लेखक परिचय

आकाश कुमार राय

आकाश कुमार राय

उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर वाराणसी में जन्मा और वहीँ से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा प्राप्त की। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता एवं जनसंचार में परास्नातक किया। समसामयिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों के साथ खेल विषय पर लेखन। चंडीगढ़ और दिल्ली में ''हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी'' में चार वर्षों से अधिक समय तक बतौर संवाददाता कार्यरत रहा। कुछ वर्ष ईटीवी न्यूज चैनल जुड़कर काम करने के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की पत्रिका 'राष्ट्रीय छात्रशक्ति' में सह संपादक की भूमिका निभाई। फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर पत्रकारिता से जुड़े हैं... संपर्क न.: 9899108256

Posted On by &filed under विविधा.


rio

वर्ष 1948 में व्हीलचेयर के साथ शुरू हुई पैरालंपिक प्रतियोगिता समय के घूमते पहिए (व्हील) के साथ आधुनिकता के नये पैमाने गढ़ता दिख रहा है। विश्वयुद्ध के पश्चात् घायल सैनिकों को ढ़ाढ़स दिलाने की परिकल्पना का साकार मूर्त है पैरालंपिक… जो आज अपने वर्चस्व पर है। शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों का खुद पर भरोसा बनाये रखने तथा जीवन में कभी भी हार नहीं मानने की वैचारिक शक्ति के स्वघोष के साथ खिलाड़ी यहां अपने कौशल का लोहा मनवाते हैं। शारीरिक कमियों के बावजूद खिलाड़ियों में खुद को साबित करने की जीजिविषा का ही कमाल है कि पैरालंपिक को लेकर विश्वभर में गजब का उत्साह देखा जा रहा है। भारतीय खिलाड़ियों के बेहतर प्रदर्शन और पदकों की उम्मीद का ही नतीजा है कि भारत अब पैरालंपिक में भी मेडल जीतने को लेकर आश्वस्त है।

रियो ओलंपिक 2016 में भले ही भारतीय खिलाड़ी लंदन ओलंपिक जैसा कारनामा नहीं दोहरा पाये हों.. भले ही पदकों की संख्या को दहाई-पार ले जाने की उम्मीदें भी पूरी ना हुई हो.. लेकिन अब भी रियो में खिलाड़ियों द्वारा पदक जीतने की भारतीय उम्मीदों का सफर थमा नहीं है। भारतीय उम्मीदों का कारवां अब पैरालंपिक की ड्योढ़ी पर पहुंच गया है। जहां फिर से भारतीय खिलाड़ियों का दल सवा अरब लोगों के भरोसे पर खुद को खरा उतारने की जद्दोजहद करेगा।

07 से 18 सितंबर तक रियो में शारीरिक क्षमता-भिन्न खिलाड़ियों का यह महाकुंभ होना है। इस बार पैरालंपिक में भी भारतीय खिलाड़ियों का अब तक का सबसे बड़ा दल जा रहा है। दो महिलाओं समेत कुल 17 खिलाड़ियों का दल पैरालंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा। इससे पहले, वर्ष 1972 हैडिलबर्ग में तीन महिलाओं ने पैरालंपिक में हिस्सा लिया था। 7 सदस्यीय भारतीय दल में पांच खिलाड़ी सुंदरसिंह गुर्जर, देवेंदर, संदीप, नरेंद्र और रिंकू भाला फेंक में पदक की उम्मीदों की कसौटी पर खुद को कसेंगे। वहीं अंकुर धामा 1500 मीटर दौड़ में अपनी रफ्तार नापेंगे, तो तीरंदाजी में पूजा पदकों के लिए निशाना साधेंगी। पूजा पहली भारतीय तिरंदाज हैं, जो पैरालंपिक में भाग ले रही हैं। जबकि ऊंची कूद में मारियप्पन टी, वरूण सिंह भाटी, शरद कुमार, राम पाल अपने करतब दिखायेंगे। इसके अलावा, तैराकी में सुयश नारायण जाधव, पॉवरलिफ्टिंग में फरमान बाशा, शॉटपुट में दीपा मलिक, अमित कुमार (क्लब थ्रो, चक्का फेंक) और धरमबीर (क्लब थ्रो) भी अपने हौंसलों से भारतीय झोली में पदक डालने की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करेंगे।

पैरालंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन और पदक जीतने की इच्छाशक्ति को अगर इतिहास के झरोखे से देखें तो खिलाड़ियों से पदक जीतने की उम्मीद और बढ़ जाती है। अब तक पैरालंपिक खेलों में भारत दो व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीत चुका है। पैरालंपिक में भारत को पहला पदक जीतने में 56 साल का इंतजार करना पड़ा.. जबकि पहले व्यक्तिगत स्वर्ण पदक को पाने में करीब 112 साल लगे। भारत को पहला स्वर्ण साल 1972 में हैडिलबर्ग पैरालंपिक में मिला.. मुरलीकांत पेटकर ने 50 मीटर फ्री स्टाइल तैराकी में सभी को मात देते हुए भारतीय झंडा लहराया। फिर दूसरे स्वर्ण के लिए भारत को 28 वर्षों का इंतजार करना पड़ा। वर्ष 2004 एथेंस पैरालंपिक में देवेंद्र झझरिया ने भाला फेंक में स्वर्ण जीता।

ओलंपिक में किसी खिलाड़ी द्वारा दो पदक जीतने का कारनामा सिर्फ सुशील कुमार के ही नाम है.. लेकिन पैरालंपिक के खाते में इससे कहीं बेहतर रिकॉर्ड दर्ज है। 1984 स्टोक मैंडाविल पैरालंपिक में इतिहास बनाते हुए जोगिंदर सिंह बेदी ने तीन पदक (एक रजत और दो कांस्य) जीते थे। जोगिंदर ने गोला फेंक, भाला फेंक और चक्का फेंक में अपने जौहर से सभी को हतप्रभ कर दिया था। इतना ही 1984 स्टोक मैंडाविल पैरालंपिक को यादगार बनाते हुए एक अन्य भारतीय खिलाड़ी ने भी रजत पदक भारतीय झोली में डाले थे। भीमराव केसरकार ने भाला फेंक प्रतियोगिता में यह कमाल कर दिखाया था।

आंकड़ों पर ध्यान दें तो लंदन 2012 में गिरिशा नागाराजेगौड़ा ने ऊंची कूद में कमाल करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। जबकि वर्ष 2008 पैरालंपिक में भारत की झोली खाली ही रही। फिर 2004 एथेंस पैरालंपिक में देवेंद्र झझरिया ने भाला फेंक में स्वर्ण जीता, तो वहीं राजिन्दर सिंह राहेलु ने पावरलिफ्टिंग के 56 किग्रा वर्ग में कांस्य जीता। भारत के लिए पैरालंपिक की शुरूआत 1968 से हुई मगर सबसे सुनहरा खेलकुंभ वर्ष 1984 का रहा, जब भारत के खाते में चार पदक आये।

जिस तरह ओलंपिक में आठ स्वर्ण जीतने का सुनहरा इतिहास हॉकी के नाम है.. ठीक वैसा ही हाल पैरालंपिक में एथलेटिक्स का है। एथलेटिक्स में स्वर्ण, रजत और कांस्य तीनों पदकों की श्रेणी में भारत ने अपनी उपस्थिति बनाये रखी है। जो गुजरते वर्ष के साथ और बेहतर होती जा रही है। ऐसे में रियो पैरालंपिक में भी भारतीय खिलाड़ियों से उम्मीद है कि वो अपने इतिहास को फिर से परिलक्षित करें। और ओलंपिक में पदकों के आंकड़े में सुधार के जिस लक्ष्य को हासिल करने में भारतीय खिलाड़ी चूक गये.. उन्हें पैरालंपिक खिलाड़ी पूरा करें।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz