है, ईश्वरकृत है और पूर्वजन्म के कर्मों का फल है। कम्युनिस्टों ने इन सब बातों को वास्तव जीवन में खारिज करके दिखाया है। इससे यह चेतना पैदा करने में मदद मिली है कि विषमता प्राकृतिक, ईश्वरकृत या पूर्वजन्म के कर्मों का फल नहीं होती बल्कि वर्गीय शोषण के गर्भ से विषमता का जन्म होता है। विषमता के भौतिक कारण होते हैं।

विषमता पैदा करने में पूंजीपतिवर्ग की निर्णायक भूमिका होती है। पूंजीपतिवर्ग समाज का उद्धारकवर्ग नहीं बल्कि शोषकवर्ग है। यह बात सारी दुनिया के ज़ेहन में उतारने में अक्टूबर क्रांति ने मील के पत्थर का काम किया है। अक्टूबर क्रांति के बाद पूंजीपतिवर्ग ने धीरे-धीरे पूंजीपति के नाम से अपने को सम्बोधित करना ही बंद कर दिया, सारी दुनिया में पूंजीपति वर्ग के प्रति घृणा की लहर पैदा हुई जिसका असर आज भी बाकी है। आज भी सारी दुनिया के लोगों में अधिकांश लोग पूंजीपतिवर्ग से नफ़रत करते हैं। और मजदूरों के प्रति प्रेम बढ़ा है।

अक्टूबर क्रांति के पहले मजदूरों-किसानों, वंचितों और हाशिए के लोगों में स्वतंत्रता की धारणा उतनी प्रबल नहीं थी जितनी प्रबल अक्टूबर क्रांति के बाद हुई। स्वतंत्रता और समानता की बुर्जुआ अवधारणा के विकल्प के रूप में नयी स्वतंत्रता और समानता की अवधारणा का उदय हुआ। अक्टूबर क्रांति के पहले स्वतंत्रता का अर्थ वही था जो फ्रांस की राज्य क्रांति ने निर्मित किया था। तब स्वतंत्रता का अर्थ था व्यापार और बाजार की स्वतंत्रता। सामाजिक समूहों की स्वतंत्रता के रूप में, हाशिए के लोगों की स्वतंत्रता के रूप में साधारणतौर पर अक्टूबर क्रांति के बाद ही सोचना आरंभ हुआ।

साधारण लोगों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ महज बोलने की आजादी नहीं है। यह स्वतंत्रता का सीमित दायरा है। मनुष्य के बोलने का उसके सामाजिक अस्तित्व के साथ संबंध होता है। मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व के सवालों को स्वतंत्रता के साथ जोड़ने कारण ही कालांतर में सारी दुनिया में विभिन्न सामाजिक समूहों और वर्गों ने अपने अस्तित्व रक्षा के सवालों को अभिव्यक्ति दी। आजादी और स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखा। बुर्जुआजी ने स्वतंत्रता के जिस पैराडाइम का निर्माण किया था उसे पूरी तरह बदला।

मजदूरवर्ग ने श्रम को पूंजी के जुए से मुक्त करने के महान लक्ष्य के साथ स्वतंत्रता को जोड़ा था। बुर्जुआ स्वतंत्रता श्रम को वह पूंजी के जुए से मुक्त नहीं कर पाती इसके कारण बहुसंख्यक समाज के लिए स्वतंत्रता निरर्थक बनकर रह जाती है। पूंजी के जुए में बंधे रहकर जहां तक जा सकते हो वहां तक स्वतंत्रता है।

बुर्जुआजी के लिए स्वतंत्रता सिर्फ़ व्यापार तक सीमित थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वह बहुत ही सीमित अर्थ में, अपने हितों के संरक्षण के संदर्भ में इस्तेमाल करता था।

अक्टूबर क्रांति ने आम लोगों को चीजों को एक-दूसरे के साथ जोड़कर देखने की आदत पैदा की। स्टीरियोटाइप सरलीकरणों से राजनीति को मुक्त किया। बुर्जुआजी ने स्वतंत्रता के पास मनुष्य को खड़ा रखने की बजाय निजी संपत्ति को खड़ा किया और इस तरह उसने निजी संपत्ति और स्वतंत्रता में साँठगाँठ पैदा कर दी। अक्टूबर क्रांति ने स्वतंत्रता के साथ निजी संपत्ति की जगह मनुष्य को खड़ा कर दिया, मजदूरवर्ग को खड़ा कर दिया। उसने स्वतंत्रता की अंतर्वस्तु में से निजी संपत्ति को निकाल दिया।

अक्टूबर क्रांति ने हमारे सामने यह सवाल खड़ा किया कि हम स्वतंत्रता सहित मनुष्य चाहते हैं? या मनुष्यरहित और संपत्तिसहित स्वतंत्रता चाहते हैं? संपत्तिसहित स्वतंत्रता का अर्थ है अमीरों के वर्चस्व का बना रहना। शोषकों के वर्चस्व का बने रहना। बोल्शेविकों ने इस वर्चस्व को चुनौती दी और सारी दुनिया को स्वतंत्रता के नए मार्ग पर चलने की सीख दी है और आज सारी दुनिया इस सीख से लाभ उठा रही हैं। विभिन्न गैर -बुर्जुआ समुदाय अपने लिए स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक अस्तित्व के सवालों को सारी दुनिया ने अन्तर्ग्रथित मान लिया है और आज ये विश्व मानवाधिकारों के चार्टर का हिस्सा हैं। दुनिया के अधिकांश देश इसे मान्यता देने को बाध्य हुए हैं।

सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में समाजवादी व्यवस्था के पराभव के बाद सारी दुनिया में पूंजीवादी प्रचारकों ने हल्ला मचाना आरंभ कर दिया कि क्रांति हार गयी है। समाजवाद खत्म हो गया है। साम्यवाद की मौत हो गयी है। मार्क्सवाद का अंत हो गया है। लेकिन यह सच नहीं है। इस बात को समझने के लिए हम फ्रांस की राज्य क्रांति का उदाहरण सामने रखकर विचार करें तो शायद ठीक से समाजवाद के विश्वव्यापी असर के बारे में सही ढ़ंग से अनुमान लगा सकें।

फ्रांस की राज्य क्रांति ने लोकतंत्र, समानता और बंधुत्व की महान धारणा दी। फ्रांस की राज्य क्रांति कितने दिन तक बनी रह पायी? बमुश्किल दो साल टिके रह पायी। इन दो सालों में उन्होंने जो काम किया उसकी सारी दुनिया आज भी ऋणी है। इसकी तुलना में सोवियत समाजवादी अक्टूबर क्रांति 60 साल तक रही और उसने जो काम किए उनका असर कुछ देशों में समाजवादी व्यवस्था के पराभव के बाबजूद सारी दुनिया में ज्यों का त्यों बना हुआ है। समाजवादी क्रांति ने जो अधिकार आदमी को दिए, जो शक्ति और संपदा दी वह अक्षुण्ण है। सिर्फ शक्ति संतुलन बदला है।

क्रांतियां व्यर्थ नहीं जातीं। वे समाज में गहरे परिवर्तन के निशान छोड़ जाती हैं। समस्या यह है कि हम उन परिवर्तनों को सही परिप्रेक्ष्य में समझें। मजदूरवर्ग और सारी दुनिया का वंचित समाज अक्टूबर क्रांति के प्रति कृतज्ञ है उसने वंचितों और हाशिए के लोगों को जीने का नया मंत्र दिया। सामाजिक संघर्ष का नया विवेक दिया है और सबसे बड़ा विवेक यह दिया है कि पूंजीपतिवर्ग को पछाड़ना चाहते हो, पूंजीवादी समाज में सुखी रहना चाहते हो तो अपना संगठन बनाओ, संगठनबद्ध होकर जीना सीखो। मजदूरवर्ग और श्रम का सम्मान करना सीखो, मजदूरवर्ग कमजोर वर्ग नहीं है बल्कि सामाजिक परिवर्तन की धुरी है।

Leave a Reply

3 Comments on "क्रांतियां व्यर्थ नहीं जातीं"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
AJIT BHOSLE
Guest
वामपंथ (कथित रूप से साम्यवाद ) सीधे-सादे मजदूरों को मुर्ख बनाने का कुछ चालाक नेताओं का अपना उल्लू सीधा करने का प्रपंच मात्र है, इन्दोर, उज्जेन, की कई मिले, ग्वालियर की विश्व-प्रसिद्ध जियाजी कोटन मिल आदि, आदि, आदि,आदि कितने बार आदि लगाऊं समझ नहीं आ रहा कितने कारखाने, मिले, संस्थान इन वाम-पंथियों के स्वार्थ की भेंट चढ़ गए उन का जिक्र नहीं किया जा सकता, मजदूरों के हक दिलाने के नाम पर इन लोगों ने कितने लोगों के मुह से निवाला छीना है यह या तो कोई भुक्त-भोगी ही बता सकता है या उससे सम्भंदित उसके परिवार जन, दुःख की… Read more »
mattum1502
Guest
अच्छा लेख , मूलभूत साम्यवाद सिद्धांत की अगर कोइ बात मुझे अच्छी लगी तो वो है अन्याय के विरुद्ध संगठित आवाज उठाना . सच है अन्याय करने वाले से अन्याय सहने वाला ज्यादा गुनाहगार होता है और ये मूलभूत मंत्र यथार्थ में सच कर दिखाना वाकई उस ज़माने में एक चमत्कार ही था . पर मैं एक प्रश्न आप सभी वामपंथी विचारको से करूँगा क्या हर चीज की अति विनाशकारी नहीं होती है ? मेरे कानपुर में एल्गिन मिल , लाल इमली , जे . के. जूट मिल आदि तमाम बड़ी मीले थी जिन में जिनमे लाखो मजदुर अपना पेट… Read more »
श्रीराम तिवारी
Guest

सत्यम शिवम् सुन्दरम ……..दीपावली की शुभकामनाएं ……आदरणीय चतुर्वेदीजी और देश -दुनिया के उन तमाम सत्यनिष्ठ -मेहनत कश,धर्मनिरपेक्ष ,और जनवादी मूल्यों में जिनका अटूट विश्वास है …..बेहतर आलेख के लिए बधाई …..प्रवक्ता .कॉम के भाई संजीव जी और भाई भारत को धन्यवाद और बधाई …..

wpDiscuz