लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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nuclear-plantपरमाणु सप्लायर्स ग्रुप की वार्षिक बैठक जून में फिर होने वाली है। इसमें यह मुद्दा फिर उठेगा कि भारत को इसका सदस्य बनाया जाए या नहीं? इसकी सदस्यता का लाभ यह है कि जो भी राष्ट्र इसका सदस्य होता है, उसे परमाणु तकनीक, ईंधन, यंत्र आदि खरीदने और बेचने की खुली सुविधा मिल जाती है। इस समय इसके 48 राष्ट्र सदस्य हैं, जिनमें पांचों महाशक्तियां भी शामिल हैं। इसमें वे चार राष्ट्र सदस्य नहीं हैं, जो परमाणु शक्तिसंपन्न भी माने जाते हैं। भारत, पाकिस्तान, इस्राइल और दक्षिण सूडान! इसका सदस्य होने की पहली शर्त यह है कि आपको परमाणु-अप्रसार संधि पर दस्तखत करना होंगे।

भारत ने न तो इस पर आज तक दस्तखत किए हैं और न ही करने का उसका इरादा है। चीन कहता है कि भारत जब तक दस्तखत न करे, तब तक इसमें उसका प्रवेश असंभव है। अमेरिका कहता है कि भारत को दस्तखत करने की जरुरत ही नहीं है, क्योंकि भारत उन सब नियमों का पालन कर रहा है, जो इस संधि में लिखे हुए हैं। इसीलिए अमेरिका ने अपना कानून बदलकर भारत के साथ 2008 में परमाणु-सौदा किया था। चीन साफ-साफ नहीं बोलता है लेकिन उसका दृढ़ संकल्प है कि भारत के साथ-साथ पाकिस्तान भी इसका सदस्य बनाया जाए।

पाकिस्तान को लेकर कई अन्य सदस्य और अमेरिका भी उत्साहित नहीं है, क्योंकि परमाणु अप्रसार में पाकिस्तान की भूमिका आपत्तिजनक रही है। उस पर परमाणु-सामग्री चुराने और उत्तर कोरिया व ईरान-जैसे देशों को बेचने के आरोप हैं। उसने इस संधि के कई प्रावधानों का उल्लंघन किया है लेकिन जहां तक बम बनाने का सवाल है, मेरी अपनी राय है कि दोनों ही निर्दोष हैं, क्योंकि दोनों ने संधि पर दस्तखत नहीं किए थे। दोनों राष्ट्रों ने पांचों महाशक्तियों की परमाणु दादागीरी को चुनौती दी थी। अब यदि दोनों को ही परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत करने दिए जाएं और परमाणु-शक्ति के रुप में करने दिए जाएं तो इसमें गलत क्या है?

असली मुद्दा यही है। परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) की शर्तों को बदलना पड़े तो बदला जाए। दुबारा लिखें इसे। पांचों महाशक्तियां नहीं चाहतीं कि महाशक्त्यिों की संख्या 5 की बजाय 7 हो जाए। परमाणु-सप्लायर देशों को भारत बिना सदस्यता के भी इसीलिए स्वीकार्य है कि उससे उन्हें अरबों रु. की आमदनी होगी लेकिन पाकिस्तान तो खुद फटे-हाल है। उससे उन्हें क्या मिलना है? वह परमाणु-भट्टियां क्या खरीदेगा? उसे एफ-16 जहाज भी मुफ्त में चाहिए। पाकिस्तान की मदद करने के लिए चीन कोई न कोई बहाना निकाल लाता है। इसीलिए परमाणु सप्लायर्स ग्रुप में भारत का शामिल होना फिलहाल जरा मुश्किल दिखता है।

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