लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना
हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत एक बार फिर कट्टरपंथियों की परवाह न करते हुए जनहित याचिका के माध्यम से तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिये कमर कस रहा है। धार्मिक रूढ़िवादी मान्यताओं से परे हट कर सुप्रीम कोर्ट ने मनमर्जी के तलाक, पहली पत्नी के रहते पति के दूसरी शादी रचाने के कारण सुरक्षा से वंचित हो रही मुस्लिम महिलाओं के दर्द पर गंभीर रुख अपनाया है।सुप्रीम कोर्ट आम भारतीय महिलाओ की तरह मुस्लिम महिलाओं को भी उनको उनका हक दिलाने में सफल हो जाता है तो आजादी के सात दशको के बाद कई ‘शाहबानों’ की तकदीर बदल सकती हैं।इसी तरह का एक प्रयास आज से तीन दशक पूर्व भी कोर्ट ने किया था,लेकिन तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने शाहबानों को इंसाफ दिलाने वाला कानून ही रद्द कर दिया था। इसी वजह से 1986 का शाहबानो प्रकरण भारत में राजनीतिक विवाद को जन्म देने के लिये हमेशा चर्चा मे रहा है। इसे हमेशा कांगे्रस के राजनैतिक फायदे के लिये अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है।
मध्य प्रदेश की रहने वाली शाहबानो एक ६२ वर्षीय मुसलमान महिला और पाँच बच्चों की माँ थीं जिन्हें 1978 में उनके पति ने तालाक दे दिया था। मुस्लिम पारिवारिक कानून के अनुसार पति, पत्नी की मर्जी के खिलाफ ऐसा कर सकता है। अपनी और अपने बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो पति से गुजारा लेने के लिये अदालत पहुचीं। उच्चतम न्यायालय तक पहुँचते मामले को सात साल बीत चुके थे। न्यायालय ने अपराध दंड संहिता की धारा १२५ के अंतर्गत निर्णय लिया जो हर किसी पर लागू होता था, चाहे वो किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो। न्यायालय ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाय।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लाखों पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के हक के लिये ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकता था,लेकिन भारत के रूढविादी मुसलमानों ने इस निर्णय को उनकी संस्कृति और विधानों पर अनाधिकार हस्तक्षेप बता कर हंगामा खड़ा करना शुरू कर दिया। तमाम मुस्लिम संगठनों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जमकर विरोध किया। उनके नेता और प्रवक्ता एम जे अकबर और सैयद शाहबुद्दीन थे। इन लोगों ने ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड नाम की एक संस्था बनाई और सभी प्रमुख शहरों में आंदोलन की धमकी दी। कहीं मुस्लिम वोट बैंक बिदक न जाये इसलिये उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मान लीं और इसे ‘धर्म-निरपेक्षता’ के उदाहरण के स्वरूप में प्रस्तुत किया गया,जबकि कांगे्रस के ही एक नेता और सांसद आरिफ मोहम्मद खान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में थे और वह चाहते थे कि शाहबानों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार उसका हक मिले,लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई।सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ समय बाद ही 1986 में, कांग्रेस (आई) पार्टी ने, जिसे संसद में पूर्ण बहुमत प्राप्त था, एक कानून पास किया जिसने शाह बानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया।नये कानून में कहा गया कि वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता १९७३ की धारा १२५ के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा, चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो।क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, उच्चतम न्यायालय के धर्म-निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाले, मुस्लिम महिला (तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया। इस कानून के कारणों और प्रयोजनों की चर्चा करना आवश्यक है। कानून के वर्णित प्रयोजन के अनुसार जब एक मुसलमान तालाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुजारा नहीं कर सकती है तो न्यायालय उन संबंधियों को उसे गुजारा देने का आदेश दे सकता है, जो मुसलमान कानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। परंतु-अगर ऐसे संबंधी नहीं हैं अथवा वे गुजारा देने की हालत में नहीं हैं-तो न्यायालय प्रदेश वक्फ बोर्ड को गुजारा देने का आदेश देगा।इस प्रकार से पति के गुजारा देने का उत्तरदायित्व इद्दत के समय के लिये सीमित कर दिया गया।इसके बाद भारतीय जनता पार्टी सहित हिन्दूवादी संगठनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया था।
बीते तीस वर्षो में काफी बदलाव आ चुका है।उस समय कट्टरपंथी मुसलमानों को खुश करने के लिये शाहबानों और उनकी जैसी लाखों तलाकशुदा मुस्लिमों के साथ नाइंसाफी करने वाली कांगे्रस हाशिये पर है और शाहबानों प्रकरण में राजीव गांधी सरकार को घेरने वाली भारतीय जनता पार्टी की देश में सरकार है।वहीं उस समय शाहबानों केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ मोर्चा संभाले कांगे्रसी नेता और पत्रकार एम0 जे0 अकबर अब भाजपाई हो गये है।आज की तारीख में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के हक में सुप्रीम कोर्ट का कोई भी फैसला आता है तो इस बात की उम्मीद न के बराबर है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ राजीव गांधी की तरह कोई कानून लायेगी।दरअसल,सुप्रीम कोर्ट ने मनमर्जी के तलाक और पहली पत्नी के रहते पति के दूसरी शादी रचाने के कारण सुरक्षा से वंचित हो रही मुस्लिम महिलाओं के दर्द पर गंभीर रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़ी खबरों को एक जनहित याचिका में तब्दील करने का संकेत दिया है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर अटार्नी जनरल और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(नाल्सा ) से भी जवाब मांगा है।सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा है,‘यह धर्म का नहीं महिलाओं को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत मिले बराबरी और आजादी व सम्मान से जीने के मौलिक अधिकारों से जुड़ा मामला है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने की जरूरत है। हम देख रहे हैं कि ऐसी संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव हो रहा है।’
बहरहाल, समान नागरिक संहिता पर हो रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश बहुत महत्वूपर्ण है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस संबंध में अखबारों में छपे दो लेख चीफ जस्टिस के समक्ष रखे जाएं जो इसे एक पीआईएल मानकर उचित बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करवाएंगे। इस मामले में अटार्नी जरनल और नाल्सा को नवंबर के आखिरी हफ्ते में जवाब दािखल करने हैं। जस्टिस ए.आर. दवे और ए.के. गोयल की पीठ ने आदेश में कहा कि सुनवाई के दौरान यह रेखांकित किया गया कि कोर्ट को मामला सुनना ही चाहिए क्योंकि यह नीतिगत मामला नहीं है। पीठ ने कहा, ‘महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों व अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों से जुड़ा मामला है। एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने कहा भी है कि बहुविवाह प्रथा सार्वजनिक नैतिकता के लिए खतरनाक है। राज्य कानून बनाकर सती प्रथा की तरह इसका दमन कर सकता है।’वैसे भी,सुप्रीम कोर्ट तलाकशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के सीआपीसी के प्रावधान 125 को मुस्लिम महिलाओं के लिए योग्य ठहरा चुका है और कहा है इससे पर्सनल लॉ का उल्लंघन नहीं होता। एक बार कोर्ट ने यह भी कहा है कि उत्तराधिकार और विवाह से जुड़े कानून धर्म का हिस्सा नहीं है। इन्हें समय के साथ बदलना ही चाहिए।बहुविवाह और तलाक की शिकार तमाम ‘शाहबानों’ के मन में एक बार सुप्रीम कोर्ट ने इंसाफ की उम्मीद जगा दी है।shahbano

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